Meerabai Ki Sampurna Padawali
Author:
Ramkishor SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 172
₹
215
Available
भक्तिकाल में मीराँ की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। मीराँ के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गईं। किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों, किन्तु उनसे इतना अवश्य ज़ाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गई थीं। जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है, उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीराँ के पद गेय थे, अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित-प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं।
मीराँ के पदों में पाठ-भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीराँ ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा। आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाए जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्ष्ण अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, मीराँ भावावेश के क्षणों में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं।
शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक।
ISBN: 9788180317743
Pages: 253
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Humanist Social Vision of a Jungle Poet
- Author Name:
Kuvempu +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book carries 51 poems of Kuvempu in translation with a long introduction to give the pan India audience an understanding of Kuvempu's major concerns. Prof Raghunath has made his choice carefully to represent Kuvempu's social concern, and that seems to be at the heart of his introductory piece.
Akbar Allahabadi
- Author Name:
Akbar Allahabadi
- Book Type:

- Description: मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता पैदा हुआ वकील तो इबलीस ने कहा लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं वह क़त्ल से बच्चों के यूँ बदनाम न होता अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की न सूझी
Chalte Rahe Raat Bhar
- Author Name:
Rakesh Mishra
- Book Type:

- Description: राकेश मिश्र की कविताएँ दैनिक जीवन में प्रयुक्त साधारण बिम्बों के द्वारा मानवीय संघर्ष की तस्वीरें खींचती हैं। कविता की छोटी-छोटी पंक्तियों में वे सामाजिक विसंगतियों एवं निरावृत सत्य का एक पूरा परिदृश्य अंकित करते हैं। इस दृष्टि से 'रोटियाँ’ शीर्षक कविता विशेष रूप से चिन्तनीय बन पड़ी है—'बाँध दो/सूखी रोटियाँ/कँटीले तारों से/पोत दो/मक्खन/सूखी रोटियाँ/नंगी हों/तो/दस्तावेज़ होती हैं/हमारी बेईमान आदमीयत की’। इस तरह मिश्र जी मनुष्य के मूलभूत संघर्ष, दु:ख-दर्द और उसकी नियति की सही पहचान रखते हैं। वे अपने आस-पास की सारी जानी हुई चीज़ों को बिलकुल साफ़-सुथरे और विश्वसनीय ढंग से व्यंजित करते हैं। इस ढंग की कविताओं में 'नारे’, 'चुप होती आवाज़’, 'हेलीकॉप्टर’, 'कंक्रीट की दीवारें’, 'आख़िर कब तक’, 'उदास बच्चे’, 'चलते रहे रात-भर’, 'कृष्ण विवर’, 'तस्वीर’, 'चौराहा’, 'शहर में रातें’, 'खिलारी’, 'गुरुजी’, 'शहर’, 'भूख’ तथा 'वह लड़की’ का समावेश किया जा सकता है। इससे यह माना जा सकता है कि मिश्र जी के लिए कविता सिर्फ़ कला-यात्रा नहीं है। वह सामाजिक दायित्वों को सजगता के साथ सम्पादित करने की विधा है। —पुरोवाक् से
Isliye Kahungi Main
- Author Name:
Sudha Upadhyaya
- Book Type:

