Tumhari Roshani Mein
(0)
Author:
Govind MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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तुम्हारी रोशनी में गोविन्द मिश्र का अत्यन्त चर्चित उपन्यास है जिसमें उन्होंने आधुनिकता और परम्परा के बीच फँसी भारतीय स्त्री का एक अभूतपूर्व चित्र प्रस्तुत किया है। एक ऐसा चरित्र जो अपनी तमाम संश्लिष्टताओं में इतना सजीव है कि कहना कठिन हो जाए कि हम किसी कथा-पात्र से मिल रहे हैं या अपने आसपास के किसी जीते-जागते व्यक्ति से।</p> <p>गोविन्द मिश्र को अपने परिवेश और देखे-जाने चरित्रों को लेकर ऐसे पात्र गढ़ने के लिए जाना जाता है जो मनुष्यता के शाश्वत प्रश्नों की खोज का प्रतीक बन जाते हैं। इस उपन्यास में भी उन्होंने तर्क तथा भावना के द्वन्द्व के बीच से ऐसी ही एक कहानी रची है जो प्रेम को केन्द्र में रखते हुए अस्तित्व के गम्भीर प्रश्नों से होकर गुजरती है।</p> <p>विख्यात कथाकार अमृतलाल नागर ने इसीलिए इस उपन्यास को समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण कथा-कृति बताया था।</p> <p>सुवर्णा अपने भीतर के बहुमूल्य की खोज में अपने वजूद के कई बिन्दुओं से गुजरती है, अपने विवाहित जीवन, अपने घर-परिवार और कैरियर के अलग-अलग मोर्चों पर संघर्ष करते हुए उसकी यह भीतरी-बाहरी यात्रा एक तरह से आधुनिक संस्कृति के खोखलेपन को उजागर करती हुई, मुक्ति की अवधारणा और पारम्परिक बन्धनों के संघर्ष की यात्रा बन जाती है।</p> <p>जीवन के यथार्थ को अपने भीतर समेटे वृहत्तर सन्दर्भों तक फैली एक मार्मिक यात्रा।
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तुम्हारी रोशनी में गोविन्द मिश्र का अत्यन्त चर्चित उपन्यास है जिसमें उन्होंने आधुनिकता और परम्परा के बीच फँसी भारतीय स्त्री का एक अभूतपूर्व चित्र प्रस्तुत किया है। एक ऐसा चरित्र जो अपनी तमाम संश्लिष्टताओं में इतना सजीव है कि कहना कठिन हो जाए कि हम किसी कथा-पात्र से मिल रहे हैं या अपने आसपास के किसी जीते-जागते व्यक्ति से।</p>
<p>गोविन्द मिश्र को अपने परिवेश और देखे-जाने चरित्रों को लेकर ऐसे पात्र गढ़ने के लिए जाना जाता है जो मनुष्यता के शाश्वत प्रश्नों की खोज का प्रतीक बन जाते हैं। इस उपन्यास में भी उन्होंने तर्क तथा भावना के द्वन्द्व के बीच से ऐसी ही एक कहानी रची है जो प्रेम को केन्द्र में रखते हुए अस्तित्व के गम्भीर प्रश्नों से होकर गुजरती है।</p>
<p>विख्यात कथाकार अमृतलाल नागर ने इसीलिए इस उपन्यास को समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण कथा-कृति बताया था।</p>
<p>सुवर्णा अपने भीतर के बहुमूल्य की खोज में अपने वजूद के कई बिन्दुओं से गुजरती है, अपने विवाहित जीवन, अपने घर-परिवार और कैरियर के अलग-अलग मोर्चों पर संघर्ष करते हुए उसकी यह भीतरी-बाहरी यात्रा एक तरह से आधुनिक संस्कृति के खोखलेपन को उजागर करती हुई, मुक्ति की अवधारणा और पारम्परिक बन्धनों के संघर्ष की यात्रा बन जाती है।</p>
<p>जीवन के यथार्थ को अपने भीतर समेटे वृहत्तर सन्दर्भों तक फैली एक मार्मिक यात्रा।
Book Details
-
ISBN9789394902893
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Anirudh Umat
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- Description: ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया। —कृष्ण बलदेव व
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