The Unfrazzled Kite
Author:
Kamal PandaPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
EnglishCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 201.45
₹
237
Available
Aaditya had it all; he was successful, wealthy and at the top of his game, yet he felt a void in his life. He was ready to relinquish all to find out the secret his father tried to tell him When he was breathing his last and also to seek out his lost love one last time. Would she still be waiting for him after all these years? What was his father trying to tell him? How far would you go to find out the truth? Aaditya decided to go back to his roots in a quest to find all that he had lost…..
ISBN: 9788194128977
Pages: 1600
Avg Reading Time: 27 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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कुछ कहानियाँ : कुछ विचार पुस्तक से
Panch Aangnon Wala Ghar
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

- Description: क़रीब पचास वर्षों में फैली ‘पाँच आँगनों वाला घर’ के सरकने की कहानी दरअसल तीन पीढ़ियों की कहानी है—एक वह जिसने 1942 के आदर्शों की साफ़ हवा अपने फेफड़ों में भरी, दूसरी वह जिसने उन आदर्शों को धीरे-धीरे अपनी हथेली से झरते देखा और तीसरी वह जो उन आदर्शों को सिर्फ़ पाठ्य-पुस्तकों में पढ़ सकी। परिवार कैसे उखड़कर सिमटता हुआ क़रीब-क़रीब नदारद होता जा रहा है—व्यक्ति को उसकी वैयक्तिकता के सहारे अकेला छोड़कर! गोविन्द मिश्र के इस सातवें उपन्यास को पढ़ना अकेले होते जा रहे आदमी की उसी पीड़ा से गुज़रना है।
Trishul
- Author Name:
Shivmurti
- Book Type:

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Description:
‘त्रिशूल’ वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति का ऐसा उपन्यास है जो उनकी कहानियों की लीक से हटकर एक नए दृष्टिबोध और तेवर के साथ सामने आता है। साम्प्रदायिकता और जातिवाद हमारे समाज में अरसे से जड़ जमाए बैठे हैं पर इनकी आँच पर राजनीति की रोटी सेंकने की होड़ के चलते इनके ज़हर और आक्रामकता में इधर चिन्ताजनक वृद्धि हुई है। फलस्वरूप, आज समाज में भयानक असुरक्षा, अविश्वास और वैर-भाव पनप रहा है। धर्म, जाति और सम्प्रदाय के ठेकेदार आदमी और आदमी के बीच की खाई को निरन्तर चौड़ी करते जा रहे हैं।
‘त्रिशूल’ न केवल मन्दिर-मंडल की बल्कि आज के समाज में व्याप्त उथल-पुथल और टूटन की कहानी है। देशव्यापी उथल-पुथल को कथ्य बनाकर लेखक जातिवाद के विरूप और साम्प्रदायिकता की साज़िश को बेबाकी और निर्ममता से बेनक़ाब करता है। ओछे हिन्दूवाद को ललकारता है।
त्रिशूल को प्रशंसा के फूल ही नहीं, विरोध के पत्थर भी कम नहीं मिले। इसे जातियुद्ध भड़काने और आग लगानेवाली रचना कहा गया। इस पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए पैम्फ़लेटों और सभाओं द्वारा लम्बा निन्दा अभियान चलाया गया।
यह उपन्यास इस तथ्य को भी स्पष्टता से इंगित करता है कि प्रतिगामी शक्तियों का मुँहतोड़ जवाब शोषण और उत्पीड़न झेल रहे दबे-कुचले ग़रीबजन ही दे सकते हैं, दे रहे हैं।
उपन्यास के पात्र, चाहे वह पाले हो, महमूद हो, शास्त्री जी हों, चौकीदार या मिसिराइन हों, यहाँ तक कि गाय, बछड़ा या कुत्ता झबुआ हो, पाठक के दिल में गहराई तक उतर जाते हैं।
भारतीय समाज के अन्तर्विरोधों को उजागर करता एक स्मरणीय-संग्रहणीय उपन्यास।
Tarpan
- Author Name:
Shivmurti
- Book Type:

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Description:
‘तर्पण’ भारतीय समाज में सहस्राब्दियों से शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा है। इसमें एक तरफ़ कई-कई हज़ार वर्षों के दुःख, अभाव और अत्याचार का सनातन यथार्थ है तो दूसरी तरफ़ दलितों के स्वप्न, संघर्ष और मुक्ति चेतना की नई वास्तविकता। इस नई वास्तविकता के मानदंड भी नए हैं, पैंतरे भी नए और अवक्षेपण भी नए। उत्कृष्ट रचनाशीलता के समस्त ज़रूरी उपकरणों से सम्पन्न ‘तर्पण’ दलित यथार्थ को अचूक दृष्टि-सम्पन्नता एवं सरोकार के साथ अभिव्यक्त करता है।
गाँव में ब्राह्मण युवक चन्दर दलित युवती रजपत्ती से बलात्कार की कोशिश करता है। रजपत्ती और साथ की अन्य स्त्रियों के विरोध के कारण वह सफल नहीं हो पाता। उसे भागना पड़ता है। लेकिन दलित बलात्कार किए जाने की रिपोर्ट लिखाते हैं। ‘झूठी रिपोर्ट’ के इस अर्द्धसत्य के ज़रिए शिवमूर्ति हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था के घोर विखंडन का महासत्य प्रकट करते हैं। इस पृष्ठभूमि पर इतनी बेधकता, दक्षता और ईमान के साथ अन्य कोई रचना दुर्लभ है।
समकालीन कथा साहित्य में शिवमूर्ति ग्रामीण वास्तविकता के सर्वाधिक समर्थ और विश्वसनीय लेखकों में हैं। ‘तर्पण’ उनकी क्षमताओं का शिखर है। रजपत्ती, भाईजी, मालकिन, धरमू पंडित जैसे अनेक चरित्रों के साथ अवध का एक गाँव अपनी पूरी सामाजिक, भौगोलिक संरचना के साथ यहाँ उपस्थित है। गाँव के लोग-बाग, प्रकृति, रीति-रिवाज, बोली-बानी—सब कुछ—शिवमूर्ति के जादू से जीवित-जाग्रत हो उठे हैं। युगों की रुद्ध शापित चेतना जब अपने प्रतिरोध और प्रतिशोध पर परवान चढ़ती है तो उसकी नज़र वर्तमान तक ही महदूद नहीं रहती, वह अतीत के सारे अभिशप्त पुरखों का तर्पण करती है और वैयक्तिकता सामूहिकता में ढलकर क्रान्ति का नया पाठ रचती है।
संक्षेप में कहें तो ‘तर्पण’ ऐसी औपन्यासिक कृति है जिसमें मनु की सामाजिक व्यवस्था का अमोघ सन्धान किया गया है। एक भारी उथल-पुथल से भरा यह उपन्यास भारतीय समय और राजनीति में दलितों की नई करवट का सचेत, समर्थ और सफल आख्यान है।
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