Bina Darvaze Ka Makaan
Author:
Ramdarash MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त किसी युवती को जब जीवन-ज्ञापन के लिए काम करना पड़ता है तो समाज के भूखे भेड़िए उसे ललचाई नज़रों से देखने लगते हैं। लेकिन जब उसकी आर्थिक विपन्नता के साथ उसके पति की शारीरिक निष्क्रियता भी जुड़ जाए, तो उसे सार्वजनिक सम्पत्ति ही समझ लिया जाता है। ‘बिना दरवाज़े का मकान’ की नायिका दीपा निम्न वर्ग की एक ऐसी ही अभिशप्त युवती है जो जीविकोपार्जन के साथ-साथ अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। उसकी जीवन-प्रक्रिया तथा संघर्ष के क्रम में सम्भ्रान्त बेनक़ाब होता जाता है और दो समाज आमने-सामने तने हुए दिखाई पड़ते हैं। दिल्ली की एक भरी-पूरी कॉलोनी की पृष्ठभूमि पर आधारित कथा कभी-कभी गाँव की ओर भी चली जाती है और तब विडम्बना एकदम गहरा जाती है। दर्द और यातना के गहरे प्रसार के बीच जिजीविषा एवं संघर्ष से उत्पन्न मूल्य-चेतना उपन्यास को और सशक्त बनाती है।
ISBN: 9788171783137
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: "वैचारिक दृष्टि से भाजपा एक सामान्य राजनैतिक दल नहीं है जो सत्ता प्राप्ति के स्वार्थ से जुड़कर और प्रेरित होकर अपना कार्य करते हैं। भाजपा एक ऐसा राजनैतिक दल है जो एक विशिष्ट विचारधारा और राजनीतिक शैली को भारत की राजनीति में स्थापित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर कार्य कर रही है। हम सब परिपक्व विचारधारा के प्रति समर्पित एक परिपक्व कार्यकर्ता है। हमारे अंदर लोग भारतीयता की झलक देखते हैं। और इसके माध्यम से राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान की अपेक्षा करते हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में देश की जनता ने किसी भी दल से इतनी अपेक्षाएँ नहीं कीं जितनी कि हमसे की हैं। --- भाजपा का वैचारिक अधिष्ठान सांस्कृतिक रावाद है। विगत दो दशकों में पश्चिमी मॉडल पर जिस तेजी से आर्थिक प्रगति हो रही है, वह उतनी ही तेजी से पश्चिमी जीवन मूल्य हमारे शाश्वत सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक आदर्शों और परिवार के स्वरूप पर भी आघात कर रहे हैं। अन्य राजनैतिक दल भले ही इसे गंभीरता से न लेते हों परंतु भारत और भारतीयता के प्रति समर्पित भारतीय जनता पार्टी की दृष्टि में यह एक गंभीर चुनौती है। --- अनेक राजनैतिक दलों ने जहाँ जाति, पंथ और मजहब का सहारा लेकर वोट की राजनीति करने में कोई संकोच नहीं किया वहीं हमने वोट से ज्यादा अहमियत ‘राष्ट्र’ को दिया। हमारे सामने वोट से बड़ा राष्ट्र है और हमें इस बात का सुकून है कि हमने जिन बातों का विरोध किया, वह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य था। हम अपराधबोध से ग्रस्त नहीं हैं। —इसी पुस्तक से --- ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ जिस राजनीतिक दल का प्राणतत्त्व है, जिसने कभी वोट-बैंक की राजनीति नहीं की, जिसने सदा राष्ट्रीय अस्मिता और सुरक्षा को सबसे अधिक प्रमुखता दी है, जो ‘भय-भूख-भ्रष्टाचार’ से आक्रांत कोटि-कोटि भारतीयों की आशा का केंद्र है—ऐसी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह के चिंतनपरक, प्रखर, ओजस्वी विचारों का पठनीय एवं प्रेरणाप्रद संकलन।
