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पुरुष-शासित समाज में मर्द को क्या कभी अहसास होगा कि औरत युग-युगान्तरों से अपने अन्तस में कितना अभिमान, अपमान, पीड़ा और ग्लानि छिपाए, उसे प्यार करती है? हज़ार असहमति, आपत्ति, विक्षोभ और असहनीय विसंगतियों के बावजूद, उसके साथ हमक़दम होकर सफ़र जारी रखती है? महानगर में हुई एक परिचित-सी घटना के सहारे लेखिका सुचित्रा भट्टाचार्य ने इस उपन्यास में वर्तमान समय और समाज की अँधेरी सच्चाइयों और मर्द की तानाशाहियों को क़लमबन्द किया है। ‘दहन’ महानगर के टालीगंज इलाक़े में चार समाज-दुश्मन नौजवानों के अश्लील शिकंजे से किसी गृहवधू को बचाने के लिए अपूर्व साहस से कूद पड़नेवाली एक औरत के तजुर्बे की हक़ीक़त है; उसने पुरुषत्व के अहंकार में औरत को अपने जु़ल्म और अत्याचार का शिकार बनानेवाले मर्दों के ख़िलाफ़ सामाजिक इंसाफ़ की वकालत की; उन्हें उचित सज़ा दिलाने के लिए थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी तक भी दौड़ लगाने में हिचक नहीं की। अपनी साहसिकता के क्षणिक अभिनन्दन के बाद, उसने भयंकर अचरज के साथ आविष्कार किया कि नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानेवाली और उनसे जूझने को तैयार औरत पर कितने-कितने माध्यमों से, कितनी-कितनी तरह के दबाव उसे निष्क्रिय और तुच्छ बना देते हैं। उसका प्रतिवाद, यहाँ तक कि उस पर लगाए गए अनगिनत लांछन भी उस बर्बर दबाव में पिसकर रह जाते हैं। ‘दहन’ उपन्यास, वर्तमान नारी-स्वातंत्र्य का असली चेहरा दिखाता है और पुरुष-शक्ति के नपुंसक और खोखले मूल्यबोध की हक़ीक़त बयान करता है, और वर्तमान समाज और पुरुषों द्वारा औरत की हिम्मत और मुक़ाबले की ताक़त को तोड़ने की साज़िश का पर्दाफ़ाश करता है।

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पुरुष-शासित समाज में मर्द को क्या कभी अहसास होगा कि औरत युग-युगान्तरों से अपने अन्तस में कितना अभिमान, अपमान, पीड़ा और ग्लानि छिपाए, उसे प्यार करती है? हज़ार असहमति, आपत्ति, विक्षोभ और असहनीय विसंगतियों के बावजूद, उसके साथ हमक़दम होकर सफ़र जारी रखती है? महानगर में हुई एक परिचित-सी घटना के सहारे लेखिका सुचित्रा भट्टाचार्य ने इस उपन्यास में वर्तमान समय और समाज की अँधेरी सच्चाइयों और मर्द की तानाशाहियों को क़लमबन्द किया है।

‘दहन’ महानगर के टालीगंज इलाक़े में चार समाज-दुश्मन नौजवानों के अश्लील शिकंजे से किसी गृहवधू को बचाने के लिए अपूर्व साहस से कूद पड़नेवाली एक औरत के तजुर्बे की हक़ीक़त है; उसने पुरुषत्व के अहंकार में औरत को अपने जु़ल्म और अत्याचार का शिकार बनानेवाले मर्दों के ख़िलाफ़ सामाजिक इंसाफ़ की वकालत की; उन्हें उचित सज़ा दिलाने के लिए थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी तक भी दौड़ लगाने में हिचक नहीं की। अपनी साहसिकता के क्षणिक अभिनन्दन के बाद, उसने भयंकर अचरज के साथ आविष्कार किया कि नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानेवाली और उनसे जूझने को तैयार औरत पर कितने-कितने माध्यमों से, कितनी-कितनी तरह के दबाव उसे निष्क्रिय और तुच्छ बना देते हैं। उसका प्रतिवाद, यहाँ तक कि उस पर लगाए गए अनगिनत लांछन भी उस बर्बर दबाव में पिसकर रह जाते हैं।

‘दहन’ उपन्यास, वर्तमान नारी-स्वातंत्र्य का असली चेहरा दिखाता है और पुरुष-शक्ति के नपुंसक और खोखले मूल्यबोध की हक़ीक़त बयान करता है, और वर्तमान समाज और पुरुषों द्वारा औरत की हिम्मत और मुक़ाबले की ताक़त को तोड़ने की साज़िश का पर्दाफ़ाश करता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Weight
196 grams
ISBN-13
9788171195909
Pages
167
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21 cm
Language
Hindi

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