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Antim Aranya

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अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा। कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है। पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है। पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है। अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा। कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है। पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है। पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है।

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अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा।

कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।

पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है।

पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है। अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा।

कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।

पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है।

पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2024
Weight
310 grams
ISBN-13
9789360864774
Pages
272
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
12.5 × 20 cm
Language
Hindi

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