Nirvasan
- Author Name:
Akhilesh
- Book Type:

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Description:
अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ पारम्परिक ढंग का उपन्यास नहीं है। यह आधुनिकतावादी या जादुई यथार्थवादी भी नहीं। यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद की ख़ूबियाँ सँजोए असल में यह भारतीय ढंग का उपन्यास है। यहाँ अमूर्त नहीं, बहुत ही वास्तविक, कारुणिक और दुखदायी निर्वासन है। सूत्र रूप में कहें तो यह उपन्यास औपनिवेशिक आधुनिकता/ मानसिकता के कारण पैदा होनेवाले निर्वासन की महागाथा है जो पूँजीवादी संस्कृति की नाभि में पलते असन्तोष और मोहभंग को उद्घाटित करने के कारण राजनीतिक-वैचारिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। जॉर्ज लूकाच ने चेतना के दो रूपों का ज़िक्र किया है : वास्तविक चेतना तथा संभाव्य चेतना। लूकाच के मुताबिक़ संभाव्य चेतना को छूनेवाला उपन्यास वास्तविक चेतना के इर्द-गिर्द मँडरानेवाले उपन्यास से श्रेष्ठ है। कहने की ज़रूरत नहीं, ‘निर्वासन’ इस संभाव्य चेतना को स्पर्श कर रहा उपन्यास है जिसकी अभी सिर्फ़ कुछ आहटें आसपास सुनाई पड़ रही हैं।
आधुनिकता के सांस्कृतिक मूल्यों में अन्तर्निहित विडम्बनाओं का उद्घाटन करनेवाला अपने तरह का हिन्दी में लिखा गया यह पहला उपन्यास है। ‘निर्वासन’ सफलता और उपलब्धियों के प्रचलित मानकों को ही नहीं समस्याग्रस्त बनाता अपितु जीव-जगत के बारे में प्राय: सर्वमान्य सिद्ध सत्यों को भी प्रश्नांकित करता है। दूसरे धरातल पर यह उपन्यास अतीत की सुगम-सरल, भावुकतापूर्ण वापसी का प्रत्याख्यान है। वस्तुत: ‘निर्वासन’ के पूरे रचाव में ही जातिप्रथा, पितृसत्ता जैसे कई सामन्ती तत्त्वों की आलोचना विन्यस्त है। इस प्रकार ‘निर्वासन’ आधुनिकता के साथ भारतीयता की पुनरुत्थानवादी अवधारणा को भी निरस्त करता है।
लम्बे अर्से बाद ‘निर्वासन’ के रूप में ऐसा उपन्यास सामने है जिसमें समाज वैज्ञानिक सच की उपेक्षा नहीं है किन्तु उसे अन्तिम सच भी नहीं माना गया है। साहित्य की शक्ति और सौन्दर्य का बोध करानेवाले इस उपन्यास में अनेक इस तरह की चीज़ें हैं जो वैचारिक अनुशासनों में नहीं दिखेंगी। इसीलिए इसमें समाज वैज्ञानिकों के लिए ऐसा बहुत-कुछ है जो उनके उपलब्ध सच को पुनर्परिभाषित करने की सामर्थ्य रखता है।
कहना अनुचित न होगा कि उपन्यास की दुनिया में ‘निर्वासन’ एक नया और अनूठा प्रस्थान है।
—राजकुमार
Kharidi Kaudiyon Ke Mol : Vols. 1-2
- Author Name:
Bimal Mitra
- Book Type:

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Description:
‘ख़रीदी कौड़ियों के मोल’ बांग्ला का वृहत्तम और अन्यतम उपन्यास है।
