Sitam Ki Intiha Kya Hai
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‘सितम की इन्तिहा क्या है’ पुस्तक का स्थायी-भाव यह है कि मुक्ति-संग्राम की संघर्ष-यात्रा में क्या ‘शब्द’ की कोई असरदार भूमिका रही? इसका सीधा-सपाट उत्तर यही होगा कि नहीं। परन्तु ज़ब्तशुदा साहित्य का इतिहास इस राय की पुष्टि नहीं करता। उस दौर की केवल ज़ब्तशुदा नाट्य-कृतियों की सबल उपस्थिति ही चुनौती बनकर सामने मौजूद है। भारत के पहले ज़ब्तशुदा नाटक ‘नीलदर्पण’ (बांग्ला) अर्थात् शब्द की लिखित शक्ति ने ब्रिटिश शासन को सकते में डाल दिया; शब्द की वाचन-सम्भावनाओं—अर्थात् अभिनय द्वारा भावोत्तेजना उत्पन्न करना—का तो अनुमान लगाना कभी मुमकिन नहीं रहा। अभिनेता-निर्देशक गिरीश घोष जैसे कलाकारों की इस विलक्षण क्षमता से घबराई ब्रिटिश सरकार को ‘ड्रामैटिक परफ़ारमेंस एक्ट’ लागू करना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में यह कहना अत्युक्ति न होगी कि ‘सितम की इन्तिहा क्या है’ दुर्लभ अभिलेखों की एक ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें एक अछूते विषय का पहली बार वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हुआ है। इस पुस्तक की कुछ विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। इस पुस्तक में जिन सात ज़ब्तशुदा हिन्दी नाटकों को प्रकाशित किया जा रहा है, हिन्दी नाट्य-जगत उनका पहली बार साक्षात्कार करेगा; दूसरे, देश-विदेश से दुर्लभ अभिलेखों की खोज से मिली इन नाट्य-कृतियों, उनके लेखकों का यथेष्ट विश्लेषण एवं उन्हें हर पहलू से देखा-परखा गया है। इस पुस्तक के पहले दो खंड इस मूल सवाल का सामना करते हैं कि इन मामूली लेखकों में इतनी विद्रोही-वृत्ति कैसे पैदा हुई कि उनकी कृतियों पर प्रतिबन्ध लगाने पड़े? व्यापक फलक पर इसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक था। 19वीं सदी और 20वीं सदी के 30 के दशक तक की 24 विप्लवधर्मी विभूतियों के उन विचारों या अवधारणाओं का आकलन भी इसमें किया गया है जिनमें अपने-अपने प्रकार से जीवन या समाज या राजनीति में आमूल बदलाव के आवेग या प्रतिकार या राजद्रोह की चिनगारियाँ थीं। पुस्तक में समाहित तत्कालीन पत्रिकाओं-पुस्तकों में प्रयुक्त, मुखपृष्ठों, चित्रों, रेखांकनों की प्रस्तुति इसे और अधिक उपयोगी बनाती है।
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‘सितम की इन्तिहा क्या है’ पुस्तक का स्थायी-भाव यह है कि मुक्ति-संग्राम की संघर्ष-यात्रा में क्या ‘शब्द’ की कोई असरदार भूमिका रही? इसका सीधा-सपाट उत्तर यही होगा कि नहीं। परन्तु ज़ब्तशुदा साहित्य का इतिहास इस राय की पुष्टि नहीं करता। उस दौर की केवल ज़ब्तशुदा नाट्य-कृतियों की सबल उपस्थिति ही चुनौती बनकर सामने मौजूद है। भारत के पहले ज़ब्तशुदा नाटक ‘नीलदर्पण’ (बांग्ला) अर्थात् शब्द की लिखित शक्ति ने ब्रिटिश शासन को सकते में डाल दिया; शब्द की वाचन-सम्भावनाओं—अर्थात् अभिनय द्वारा भावोत्तेजना उत्पन्न करना—का तो अनुमान लगाना कभी मुमकिन नहीं रहा। अभिनेता-निर्देशक गिरीश घोष जैसे कलाकारों की इस विलक्षण क्षमता से घबराई ब्रिटिश सरकार को ‘ड्रामैटिक परफ़ारमेंस एक्ट’ लागू करना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में यह कहना अत्युक्ति न होगी कि ‘सितम की इन्तिहा क्या है’ दुर्लभ अभिलेखों की एक ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें एक अछूते विषय का पहली बार वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हुआ है।
इस पुस्तक की कुछ विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। इस पुस्तक में जिन सात ज़ब्तशुदा हिन्दी नाटकों को प्रकाशित किया जा रहा है, हिन्दी नाट्य-जगत उनका पहली बार साक्षात्कार करेगा; दूसरे, देश-विदेश से दुर्लभ अभिलेखों की खोज से मिली इन नाट्य-कृतियों, उनके लेखकों का यथेष्ट विश्लेषण एवं उन्हें हर पहलू से देखा-परखा गया है।
इस पुस्तक के पहले दो खंड इस मूल सवाल का सामना करते हैं कि इन मामूली लेखकों में इतनी विद्रोही-वृत्ति कैसे पैदा हुई कि उनकी कृतियों पर प्रतिबन्ध लगाने पड़े? व्यापक फलक पर इसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक था। 19वीं सदी और 20वीं सदी के 30 के दशक तक की 24 विप्लवधर्मी विभूतियों के उन विचारों या अवधारणाओं का आकलन भी इसमें किया गया है जिनमें अपने-अपने प्रकार से जीवन या समाज या राजनीति में आमूल बदलाव के आवेग या प्रतिकार या राजद्रोह की चिनगारियाँ थीं।
पुस्तक में समाहित तत्कालीन पत्रिकाओं-पुस्तकों में प्रयुक्त, मुखपृष्ठों, चित्रों, रेखांकनों की प्रस्तुति इसे और अधिक उपयोगी बनाती है।
Book Details
-
ISBN9788181970312
-
Pages630
-
Avg Reading Time21 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Aapka Bunti
- Author Name:
Mannu Bhandari
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‘आपका बंटी’ मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिसके बिना न बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है न स्त्री–विमर्श को सही धरातल पर समझा जा सकता है। तीस वर्ष पहले (1970 में) लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी की लोकप्रिय पुस्तकों की पहली पंक्ति में है। दर्जनों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी वैसा ही है जैसा ‘धर्मयुग’ में पहली बार धारावाहिक रूप से प्रकाशन के दौरान था। बच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की यह दुनिया एक भयावह दु:स्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है या माँ शकुन की। सभी तो एक–दूसरे में ऐसे उलझे हैं कि एक की त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य है कि स्त्री की जायज़ महत्त्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती है—नतीजे में दाम्पत्य तनाव उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं, समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना क़द बढ़ाती ‘नई स्त्री’ का सत्य है। पति–पत्नी के इस द्वन्द्व में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है बंटी, जो नितान्त निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है। बच्चे की चेतना में बड़ों के इस संसार को कथाकार मन्नू भंडारी ने पहली बार पहचाना था। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ–बूझ के लिए चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है। हिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में ‘आपका बंटी’ एक कालजयी उपन्यास है।
Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein
- Author Name:
Mahesh Katare
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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
Ateet Ke Chalchitra
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
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