Bhaya Kabeer Udas
(0)
Author:
Usha PriyamvadaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
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शरीर की पूर्णता-अपूर्णता का प्रश्न किसी-न-किसी स्तर पर मन और जीवन की पूर्णता के प्रश्न से भी जुड़ जाता है। यह उपन्यास शुरू से लेकर आख़िर तक इसी सवाल से जूझता है कि क्या सौन्दर्य के प्रचलित मानदंडों और समाज की रूढ़ दृष्टि के अनुसार एक अधूरे शरीर को उन सब इच्छाओं को पालने का अधिकार है जो स्वस्थ और सम्पूर्ण देहवाले व्यक्तियों के लिए स्वाभाविक होती है। उपन्यास की नायिका विदेशी भूमि पर अपना सहज और अल्पाकांक्षी जीवन जी रही होती है कि अचानक उसे मालूम होता है, उसे स्तन-कैंसर है और यह बीमारी अन्तत: उसके शरीर से उसके सबसे प्रिय अंग को छीन ले जाती है। लेकिन मन! तमाम चोटों के बावजूद मन कब अधूरा होता है, वह फिर-फिर पूरा होकर मनुष्य से, जीवन से अपना हिस्सा माँगता है, अपना सुख।</p> <p>उषा प्रियम्वदा बारीक और सुथरे मनोभावों की कथाकार रही हैं, उनके पात्र न कभी ऊँचा बोलते हैं, न कभी बहुत शोर मचाते हैं, फिर भी ज़िन्दगी और अनुभूति की उन गलियों को आलोकित कर जाते हैं, जहाँ से गुज़रना हर किसी के लिए उद्घाटनकारी होता है।</p> <p>यह उपन्यास भी इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने बहुत नई-सी दिखनेवाली कथाभूमि पर, बहुत सहज ढंग से मानव-मन की चिरन्तन लालसाओं, कामनाओं, निराशाओं और उदासियों का अत्यन्त कुशल और समग्र अंकन किया है।
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शरीर की पूर्णता-अपूर्णता का प्रश्न किसी-न-किसी स्तर पर मन और जीवन की पूर्णता के प्रश्न से भी जुड़ जाता है। यह उपन्यास शुरू से लेकर आख़िर तक इसी सवाल से जूझता है कि क्या सौन्दर्य के प्रचलित मानदंडों और समाज की रूढ़ दृष्टि के अनुसार एक अधूरे शरीर को उन सब इच्छाओं को पालने का अधिकार है जो स्वस्थ और सम्पूर्ण देहवाले व्यक्तियों के लिए स्वाभाविक होती है। उपन्यास की नायिका विदेशी भूमि पर अपना सहज और अल्पाकांक्षी जीवन जी रही होती है कि अचानक उसे मालूम होता है, उसे स्तन-कैंसर है और यह बीमारी अन्तत: उसके शरीर से उसके सबसे प्रिय अंग को छीन ले जाती है। लेकिन मन! तमाम चोटों के बावजूद मन कब अधूरा होता है, वह फिर-फिर पूरा होकर मनुष्य से, जीवन से अपना हिस्सा माँगता है, अपना सुख।</p>
<p>उषा प्रियम्वदा बारीक और सुथरे मनोभावों की कथाकार रही हैं, उनके पात्र न कभी ऊँचा बोलते हैं, न कभी बहुत शोर मचाते हैं, फिर भी ज़िन्दगी और अनुभूति की उन गलियों को आलोकित कर जाते हैं, जहाँ से गुज़रना हर किसी के लिए उद्घाटनकारी होता है।</p>
<p>यह उपन्यास भी इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने बहुत नई-सी दिखनेवाली कथाभूमि पर, बहुत सहज ढंग से मानव-मन की चिरन्तन लालसाओं, कामनाओं, निराशाओं और उदासियों का अत्यन्त कुशल और समग्र अंकन किया है।
Book Details
-
ISBN9788126713875
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘ख़लीफ़ों की बस्ती’ शिवकुमार श्रीवास्तव का दूसरा उपन्यास है—एक नितान्त भिन्न कथा-भूमि पर रचा गया। ‘बिल्लेसुर बकरिया’ और ‘कुल्लीभाट’ की परम्परा में यह उपन्यास लेखक के नए अनुभव क्षेत्र का बखान है। बुंदेलखंड में ख़लीफ़ाओं का माफ़िया राज चलता है। ज़ोर-ज़बर्दस्ती से अपनी बात मनवाना, काइयाँपन से क़ानून की दीवारों में सेंध लगाना तथा शालीनता, मर्यादा और विधि सम्मत जीवन के पक्षधरों को अपना शिकार बनाना इन ख़लीफ़ाओं की पहचान में शामिल है। इस उपन्यास की बस्ती के ख़लीफ़ाओं में छोटे-मोटे नेता हैं, पीत-पत्रकार हैं, नक़ली डॉक्टर हैं, छात्र नेता हैं, ठर्रा उतारनेवाले हैं, बेकार तरुण हैं, साधारण व्यापारी हैं जो अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने से गुरेज़ नहीं करते। सत्ता और प्रतिष्ठान संरक्षित ये शक्तियाँ आज भी वैसी ही हैं जैसे महाभारत काल में थीं—‘महाभारत’ का एकलव्य आज सखाराम है और द्रोण—उसके तो कई रूप हैं—विधायक, पुलिस इंस्पेक्टर, डॉक्टर।