दीपंकर इस उपन्यास का नायक है : राष्ट्रीय और सामाजिक बवंडर में फँसी मानवता और युग-यंत्रणा का प्रतिनिधि। उसके अघोर नाना ने कहा था कि कौड़ियों से सब कुछ ख़रीदा जा सकता है। नाना के कथन का सबूत मिस्टर घोषाल, मिस्टर पालित, नयनरंजिनी, छिटे, फोटा, लक्ष्मी दी आदि ने देना चाहा, परन्तु दीपंकर का आदर्शबोध उनके मतवाद से टकराकर रह गया। दीपंकर के जीवन ने प्रमाण दिया कि पैसे से सुख नहीं ख़रीदा जा सकता। फिर भी दीपंकर का जीवन ऊपर से देखने में सुखी नहीं है। मामूली क्लर्क से वह रेलवे का बहुत बड़ा ऑफ़िसर बना, लेकिन अन्त तक उसे जीवन के जुलूस से कटकर अज्ञातवास है। इस ट्रेजेडी का कारण है कलयुग। इस युग में रामराज्य की स्थापना असम्भव है, और रावणराज्य की स्थापना स्वाभाविक। इसीलिए इस उपन्यास का रावण, मिस्टर घोषाल, जेल से निकलकर और अधिक शक्तिशाली बन गया और आवारा फोटा खद्दर ओढ़कर कांग्रेस का बड़ा नेता फटिक बाबू। सती मानवी आकांक्षा की मूर्ति है तो उसका पति सनातन बाबू सच्चाई और आदर्श का प्रतीक। परन्तु आज सच्चाई अपंग और आदर्श नपुंसक है। इसलिए सती का सर्वनाश होकर रहा। सीता का सर्वनाश वाल्मीकि नहीं टाल सके तो सती का सर्वनाश बिमल बाबू कैसे रोक पाते! बांग्ला का यह महान् उपन्यास हर हिन्दी पाठक के लिए पठनीय है। इसके अनुवाद की विशेषता यह है कि मूल को अविकल रखा गया है और बांग्ला उपन्यासों के हिन्दी रूपान्तर में प्राय: जो अर्थ का अनर्थ होता है, उससे यह सर्वथा मुक्त है।
Yah Sharif Log
- Author Name:
Razia Sajjad Zahir
- Book Type:

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Description:
‘यह शरीफ़ लोग’ की लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर उर्दू की लब्धप्रतिष्ठ कथाकारों में हैं। उनकी अनेक कहानियाँ और उपन्यास साहित्य-जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। रज़िया सज्जाद ज़हीर अपनी स्पष्ट एवं स्वतंत्र विचारधारा के लिए विख्यात थीं। उन्होंने उर्दू-हिन्दी भाषिक समस्या के समाधान के लिए उर्दू को नागरी लिपि धारण करने की सलाह दी थी, जिसे सिद्धान्त रूप में स्वीकारने के बावजूद रूढ़िवादियों ने विवाद का विषय बना लिया था, किन्तु प्रस्तुत यथार्थ के खंडन के लिए तर्क न दे सके।
‘यह शरीफ़ लोग’ में उन्हें निर्भीक, स्वतंत्र, समाजवादी, मानववादी रज़िया सज्जाद ज़हीर का परिचय मिलता है, जो समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन एवं मान्यताओं का विश्लेषण करके उसे अपनी अनुभूति के आधार पर प्रस्तुत करती हैं। आर्थिक असमानताएँ उत्पन्न विषमताओं का पर्दाफ़ाश करती हैं, और मानव-जीवन की मूल समस्याओं की ओर सहज ही ध्यान आकृष्ट करती हैं।
‘यह शरीफ़ लोग’ का परिवेश मध्यवर्गीय एवं निम्नवर्गीय मुस्लिम परिवारों से सम्बन्धित है जिनकी मान्यताओं में परस्पर द्वन्द्व हैं, परन्तु उनमें एक-दूसरे को अस्वीकारने का साहस नहीं। दोनों पूरक के रूप में एक-दूसरे को योग देते हैं तथा साथ-साथ जीवन-यापन करते हैं, किन्तु जब अत्याचारों का प्याला भर जाता है, तो छलक उठता है और शोषित वर्ग कठोर अन्याय के विरुद्ध संघर्षशील हो उठता है।
‘यह शरीफ़ लोग’ की भाषा सीधे व्यवहार की भाषा है। मुस्लिम परिवारों, विशेषकर महिलाओं की बातचीत अत्यन्त स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत हुई है। जीवन्त पात्रों एवं कथानक की रोचकता ने प्रस्तुत उपन्यास को नैसर्गिक बना दिया है।
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