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Love is not merely a word but an experience which cannot be described to others. It is a feeling one has for another. How often have we realised that there is an inner voice that speaks to us? Even if we realise that our inner voice is speaking to us, how often do we listen to it? The question often arises whether our inner voice is in conflict with what our mind desires or whether it is but an extension of what we truly are? Contained herein are stories of individuals placed in different situations who gave great importance to their inner voice and unknowingly revealed their hidden selves. In the author’s opinion, our behaviour is inevitably governed by what we believe.
Read moreAbout the Book
Love is not merely a word but an experience which cannot be described to others. It is a feeling one has for another. How often have we realised that there is an inner voice that speaks to us?
Even if we realise that our inner voice is speaking to us, how often do we listen to it? The question often arises whether our inner voice is in conflict with what our mind desires or whether it is but an extension of what we truly are?
Contained herein are stories of individuals placed in different situations who gave great importance to their inner voice and unknowingly revealed their hidden selves. In the author’s opinion, our behaviour is inevitably governed by what we believe.
Book Details
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ISBN9788195009329
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Pages328
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Ramchandra Dwivedi
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- Description: "यह सृष्टि द्वंद्वमय है। जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप के साथ सम-विषम भाव जुडे़ हुए हैं। लेखनी या वाणी तो सीमित साधनमात्र है। पद्यमय रचना पाठकों को अच्छी लगती है, अतः तुकांत पदों में रचना होने लगी। हर्ष, आनंद, खुशी, उल्लास, आमोद-प्रमोद, प्रसन्नता के ही पर्याय हैं। आनंद की अनुभूति केवल ठहाके लगाने या मुसकराने से ही नहीं होती। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में खुशी की खोज की जा सकती है। प्रस्तुत पुस्तक में हम व्यावहारिक जगत् के कुछ विषयों का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं, जो आनंद-प्राप्ति में साधनरूप हैं—हास्य के स्रोत, हँसी का महत्त्व, काल और स्थान, मानव-स्वभाव, श्रम का महत्त्व, सांसारिक संबंध, प्राचीन साधन, सुख की खोज, आशा का बंधन, मन की पहचान, सज्जन-दुर्जन, जड़-चेतन में हास्य, वाणी का महत्त्व, परसेवा, परिश्रम तथा भाग्य, सुख-साधन, जगत्-धर्म, प्रकृति के वरदान, कृत्रिमता, कंप्यूटर-युग आदि। व्यक्ति के उत्थान-पतन से जुड़े ये विचार पठनीय तो हैं ही, संग्रहणीय भी हैं। हर आयु-वर्ग के पाठकों के लिए यह पुस्तक रोचक, ज्ञानवर्धक और आनंददायक है।"
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