Sailabi Tatbandh
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यह उपन्यास ढाई सदी बाद की जीवन-स्थितियों का काल्पनिक संसार रचता है; लेकिन नित्य परिवर्तित होती मौजूदा सामाजिक संरचना के परिप्रेक्ष्य में सन् 2151 का समय यथार्थ के बिलकुल पास-पास की ध्वनि देता है।</p> <p>स्त्री-विमर्श के दौर में अपने ढंग से अलग और महत्त्वपूर्ण दख़ल देनेवाली अजित गुप्ता के इस अनूठे उपन्यास के केन्द्र में है सन् 2151 का समय और तब का यौन-जीवन। यहाँ परिवार नहीं है, पति-पत्नी नहीं हैं और न ही हैं घरों में बच्चे। हैं भी तो स्कूल में। धर्म पूर्णतः प्रतिबन्धित है। लेकिन प्रकृति है और वह पात्रों के जीवन में अपनी स्वाभाविक भूमिका निभाती है। मर्यादा और उच्छृंखलता का भेद इतना साफ़ नहीं है कि आतंकित करे। भोग और मनोरंजन ही जीवन के लक्ष्य हैं। लेकिन शरीर की तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। अन्ततः ‘मातृत्व-सुख’ जवाब बनकर सामने खड़ा हो जाता है।</p> <p>उपन्यास की कथा क़िस्सागोई शैली में आगे बढ़ती है। शायद यही वजह है कि पठनीयता कहीं भी बाधित नहीं होती। रोमांस, सेक्स, प्रकृति और मातृत्व के इर्द-गिर्द बुनी इसकी कथा भविष्य की एक फैंटेसी के द्वारा हमारे मौजूदा जीवन-यथार्थ के कई कोने-अँतरे खोलती है।
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यह उपन्यास ढाई सदी बाद की जीवन-स्थितियों का काल्पनिक संसार रचता है; लेकिन नित्य परिवर्तित होती मौजूदा सामाजिक संरचना के परिप्रेक्ष्य में सन् 2151 का समय यथार्थ के बिलकुल पास-पास की ध्वनि देता है।</p>
<p>स्त्री-विमर्श के दौर में अपने ढंग से अलग और महत्त्वपूर्ण दख़ल देनेवाली अजित गुप्ता के इस अनूठे उपन्यास के केन्द्र में है सन् 2151 का समय और तब का यौन-जीवन। यहाँ परिवार नहीं है, पति-पत्नी नहीं हैं और न ही हैं घरों में बच्चे। हैं भी तो स्कूल में। धर्म पूर्णतः प्रतिबन्धित है। लेकिन प्रकृति है और वह पात्रों के जीवन में अपनी स्वाभाविक भूमिका निभाती है। मर्यादा और उच्छृंखलता का भेद इतना साफ़ नहीं है कि आतंकित करे। भोग और मनोरंजन ही जीवन के लक्ष्य हैं। लेकिन शरीर की तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। अन्ततः ‘मातृत्व-सुख’ जवाब बनकर सामने खड़ा हो जाता है।</p>
<p>उपन्यास की कथा क़िस्सागोई शैली में आगे बढ़ती है। शायद यही वजह है कि पठनीयता कहीं भी बाधित नहीं होती। रोमांस, सेक्स, प्रकृति और मातृत्व के इर्द-गिर्द बुनी इसकी कथा भविष्य की एक फैंटेसी के द्वारा हमारे मौजूदा जीवन-यथार्थ के कई कोने-अँतरे खोलती है।
Book Details
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ISBN9788183612289
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: श्रीमान योगी रणजीत देसाई की यह कालजयी रचना अपने मूल मराठी प्रकाशन के कुछ ही समय बाद मराठी भाषियों के बीच जातीय स्मृति ग्रन्थ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त करने में सफल हुई है। जितनी कसावट से इस सुदीर्घ उपन्यास में मुगलकालीन दक्खिन का समय बुना गया है, जिस तरह इसमें सह्यादि क्षेत्र के मनुष्य तो क्या, पत्थर तक बोलते सुनाई देते हैं, उसे देखते हुए महाराष्ट्र में इसका इतना लोकप्रिय हो जाना स्वाभाविक है। लिहाजा इस उपन्यास का हिन्दी में प्रकाशन भी वैसी ही बड़ी घटना है, जैसी मराठी में इसके प्रथम प्रकाशन की घटना। जहाँ-तहाँ भटकने पर मजबूर एक विद्रोही मराठा सामंत की लगभग परित्यक्ता पत्नी अपने बेटे के व्यक्तित्व में अपनी और अपनी समूची जाति की पीड़ाएँ छाप देती है। हीरे-सा कड़ा और पानी सा