-
Description:
यह दर्ज करना उचित होगा कि इधर की हिन्दी कविता में अभिधा के प्रति बढ़ती उदासीनता के बावजूद सुधा उपध्याय उसकी शक्ति और सम्भावनाओं का अन्वेषण करने से नहीं हिचकतीं और सीधी बात को सीधे तरीक़े से कहने में संकोच नहीं करतीं...
‘उन सबका आभार/जिनके नागपाश में बँधते ही/यातना ने मुझे रचनात्मक बनाया उनका भी हृदय से आभार/जिनके घात-प्रतिघात/छल-छद्म के संसार में/मैं घंटे की तरह बजती रही।/मेरे आत्मीय शत्रु/तुमने तो वह सब कुछ दिया/जो मेरे अपने भी न दे सके।’
यहाँ कटुता या प्रतिहिंसा नहीं, जीवन की शर्तों का सामना उद्वेगरहित भाव से करनेवाला साहस है। वह इस कवयित्री को ‘अबला जीवन, हाय तुम्हारी यही कहानी—आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ वाली पारम्परिकता से तो भिन्न बनाता ही है; बल्कि सुधा उपाध्याय की इन कविताओं में जो नारी-चेतना आदि से अन्त तक फैली हुई है, वह न अबला की ‘हाय’ से शुरू होती है, न जगत के दु:ख-संकटमय जंत्र को ‘चकनाचूर’ करने की दुराशा में ख़त्म दिखती है। उलटे, वह हालात को बदलने में यक़ीन करती है जिसके तमाम पड़ावों में से कुछ ये हैं—‘सुना है वह स्त्री/हो गई है अब ख़ुद के भी ख़िलाफ़/चीख़-चीख़कर दर्ज करा रही है सारे प्रतिरोध/कहती है, सहना और चुपचाप रहना/कल की बात थी।’
यदि कोई पूछे कि अँधेरों से लड़ने की क़ूवत/औरत, तूने कहाँ से जुटाई/ये आईना जो दरक गया था कभी का/इसे फिर कहाँ से उठा लाई?’ तो सुधा के पास उत्तर मौजूद है—‘अब पेंसिलों की धार बनाने से पहले/हँसिए की धार बनानी होगी/दिमाग़ चलाने के साथ, चलाने होंगे हाथ/दूसरों को कहने से पहले/अब दिखाना होगा ख़ुद करके।’
लेकिन यह समझने के लिए दूर जाना ज़रूरी नहीं कि सुधा को हँसिए की धार बनानी है—ख़ुद करके दिखाने के लिए, न कि प्रतिपक्ष की गरदन रेतने के लिए : ‘जब पक कर खड़ी हो जाए फ़सल/बाँट दो बूरा-बूरा/चूरा-चूरा/यही है सृजन।’
सन्तोष का विषय यह है कि सुधा उपाध्याय की दृष्टि निकट और तत्काल तक सीमित नहीं; वह इतिहास और अतीत को भी अपने फलक का हिस्सा बनाती हैं। वहाँ सम्भावनाओं के अनेक द्वार खुलने की प्रतीक्षा में होंगे।
Khurduri Hatheliyan
- Author Name:
Anamika
- Book Type:

-
Description:
अनामिका की कविताएँ एक व्यापक अर्थ में गहरे वात्सल्य और हँसमुख दोस्त-दृष्टि की सधी अभिव्यक्तियाँ हैं। स्त्री के लेंस से वृहत्तर समाज की क्लिष्ट विडम्बनाएँ देखती-समझती इन कविताओं में एक महीन-सी परिहास वृत्ति भी है, गम्भीर क़िस्म की एक क्रीड़ाधर्मिता–सत्य को समग्रता में समझने की ईमानदार कोशिश!
लोकरंग में रची-बसी इस समाद्रित स्त्री कवि की शब्द और बिम्ब-सम्पदा के स्रोत अनन्त हैं। यहाँ लोकजीवन का कोई अनूठा प्रसंग विश्व-साहित्य के किसी मार्मिक प्रसंग की उँगली पकडक़र उसी तरंग में उठता है जिसमें चेखव की ‘तीन बहनें’ उठती थीं। मिलकर देखे एक सपने का तबोताब है इनमें!
मुहावरे, कहावतें, पढ़ा-सुना-भोगा हुआ– सब कुछ एक अलग कौंध में उजागर करती इन कविताओं में स्त्री-भाषा अपने पूरे ठस्से के साथ अपनी अलग-सी उपस्थिति दर्ज करती है।
Urvashi : Dinkar Granthmala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम-कथा का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस प्राचीनतम आख्यान को अपने युग के नए अर्थ से जोड़ने का सृजनात्मक प्रयास दिनकर की विलक्षण दृष्टि का परिचय है। वे मानते हैं कि उर्वशी सनातन नारी तो पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं तो पुरूरवा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक है।
पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर आकार नहीं लेता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है। रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अन्तरिक्ष में विचरण करता है। पुरूरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है। उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है। पुरूरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरन्तन वेदना से ध्वनित है।
उर्वशी से पुरूरवा के बिछड़ने के बाद विरह को दिनकर एक दार्शनिकता के साथ व्यक्त करते हैं—संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता। ...और वेदना की भूमि चूँकि पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।
निहितार्थ यही कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श कर प्रेम की आध्यात्मिक महिमा को एक व्यापक धरातल पर रचती 'उर्वशी' दिनकर की अपने पाठ और प्रभाव में कभी न ख़त्म होनेवाली कृति है, एक दुर्लभ गीति-नाट्य कृति।
Phir Bhi Kuchh Log
- Author Name:
Vyomesh Shukla
- Book Type:

