Tera Sangi Koi Nahin
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कृषक जीवन की बुनियादी संरचना के तहत कृषि के निरन्तर उपेक्षित, अभावग्रस्त और परेशानीपूर्ण बनते जाने के कारणों का राईं-रक्स उजागर करता यह उपन्यास कृषक जीवन, कृषक समाज और कृषि समस्या का जीवन्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है। खेत मज़दूरों को ही किसान मानकर उन पर आधारित रचनाओं से पृथक् एक मध्यवर्गीय किसान की त्रासद कथा के माध्यम से इस उपन्यास ने सही अर्थों में प्रतिनिधि कृषक चरित्र तथा कृषि जीवन से सम्बन्धित वास्तविक समस्याओं को न सिर्फ़ चिन्हित किया है, बल्कि उन्हें जानने-समझने और एक सही अंजाम तक पहुँचाने के लिए सार्थक ज़मीन भी मुहैया कराई है। ‘तेरा संगी कोई नहीं’ कृषक जीवन, कृषक समाज और कृषि से सम्बन्धित समस्याओँ की सूक्ष्मता, बेबाकी और ज़मीनी सार पर पड़ताल करनेवाला विलक्षण उपन्यास है।
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कृषक जीवन की बुनियादी संरचना के तहत कृषि के निरन्तर उपेक्षित, अभावग्रस्त और परेशानीपूर्ण बनते जाने के कारणों का राईं-रक्स उजागर करता यह उपन्यास कृषक जीवन, कृषक समाज और कृषि समस्या का जीवन्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
खेत मज़दूरों को ही किसान मानकर उन पर आधारित रचनाओं से पृथक् एक मध्यवर्गीय किसान की त्रासद कथा के माध्यम से इस उपन्यास ने सही अर्थों में प्रतिनिधि कृषक चरित्र तथा कृषि जीवन से सम्बन्धित वास्तविक समस्याओं को न सिर्फ़ चिन्हित किया है, बल्कि उन्हें जानने-समझने और एक सही अंजाम तक पहुँचाने के लिए सार्थक ज़मीन भी मुहैया कराई है।
‘तेरा संगी कोई नहीं’ कृषक जीवन, कृषक समाज और कृषि से सम्बन्धित समस्याओँ की सूक्ष्मता, बेबाकी और ज़मीनी सार पर पड़ताल करनेवाला विलक्षण उपन्यास है।
Book Details
-
ISBN9789386863959
-
Pages174
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
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