तरल किशोर शिवाजी हिंदवी स्वराज्य का स्वप्न देखने का दुस्साहस करता है और यही दुस्साहस न सिर्फ उसका बल्कि उसके समूचे समय का भाग्य तय करने लगता है। तलवारों की खनखनाहटों के बीच धीरे-धीरे एक ऐसा चेहरा उभरता है, जिसके लिए जय-पराजय, जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि का फर्क मिट चुका है, जो राजा भी है और योगी भी, जिसे समर्थ गुरु रामदास श्रीमान योगी कहते हैं। किसी महानायक को केन्द्र में रखकर उपन्यास-लेखन एक प्रचलित विधा रही है लेकिन कल्पना के हाथ हमेशा बँधे होने के चलते इसे सर्वाधिक कठिन विधाओं में से एक माननेवाले भी कम नहीं रहे हैं। महानायकों के इर्द-गिर्द जैसे मिथकीय घटाटोप बन जाते हैं, उन्हें भेद कर व्यक्ति की दैन्यताओं, दुर्बलताओं और द्वन्द्वों तक पहुँचना, उन्हें चित्रित करना बहुत कठिन हो जाता है। रणजीत देसाई की रचनात्मक शक्ति इसी बात में है कि वे शिवाजी की स्थापित मूर्ति के भीतर, उसकी अनन्त तहों में घुसते हुए सचमुच के शिवाजी और उनके धड़कते हुए समय तक पहुँच जाते हैं। वे महानायक को जैसे का तैसा स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसके जीवन-तत्त्वों से उसकी पुनर्रचना करते हैं।
Vaidhanik Galp
- Author Name:
Chandan Pandey
- Book Type:

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Description:
गहरी राजनैतिक, सामाजिक पक्षधरता का गद्य होते हुए भी चन्दन का ‘वैधानिक गल्प’ तीव्र आन्तरिक भावनाओं और संवेदनाओं का साथ नहीं छोड़ता। इस मुश्किल जगह से रचे जाने के बावजूद कमाल यह भी है कि यह गल्प के पारम्परिक तत्त्वों जैसे–रहस्य, रोचकता और अन्तत: पठनीयता को बचाए रखता है। प्यार, क्रूरता और प्रतिरोध चन्दन के यहाँ अपने सूक्ष्म और समकालीन रूपों में प्रकट होते हैं जो न सिर्फ़ चकित करता है बल्कि पाठक की चेतना में कुछ सकारात्मक जोड़ जाता है।
—महेश वर्मा
चन्दन पाण्डेय की लेखकी को समकाल के पूर्ण साहित्यिक विनियोग के रूप में देखा-रखा जा सकता है। चन्दन का कथाकार क़िस्से में ग़ाफ़िल नहीं, बल्कि सतर्क व अचूक है, जिससे समकाल के अद्यतन संस्करण का भी प्रवेश उनके कथादेश में सहज ही सम्भव है। कहन की साहिबी उन्हें ईर्ष्या का पात्र बनाती है।
—कुणाल सिंह
Dubhang
- Author Name:
Laxman Gaiakwad
- Book Type:

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Description:
‘दुभंग’ 30 सितम्बर, 1993 को महाराष्ट्र के किल्लारी गाँव, ज़िला लातूर में आए भूकम्प पर आधारित उपन्यास है। इस भूकम्प से यह गाँव लगभग पूरी तरह नष्ट हो गया था। अनेकों लोग मलबे में दफ़न हो गए थे। प्रसिद्ध मराठी लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ ने भूकम्प के बाद किल्लारी जाकर बाक़ायदा सहायता और राहत कार्यों में हिस्सा लिया था और उन तमाम सामाजिक तथा मानवीय स्थितियों को अपनी आँखों से देखा था जिनका वर्णन उन्होंने इस उपन्यास में किया है।
एक ऐसी प्राकृतिक आपदा के बाद जिसके सम्मुख मनुष्य अपनी तमाम शक्तिमानता के बावजूद असहाय हो जाता है, हमारा सामाजिक-राजनीतिक ताना-बाना, हमारे मूल्य-मानदंड, जाति-धर्म, हमारा चरित्र और मन क्या-क्या रूप अख़्तियार करता है, यह इस उपन्यास में बख़ूबी चित्रित किया गया है।
लक्ष्मण गायकवाड़ मराठी के अग्रणी लेखकों में हैं। ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित उनकी पुस्तक ‘उचक्का’ विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। हमें विश्वास है कि उनका यह उपन्यास भी पाठकों के मन और विचारों को छुएगा।
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