-
Description:
व्योमेश शुक्ल के यहाँ राजनीति कुछ तेवर या अमर्षपूर्ण वक्तव्य लेकर ही नहीं आती, बल्कि उनके पास पोलिंग बूथ के वे दृश्य हैं जहाँ भारतीय चुनावी राजनीति अपने सबसे नंगे, षड्यंत्रपूर्ण और ख़तरनाक रूप में प्रत्यक्ष होती है। वहाँ संघियों और संघ-विरोधियों के बीच टकराव है, फ़र्ज़ी वोट डालने की सरेआम प्रथा है, यहाँ कभी भी चाकू और लाठी चल सकते हैं लेकिन कुछ ऐसे निर्भीक, प्रतिबद्ध लोग भी हैं जो पूरी तैयारी से आते हैं और हर साम्प्रदायिक धाँधली रोकना चाहते हैं। ‘बूथ पर लड़ना’ शायद हिन्दी की पहली कविता है जो इतने ईमानदार कार्यकर्ताओं की बात करती है जिनसे ख़ुद उनकी ‘सेकुलर’ पार्टियों के नेता आजिज आ जाते हैं, फिर भी वे हैं कि अपनी लड़ाई लड़ते रहने की तरक़ीबें सोचते रहते हैं।
ऐसा ही इरादा और उम्मीद ‘बाईस हज़ार की संख्या बाईस हज़ार से बहुत बड़ी होती है’ में है जिसमें भूतपूर्व कुलपति और गांधीवादी अर्थशास्त्र के बीहड़ अध्येता दूधनाथ चतुर्वेदी को लोकसभा का कांग्रेस का टिकट मिलता है किन्तु समूचे देश की राजनीति इस 75 वर्षीय आदर्शवादी प्रत्याशी के इतने विरुद्ध हैं कि चतुर्वेदी छठवें स्थान पर बाईस हज़ार वोट जुटाकर अपनी जमानत ज़ब्त करवा बैठते हैं और बाक़ी बची प्रचार सामग्री का हिसाब करने बैठ जाते हैं तथा कविता की अन्तिम पंक्तियाँ यह मार्मिक, स्निग्ध, सकारात्मक नैतिक एसर्शन करती हैं कि ‘बाईस हज़ार एक ऐसी संख्या है जो कभी भी बाईस हज़ार से कम नहीं होती’।
व्योमेश की ऐसी राजनीतिक कविताएँ लगातार भूलने के ख़िलाफ़ खड़ी हुई हैं और वे एक भागीदार सक्रियतावादी और चश्मदीद गवाह की रचनाएँ हैं जिनमें त्रासद प्रतिबद्धता, आशा और एक करुणापूर्ण संकल्प हमेशा मौजूद हैं।...यहाँ यह संकेत भी दे दिया जाना चाहिए कि व्योमेश शुक्ल की धोखादेह ढंग से अलग चलनेवाली कविताओं में राजनीति कैसे और कब आ जाएगी, या बिलकुल मासूम और असम्बद्ध दिखनेवाली रचना में पूरा एक भूमिगत राजनीतिक पाठ पैठा हुआ है, यह बतलाना आसान नहीं है।...ये वे कविताएँ हैं जो ‘एजेंडा’, ‘पोलेमिक’ और कला की तिहरी शर्तों पर खरी उतरती हैं।
—विष्णु खरे
He Ram…!
- Author Name:
Mahesh Katare
- Book Type:

- Description: Book
Tera Tujhko Arpan
- Author Name:
Rashmi Sthapak
- Book Type:

- Description: Book
Aadhunik Awadhi Kavita : Pratinidhi Chayan : 1850 Se Ab Tak
- Author Name:
Amrendra Nath Tripathi
- Book Type:

