Hasya Vyang Ki Shikhar Kavitaye
Author:
Arun GeminiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 239.2
₹
299
Available
हिन्दी में हास्य-व्यंग्य कविताओं का उदय मुख्यतः स्वतंत्रता के बाद हुआ। बेढब बनारसी, रमई काका, गोपालप्रसाद व्यास और काका हाथरसी आदि कवियों ने हिन्दी की ज़मीन में हास्य-व्यंग्य कविताओं के बीज बोए। कालान्तर में, ख़ासकर सन् 1970 के बाद, ये बीज भरपूर फ़सल बने और लहलहाए। जीवन में बढ़ते तनाव ने हास्य-व्यंग्य को कवि सम्मेलनों के केन्द्र में स्थापित कर दिया। इसने लोकप्रियता के शिखर छुए। देश में ही नहीं, विदेश में भी। हिन्दीभाषियों में ही नहीं, अहिन्दीभाषियों में भी।</p>
<p>इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में कुछ कविताओं की भूमिका विशेष रही। इस पुस्तक में वही कविताएँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इस दृष्टि से कि कोई एक संकलन ऐसा हो, जो हिन्दी की सर्वाधिक सराही गई हास्य-व्यंग्य कविताओं का प्रतिनिधित्व सचमुच कर सके। इस दृष्टि से भी कि हिन्दी की महत्त्वपूर्ण हास्य-व्यंग्य कविताओं के समुचित मूल्यांकन के लिए आधार-सामग्री एक जगह उपलब्ध हो सके।</p>
<p>उम्मीद है कि प्रस्तुत प्रयास आज़ादी के बाद की हास्य-व्यंग्य प्रधान कविताओं और उनमें व्यक्त देश-काल की विडम्बनाओं-विद्रूपताओं को रेखांकित करने की भूमिका अदा करेगा; और कविता-संवेदना की इस धारा की क्षमताओं को सामने लाने में भी सफल होगा।
ISBN: 9788183615693
Pages: 240
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
पवन करण ने कविता का पाठ जीवन की पाठशाला से सीखा है। पवन करण के यहाँ कुम्हार के आवाँ से निकले घड़े की तरह आँच सोखकर, भीतर तलहटी में स्मृतियों की राख चिपकाए, अनपढ़ मुँह के बाहर आती बोली के झिझकते शब्दों में, अभाव का उत्सव खेलते जीवन के दृश्य दिखाई देते हैं। भले ही टेक्नॉलोजी और मैनेजमेंट के प्रशिक्षण ने बहुत जगहों पर आदमी को ही हाशिए पर सरका दिया हो, किन्तु मध्यवर्गीय भद्रलोक की वर्जनाओं से भिड़न्त की धमक वाली ये कविताएँ पाठक के संवेदनतंत्र में कुछ अलग ही प्रकार से हलचल पैदा करती है, क्योंकि भारतीय समाज अभी अपना नग्न फोटोसेशन कराने को उत्सुक प्रेमिका तथा बेटी और प्रेमिका के बीच पिता के प्यार के अन्तर तथा विवाह की तैयारी करती प्रेमिका से पति की ‘आन्तरिकता को जानने को उत्सुक आहत प्रेमी को अपने संस्कारों के बीच जगह नहीं दे पाया है। ‘कोट के बाज़ू पर बटन’ की भी कुछ कविताएँ भद्रलोक के काव्य-वितान में छेद करते हुए प्रेम और देह के बीच खड़ी की गई झीनी, रोमांटिक चादर को किनारे सरकाती हैं।
पवन करण के कहने की कला भाषा के सहज सम्बोधन में निहित है जिसके कारण पाठक चालाक शब्दों और उनकी चमक में चौंधियाने से बचता है। भाषा के स्तर पर कथ्य के बारीक यथार्थ को पवन करण ने बहुत सहजता से व्यक्त कर दिया है। निर्मल वर्मा जिस यथार्थ को कहानी में ‘झाड़ी में छिपे पक्षी’ की तरह बताते हैं, उस यथार्थ को पवन करण बहुत सरलता से पकड़कर झाड़ी के ऊपर बिठा देते हैं कि यह है देखो। उन्होंने अपनी कहन के शब्द, मुहावरे और औज़ार सड़क और गलियों से उठाए हैं, अत: भाषा में भद्रकाव्य के घूँघट न होने से वह नए अनुभव का आस्वाद देती हैं। कविताएँ कहीं भी कवि के ‘मैं’ को अस्वीकार नहीं करतीं अत: रचनात्मक संघर्ष द्विस्तरीय हो जाता है—व्यक्तिगत जो आन्तरिक है और बाह्य जो सामाजिक है।
Hum Bhi Wapas Jayenge
- Author Name:
Abhinav Shukl
- Book Type:

- Description: Book
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