Santaronwali Ladki
(0)
Author:
Jostein GaarderPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
195
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महान बाल-साहित्य ‘सोफीज़ वर्ल्ड’ के रचनाकार यॉस्टेन गेर्डर की यह कृति किशोर वय के पाठकों को ध्यान में रखकर संवेदनशील भाषा में एक परिकथा की तरह रची गई है। ग्योर्ग रोएड को सन्तरोंवाली लड़की की कहानी उसकी लाल रंग की बच्चागाड़ी में मिलती है जिसे उसके पिता ने अपनी मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व उसी के लिए लिखा था। दरअसल यह प्रेम से लिखी गई एक गहन प्रेमकथा है जो संवेदना, धैर्य, उत्कंठा के साथ-साथ नैतिक और प्राकृतिक सौन्दर्य के वैभव से बुनी पहेली जैसी लगती है। यह सहज भाषा में लिखी गई एक असाधारण कथा है जो पाठकों को एक रचनात्मक आस्वाद प्रदान करती है। हिन्दीभाषी पाठकों को यह पुस्तक न केवल पठनीय लगेगी, बल्कि वे इसे वर्षों भुला नहीं पाएँगे।
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महान बाल-साहित्य ‘सोफीज़ वर्ल्ड’ के रचनाकार यॉस्टेन गेर्डर की यह कृति किशोर वय के पाठकों को ध्यान में रखकर संवेदनशील भाषा में एक परिकथा की तरह रची गई है। ग्योर्ग रोएड को सन्तरोंवाली लड़की की कहानी उसकी लाल रंग की बच्चागाड़ी में मिलती है जिसे उसके पिता ने अपनी मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व उसी के लिए लिखा था। दरअसल यह प्रेम से लिखी गई एक गहन प्रेमकथा है जो संवेदना, धैर्य, उत्कंठा के साथ-साथ नैतिक और प्राकृतिक सौन्दर्य के वैभव से बुनी पहेली जैसी लगती है। यह सहज भाषा में लिखी गई एक असाधारण कथा है जो पाठकों को एक रचनात्मक आस्वाद प्रदान करती है। हिन्दीभाषी पाठकों को यह पुस्तक न केवल पठनीय लगेगी, बल्कि वे इसे वर्षों भुला नहीं पाएँगे।
Book Details
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ISBN9788126712861
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतीय संगीत का एक दौर रहा है जब संगीत के प्रस्तोता नहीं, साधक हुआ करते थे। वे अपने लिए गाते थे और सुननेवाले उनके स्वरों को प्रसाद की तरह ग्रहण करते थे। ऐसा नहीं कि आज के गायकों-कलाकारों की तरह वे सेलेब्रिटी नहीं थे, वे शायद उससे भी ज़्यादा कुछ थे, लेकिन कुरुचि के आक्रमणों से वे इतनी दूर हुआ करते थे जैसे पापाचारी देहधारियों से दूर कहीं देवता रहें। बाज़ार के इशारों पर न उनके अपने पैमाने झुकते थे, न उनकी वह स्वर-शुचिता जिसे वे अपने लिए तय करते थे। उनका बाज़ार भी गलियों-कूचों में फैला आज-सा सीमाहीन बाज़ार नहीं था, वह सुरुचि का एक क़िला था जिसमें अच्छे कानवाले ही प्रवेश पा सकते थे।
मृणाल पाण्डे का यह उपन्यास टुकड़ों-टुकड़ों में उसी दुनिया का एक पूरा चित्र खींचता है। केन्द्र में हैं पहाड़ पर अंग्रेज़ बाप से जन्मी अंजलिबाई और उसकी माँ हीरा। दोनों अपने वक़्तों की बड़ी और मशहूर गानेवालियाँ। न सिर्फ़ गानेवालियाँ बल्कि ख़ूबसूरती और सभ्याचार में अपनी मिसाल आप। पहाड़ की बेटी हीरा एक अंग्रेज़ अफ़सर एडवर्ड के. हिवेट की नज़र को भायी तो उसने उस समय के अंग्रेज़ अफ़सरों की अपनी ताक़त का इस्तेमाल करते हुए उसे अपने घर बिठा लिया और एक बेटी को जन्म दिया, नाम रखा विक्टोरिया मसीह। हिवेट की लाश एक दिन जंगलों में पाई गई और नाज़-नखरों में पल रही विक्टोरिया अनाथ हो गई। शरण मिली बनारस में जो संगीत का और संगीत के पारखियों का गढ़ था।
लेकिन यह कहानी उपन्यासकार को कहीं लिखी हुई नहीं मिली, इसे उसने अपने उद्यम से, यात्राएँ करके, लोगों से मिलकर, बातें करके, यहाँ-वहाँ बिखरी लिखित-मौखिक जानकारियों को इकट्ठा करके पूरा किया है। इस तरह पत्र-शैली में लिखा गया यह उपन्यास कुछ-कुछ जासूसी उपन्यास जैसा सुख भी देता है।
मृणाल पाण्डे अंग्रेज़ी में भी लिखती हैं और हिन्दी में भी। इस उपन्यास में उन्होंने जिस गद्य को सम्भव किया है, वह अनूठा है। वह सिर्फ़ कहानी नहीं कहता, अपना पक्ष भी रखता चलता है और विपक्ष की पहचान करके उसे धराशायी भी करता है। इस कथा को पढ़कर संगीत के एक स्वर्ण-काल की स्मृति उदास करती है और जहाँ खड़े होकर कथाकार यह कहानी बताती हैं, वहाँ से उस वक़्त से कोफ़्त भी होती है जिसके चलते यह सब हुआ, या होता है।
Yuvraj Chunda
- Author Name:
Bhagwaticharan Verma
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युवराज चूण्डा का प्रस्थान-बिन्दु इतिहास है— राजपूत काल का इतिहास। उपन्यासकार का उद्देश्य न तो सिर्फ व्यतीत हो चुके समय का चित्रण करना है, और न ही उस काल के यथार्थ की अनदेखी कर उसका आकर्षक किन्तु अयथार्थ चित्र प्रस्तुत करना—ऐतिहासिक कथा का आवरण लेकर भी उसने इस देश की उस चारित्रिक विशेषता का उद्घाटन करने का प्रयत्न किया है जो न केवल हमारी वर्षों की गुलामी का कारण बनी रही, बल्कि आज भी वह किसी-न-किसी रूप में हमारी जड़ों में घुन की तरह लगी है—“वैसे अगर राजस्थान के राजपूत राजा संयुक्त रूप से दिल्ली की बादशाहत पर आक्रमण करते तो वे उसका अन्त कर सकते थे, लेकिन आपसी कलह और विग्रह के कारण यह सम्भव नहीं था।”
‘युवराज चूण्डा’ की कहानी वस्तुत: नितान्त कुरूप यथार्थ के परिवेश में आदर्शवाद की कहानी है, जो आज भी न केवल अत्यन्त पठनीय है बल्कि कहीं अधिक प्रासंगिक भी।
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