- Description: अवधी भाषा की कविता-यात्रा हज़ार वर्षों से कहीं अधिक लम्बी रही है जिसे अब तक गतिमान भाषा की महायात्रा के रूप में देखा जाना चाहिए। सभी आधुनिक आर्यभाषाओं की तरह अवधी की शुरुआत भी दसवीं शताब्दी से मानी जाती है। भाषा के लिखित रूप के साक्ष्य पर। लेकिन इस भाषा का उद्भव दसवीं सदी के कितने सैकड़े पहले हुआ, ठीक-ठीक कह पाना कठिन है। अवधी में लोकसाहित्य कब से लिखा जा रहा है, यह भी कोई नहीं बता सकता। परन्तु यह अनुमान हवाई नहीं है कि जो भाषा दसवीं-ग्यारहवीं सदी के आसपास अपने लिखित रूप में मौजूद दिखती है, उसका मौखिक रूप भी कहीं और पहले से आकार लेता हुआ, विस्तृत, ऊर्जावान और आकर्षक रहा होगा। भाषा से 'बोली' के दर्जे में पहुँचा दिए जाने के बावजूद आधुनिक काल में अवधी रचनात्मकता रुकी नहीं। कवियों ने अपने घर, गाँव और अवध की भाषा में लिखा और असरदार लिखा। कोई उन्हें देख रहा है कि नहीं, रचना कहीं से छपेगी कि नहीं, कोई कभी मूल्यांकन करेगा कि नहीं; इन सबसे बेख़बर होकर अवधी साहित्यकारों ने सिर्फ़ लिखा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि अवधी के आधुनिक काम में रचनाकारों और रचनाओं की कमी नहीं है। पूरे अवध में, और अवध से बाहर भी, अवधी रचनाकारों ने विपुल साहित्य रचा। वह कितना मूल्यवान है, यह अलग मसला है, लेकिन नाना नकारात्मकताओं के मध्य अवधी की रचनात्मक चेष्टा की सराहना की जानी चाहिए। यह किताब उसी दिशा में एक प्रयास है।
Hashiye Ka Haq
- Author Name:
Nilima Sharma +3
- Book Type:

- Description: Book
Prapanch Padi
- Author Name:
C. Narayan Reddy
- Book Type:

- Description: ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित डॉ. सी. नारायण रेड्डी तेलुगू के प्रसिद्ध लेखक हैं। यों कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तेलुगू साहित्य की प्रत्येक विधा को डॉ. रेड्डी ने अपने अमृत-स्पर्श से जीवन्त बना दिया। साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ वे कुशल प्रशासक भी थे। अपने दैनिक जीवन में अपनी हास्यप्रियता और वाक्चातुर्य के कारण वे अपने परिवेश को सदा जीवन्त बनाए रखते थे। ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘विश्वम्भरा’ आदि काव्यों में मानव के विकास के इतिहास को सुगम रूप से प्रस्तुत करने के बाद उन्होंने अनेक छोटी-मोटी कविताएँ लिखते हुए भी एक विनूतन शैली में 108 प्रपंच-पदियों की रचना की। ये प्रपंच-पदी उर्दू की रुबाई शैली में लिखे गए हैं। रुबाई में चार चरण होते हैं, जिनमें पहले, दूसरे और चौथे में तुक मिलाया जाता है। रेड्डी जी ने रुबाई में एक और चरण जोड़कर उसे पंच-पदी (पाँच चरणोंवाला) बनाया और संसार की रीति-नीतियों के चित्रण के कारण इन्हें ‘प्रपंच-पदी’ कहा है। प्रपंच-पदियों की रचना में डॉ. रेड्डी ने तेलुगू भाषा में प्रचलित चतुरश्र और मिश्र गतियों का प्रयोग किया है। इनके प्रयोग से काव्य-रचना प्रभावशाली बन गई है। प्रपंच-पदियों की फलश्रुति में डॉ. रेड्डी ने इन पदों के उद्देश्य को स्पष्ट किया है। ये टूटे जन-मन में उत्साह भरनेवाले, सुप्त नीतियों को प्रकाश में लानेवाले, निद्रित चरणों को जागृत करनेवाले और वर्तमान में परिवर्तन लाने के प्रयास के परिणाम हैं। जीवन में कड़वे और मीठे सत्यों को मथकर डॉ. रेड्डी ने इन 108 प्रपंच-पदियों की रचना की। तेलुगू में लब्धप्रतिष्ठ डॉ. नारायण रेड्डी हिन्दी और उर्दू में भी मौलिक रूप से ग़ज़लों की रचना करते रहे। उनकी इस विशिष्ट रचना-प्रक्रिया और ‘प्रपंच-पदियों’ का हिन्दी जगत् में काफ़ी चर्चा रही है।
Ek Bahut Komal Tan
- Author Name:
Leeladhar Mandoi
- Book Type:

- Description: Poems
Mohabbat Leke Aaya Hoon
- Author Name:
Aziz-ul-Hasan Majzub
- Book Type:

- Description: ख़्वाजा अज़ीज़ उल हसन मज्ज़ूब के लोकप्रिय कलाम का संग्रह सूफ़ीनामा सीरीज़ की एक और पेशकश है जिस का संपादन अब्दुल वासे ने किया है..
Pran-Bhang Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ं वर्तमान संग्रह को अपनी प्रारम्भिक रचनाओं का संग्रह बनाना चाहता था और इसका मुख्य रूप वही है भी। किन्तु पुरानी बहियों को उलटते-पलटते समय कुछ कविताएँ और मिल गईं, जिन्हें प्रारम्भिक रचनाएँ तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु जो उसी न्याय से प्रकाश में आने के योग्य हैं, जिस न्याय से कवि की प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं।' दिनकर जी के इस कथन से स्पष्ट है कि यह उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके यह उनका एक ऐसा संग्रह भी है जिसके महत्त्व को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में उल्लेख किया है। प्रस्तुत संग्रह में एक लघु खंड काव्य 'प्रण-भंग' नाम से है जो महाभारत युद्ध में घटित श्रीकृष्ण के शस्त्र-ग्रहण की घटना पर आधारित है जिसे दिनकर जी ने खुद 'जयद्रथ-वध' के अनुकरण पर लिखा गया माना है। इस खंड काव्य में परम्परा और आधुनिकता का अन्तर्विरोध अपनी तार्किकता के साथ है। यही नहीं, इसमें भक्ति भी अपनी आस्था के साथ रूपायित हुई है। ‘प्रण-भंग’ के अलावा संग्रह की स्फुट कविताओं–‘शहीद अशफाक के प्रति’, ‘वायसराय की घोषणा पर’, ‘महात्मा गांधी’, ‘शहीदों के नाम पर’, ‘मूक बलिदान’, ‘तपस्या’, ‘शहीद’ आदि–में हम स्वर्णिम अतीत के प्रति संवेदनशीलता और अपने यथार्थ के प्रति अन्तर्विरोध को गहरे लक्षित कर सकते हैं। वहीं पुस्तक के अन्त में संगृहित अट्ठाईस क्षणिकाओं में सामाजिक पीड़ा और सांस्कृतिक चिन्तन है, तो सत्ता की शोषक-प्रवृत्ति के प्रति धारदार नज़रिया भी है जिसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता है–‘राजा/तुम्हारे अस्तबल के/घोड़े मोटे हैं।/प्रजा भूखी और नंगी है।/घोड़ों को कोई अभाव नहीं।/लेकिन लोगों को हर तरफ़ की तंगी है।’ ‘प्रण-भंग और अन्य कविताएँ’ संग्रह के बारे में दिनकर जी के ही शब्दों को लेकर कहें तो यह उनके 'सम्पूर्ण काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालता है
Sampurna Soorsagar : Vols. 1-5
- Author Name:
Soordas
- Book Type:

- Description: अष्टछाप वाले प्रसिद्ध सूरदास, महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे। यह जन्मान्ध थे जो दिल्ली और मथुरा के बीच जनमेजय के नागयज्ञ स्थल पर सीही में पैदा हुए थे। इनका जीवन-काल सम्भवत: सं. 1535 से 1640 वि. है। यह परसौली में रहते थे और गोवर्धनगिरि पर स्थापित श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तन किया करते थे। यह स्वयं 'सूरसागर' कहे जाते थे और इनके कीर्तन पदों का संग्रह भी 'सूरसागर' कहलाया। इसमें केवल 'कृष्णलीला' के पद हैं। यह कृष्ण लीलात्मक ‘सूरसागर’ है। इसके प्रथम खंड में विनय के पद, गोकुल लीला एवं वृंदावन लीला के कुल 1100 पद हैं। डॉ. के इस महा कार्य ने सूर सम्बन्धी समय-समय पर उठी सभी समस्याओं का समाधान कर दिया है। एक अनुपम और अद्वितीय टीका के साथ बेहद महत्त्वपूर्ण कृति।
Bikhre Hain Swarg
- Author Name:
Dr. Urmila Singh
- Book Type:

- Description: This book has no description
Assi Ghat Ka Bansuri Wala
- Author Name:
Tajendra Singh Luthra
- Book Type:

