Umraonagar Mein Kuchh Din
Author:
Shrilal ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
‘उमरावनगर में कुछ दिन’ श्रीलाल शुक्ल की प्रस्तुत पुस्तक में तीन व्यंग्य कथाएँ सम्मिलित हैं—‘उमरावनगर में कुछ दिन’, ‘कुन्ती देवी का झोला’ और ‘मम्मीजी का गधा’। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, संग्रह की आधार-कथा है : ‘उमराव नगर में कुछ दिन’ उमराव नगर यानी एक ऐसा गाँव, जिसे नियोजित विकास का चमत्कार दिखाने के लिए चुना गया है, लेकिन जिसके सार्वजनिक जीवन में आज़ादी के बाद पनपे सारे अवसरवाद और भ्रष्टाचार के साथ हुए तमाम समझौते मौजूद हैं। ‘कुन्तीदेवी का झोला’ में डाकुओं और पुलिस के आतंकवाद का बेजोड़ चित्रण है, जिसका शिकार अन्ततः निर्दोष जनता को बनना पड़ता है। ‘मम्मीजी का गधा’ में अफ़सरशाही के अहं को विषय बनाया गया है और प्रसंगतः इस बात की भी ख़बर ली गई है कि नेता लोग अर्थहीन-सी स्थितियों का किस प्रकार लाभ उठाते हैं। निश्चय ही यह संग्रह श्रीलाल शुक्ल की सुपरिचित व्यंग्य-प्रतिभा को नई ऊँचाई सौंपता है।
ISBN: 9788126700660
Pages: 79
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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छैला सन्दु आदिवासी समाज का एक अप्रतिम नायक है। इतिहास उसके बारे में मौन है लेकिन सन्दु और बुन्दी की प्रेमकथा मुण्डा समाज की सर्वाधिक लोकप्रिय जनश्रुतियों में से एक है। उसको सुनते-सुनाते हुए मुण्डा जन आज भी रोमांचित हो उठते हैं।
प्रकृति का अन्यतम प्रेमी छैला संगीत का असाधारण साधक भी था। उसका बाँसुरीवादन किसी को भी अवश करने में सक्षम था। बाँसुरी से उसका लगाव लोक स्मृति में इतना गहरे रचा-बसा है कि मुण्डाजन साँवले रंग, छरहरे शरीर और मानवीय गुणों से भरपूर व्यक्तित्व वाले छैला को कृष्ण का अवतार मानते हैं।
इसी छैला सन्दु की कथा इस उपन्यास में कही गई है। बुन्दी के प्रेम में पड़ना, उसके जीवन में निर्णायक साबित होता है। बुन्दी भी उसे प्रेम करने लगती है। उस पर बुन्दी को भगाने का आरोप लगता ळै। बुन्दी के पिता अपनी पुत्री की तलाश करते हुए छैला की बस्ती को उजाड़ देते हैं। अपने प्रेम के लिए छैला कोई भी कष्ट उठाने से पीछे नहीं हटता। वह बुन्दी के भविष्य के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग करने से भी नहीं हिचकिचाता।
Bhaya Kabeer Udas
- Author Name:
Usha Priyamvada
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Description:
शरीर की पूर्णता-अपूर्णता का प्रश्न किसी-न-किसी स्तर पर मन और जीवन की पूर्णता के प्रश्न से भी जुड़ जाता है। यह उपन्यास शुरू से लेकर आख़िर तक इसी सवाल से जूझता है कि क्या सौन्दर्य के प्रचलित मानदंडों और समाज की रूढ़ दृष्टि के अनुसार एक अधूरे शरीर को उन सब इच्छाओं को पालने का अधिकार है जो स्वस्थ और सम्पूर्ण देहवाले व्यक्तियों के लिए स्वाभाविक होती है। उपन्यास की नायिका विदेशी भूमि पर अपना सहज और अल्पाकांक्षी जीवन जी रही होती है कि अचानक उसे मालूम होता है, उसे स्तन-कैंसर है और यह बीमारी अन्तत: उसके शरीर से उसके सबसे प्रिय अंग को छीन ले जाती है। लेकिन मन! तमाम चोटों के बावजूद मन कब अधूरा होता है, वह फिर-फिर पूरा होकर मनुष्य से, जीवन से अपना हिस्सा माँगता है, अपना सुख।
उषा प्रियम्वदा बारीक और सुथरे मनोभावों की कथाकार रही हैं, उनके पात्र न कभी ऊँचा बोलते हैं, न कभी बहुत शोर मचाते हैं, फिर भी ज़िन्दगी और अनुभूति की उन गलियों को आलोकित कर जाते हैं, जहाँ से गुज़रना हर किसी के लिए उद्घाटनकारी होता है।
यह उपन्यास भी इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने बहुत नई-सी दिखनेवाली कथाभूमि पर, बहुत सहज ढंग से मानव-मन की चिरन्तन लालसाओं, कामनाओं, निराशाओं और उदासियों का अत्यन्त कुशल और समग्र अंकन किया है।
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