यह उपन्यास दलित-विमर्श नहीं है, लेकिन दलितों के प्रति सवर्णों के रवैए का रोचक और मार्मिक साक्ष्य अवश्य उपलब्ध कराता है। जाति-विभक्त समाज में जातियों के भीतरी अन्तर्घातों और पारस्परिक दाँव-पेंचों की यह कथा हमें विचलित तो करती ही है दुनिया को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देती है। व्यंजक भाषा, बिम्ब बहुल चित्रण और चुटीले संवादों के कारण ‘ख़लीफ़ों की बस्ती’ औपन्यासिक प्रवृत्ति का नया उदाहरण है, जो समाज के हाशिये पर पड़ी हुई जातियों और वर्गों को समाज के मुख्य प्रवाह में लाने की रचनात्मक कोशिश करता है।
Barkha Rachai
- Author Name:
Asghar Wajahat
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Description:
विमर्शों के इस दौर में भी असग़र वजाहत जीवन को समझने के लिए उसे टुकड़ों में नहीं बाँटते और न किसी फ़ॉर्मूले के अन्तर्गत सुझाव और समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे जीवन को उसकी पूरी जटिलता और प्रवाह के साथ सामने लाते हैं। उनका मानना है कि जीवन को समग्रता में ही समझा जा सकता है। इस तरह प्रस्तुत उपन्यास ‘बरखा रचाई’ किसी विमर्श का ठप्पा लगाए बिना ठोस जीवन से जुड़ी बहुत-सी समस्याओं को सामने लाता है।
उपन्यास में एक ऐसे जीवन के दर्शन होते हैं जो लगातार प्रवाह में है। उनके रूपों, रंगों, कोणों से इस जीवन को देखने और समझने का प्रयास ही इसे महत्त्वपूर्ण बनाता है।
उपन्यास का फलक बहुत व्यापक है। दिल्ली के राजनीतिक जीवन की झलकियों के साथ पत्रकार जीवन की झाँकियाँ, मध्यवर्गीय समाज में स्त्री की स्थिति, महानगर के बुद्धिजीवियों की ऊहापोह, गाँव के बदलते सम्बन्ध, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलता, विवाह और विवाहेतर सम्बन्ध, छोटे शहरों का बदलता जीवन और वहाँ राजनीति तथा अपराध की बढ़ती भूमिका जैसे प्रसंग उपन्यास में आए हैं।
उपन्यास में न तो वैचारिक पूर्वग्रह और न किसी विशेष ‘शिल्प कौशल’ का दबाव स्वीकार किया गया है। पात्र स्वयं अपनी वकालत करते हैं। लगता है, पात्रों की गति और प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि वे उपन्यास के समीकरण को खंडित कर देंगे, पर यह सब बहुत स्वाभाविक ढंग से सामने
आता है।असग़र वजाहत अपनी ‘क़िस्सागोई’ के लिए विख्यात हैं। उन्होंने दास्तानों और कथाओं से जो कुछ हासिल किया है, उसका भरपूर इस्तेमाल अपनी कथाओं में किया है। जिस तरह क़िस्सा सुनानेवाला अपने श्रोता की अनदेखी नहीं कर सकता, उसी तरह वजाहत अपने पाठक की अनदेखी नहीं
करते।‘बरखा रचाई’ केवल घटनाओं का पिटारा नहीं है। यह जीवन को समझने की एक कोशिश भी है। सत्ता, समाज और व्यक्ति के त्रिकोण की गहन व्याख्या भी पाठक को प्रभावित करती है।
Agnideeksha
- Author Name:
Amrit Rai
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- Description: Awating description for this book
Kissa Chamcham Pari Aur Gudiyaghar Ka
- Author Name:
Prakash Manu
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- Description: हिंदी बाल साहित्य का पर्याय कहे जानेवाले प्रकाश मनु बच्चों के सिरमौर कथाकार हैं, जिनकी कहानियों और उपन्यासों को बच्चे खोज-खोजकर पढ़ते हैं। देश के कोने-कोने में फैले हजारों बच्चे उनके प्रशंसक हैं, जिन्हें मनुजी की कहानियों और नटखटपन से भरे उपन्यासों का इंतजार रहता है। उन्हें वे बड़ी दीवानगी से पढ़ते हैं, मन-ही-मन सराहते और आनंदविभोर हो उठते हैं। ‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’ प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों का ताजा संग्रह है, जिसमें बच्चों के लिए लिखे गए उनके तीन रोचक और बहुरंगी उपन्यास शामिल हैं—‘किस्सा चमचम परी और गुडि़याघर का’, ‘फागुन गाँव का बुधना और निम्मा परी’, तथा ‘सब्जियों का मेला’। ये तीनों इतने रसपूर्ण उपन्यास हैं, कि बच्चे एक बार पुस्तक हाथ में लेंगे, तो पूरा पढ़े बगैर छोड़ नहीं पाएँगे। प्रकाश मनुजी उस्ताद किस्सागो हैं, इसीलिए उनके बाल उपन्यासों में किस्सागोई का जादू पाठकों पर इस कदर तारी होता है कि लगता है, उपन्यास के पात्र सजीव होकर, उनके आसपास ही साँस ले रहे हैं। फिर इन तीनों उपन्यासों में धरती की सुंदरता की बड़ी अद्भुत छवियाँ हैं, जो बाल पाठकों को खूब लुभाएँगी और आनंदमग्न कर देंगी। बेशक, प्रकाश मनुजी के बाल उपन्यासों की यह दिलचस्प पुस्तक बच्चों और बाल साहित्यकारों के लिए एक अनमोल उपहार से कम नहीं है, जिसे वे हमेशा सँजोकर रखेंगे।
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