-
Description:
चाहता हूँ/अकेला हो जाऊँ/कोई
आसपास न रहे/ज्यादा देर तक/
आए और चला जाए/अपने आप।
तजेन्दर सिंह लूथरा की कविताओं में ‘अनायासता’ का यह स्वर कई स्तरों पर दिखाई पड़ता है। वे सायास कवि नहीं होना चाहते; न आई हुई कविता को अतिरिक्त प्रयास से गढ़ने-बनाने की कोशिश करते हैं; सामने से गुजरते हुए जीवन व संसार की जिस-जिस छवि को पकड़ते हैं, उसे हूबहू उसी रूप में पाठक के सामने रखने की उनकी इच्छा ही उनकी काव्य-कला है। इसके चलते कई बार अनुभूतियों के जो बिम्ब कुछ अनगढ़ रूप में दिखाई पड़ते हैं, वे दरअसल एक भीतरी तराश का ऊपरी आवरण हैं, जो पाठक को धीरे-धीरे अपने भीतर उतरने के लिए आमंत्रित करते हैं।
घर से लेकर महानगर तक के विस्तार में विचरण करती उनकी काव्य-संवेदना जीवन की हर उस विकलता का नोटिस लेती है, जिसका प्रभाव मनुष्य की नियति पर पड़ता है या पड़ सकता है। संग्रह में शामिल कविता ‘मुझे जीने दो’ की यह पंक्ति ‘मैं इतना सार्वजनिक हो गया/कि मुझे मेरे सिवा सब पहचानने लगे थे।’ सार्वजनिक स्पेस की आक्रामकता के बीच मौजूद व्यक्ति की पीड़ा का अचूक रेखांकन है।
यह कवि का पहला कविता-संग्रह है, लेकिन कविता-प्रेमियों के लिए उनका कवि-व्यक्तित्व और उनकी कविताएँ अपरिचित नहीं हैं। इस संग्रह में शामिल ‘अस्सी घाट का बाँसुरी वाला’, ‘जैसे माँ ठगी गई थी’ और ‘एक साधारण शवयात्रा’ जैसी कविताओं ने बराबर सुधी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है; और अपनी नवीन दृष्टि और पर्यवेक्षण के चलते उनकी याददाश्त में स्थायी जगह बनाई है।
उम्मीद है, कविता का यह नया रंग पाठकों को ताजगी प्रदान करेगा।
Tulsi Rachnawali Vol-3
- Author Name:
Dr. Ramji Tiwari
- Book Type:

- Description: गोस्वामी तुलसीदास की विलक्षण प्रतिभा से प्रसूत अनंत काव्य-कीर्ति-कौमुदी में स्नात होकर समस्त विश्व के काव्य-रसिक धन्य, रससिक्त और श्रद्धानवत होते रहे हैं, किंतु सभी के दृष्टि-पथ में 'रामचरितमानस' ही आकाशदीप की भाँति विराजमान है। अन्य ग्रंथरत्न छायावेष्टित ही रह जाते हैं। जबकि लोक-परलोक चिंतन, व्यावहारिक चेतन जीवन और अध्यात्मबोध, संस्कृति और संस्कार, संघर्ष और आस्था तथा जय और पराजय से युक्त विलक्षण व्यक्तित्व उनके सभी ग्रंथ-रत्नों को देखने के बाद ही सगुण साकार हो पाता है। संस्कारशील और सुरुचि-संपन्न पाठक भी इस विश्वकवि के संपूर्ण वाड्मय का रसास्वादन कर लेने के बाद ही पूर्ण परितोष का लाभ ले पाता है। गोस्वामीजी के सभी ग्रंथरत्नों को एकत्र उपलब्ध कराने के पुनीत उद्देश्य से ही इस 'रचनावली' की योजना बनाई गई है। ग्रंथावली का प्रथम खंड सुविज्ञ पाठकों को समर्पित है। इसमें गोस्वामीजी की 'रामलला नहछू', 'वैराग्य संदीपनी', 'बरवै रामायण', 'जानकी मंगल', 'पार्वती मंगल', 'रामाज्ञा-प्रश्न', 'दोहावली', 'श्रीकृष्ण गीतावली' कृतियों का समावेश है। आशा है, सुधी पाठकों को अभीप्सित परितोष मिल सकेगा।
DHARTI KABHI BANJH NAHI HOTI
- Author Name:
Vinod Sharma
- Book Type:

- Description: Collection of hindi poems
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book