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Kala Pahar

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उपन्यास का काम समकालीन यथार्थ के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अतीत को पुनर्जीवित और भविष्य के मिज़ाज को रेखांकित करना है। भगवान मोरवाल के ‘काला पहाड़’ में ये विशिष्टताएँ हैं। ‘काला पहाड़’ के पात्रों की कर्मभूमि ‘मेवात क्षेत्र’ है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सीमाओं में विस्तृत यह वह क्षेत्र है, जिसने मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर से टक्कर ली थी और जिसने भारत की ‘मिलीजुली तहज़ीब’ को आज तक सुरक्षित रखा है। ‘काला पहाड़’ एक उपन्यास का शीर्षक नहीं है, वरन् मेवात की भौगोलिक-सांस्कृतिक अस्मिता और समूचे देश में व्याप्त बहुआयामी विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक है। इसके पात्र—सलेमी, मनीराम, रोबड़ा, हरसाय, सुलेमान, छोटेलाल, बाबू ख़ाँ, सुभान ख़ाँ, रुमाली, अंगूरी, रोमदेई, तरकीला, मेमन, चौधरी करीम हुसैन व चौधरी मुर्शीद अहमद आदि ठेठ देहाती हिन्दुस्तान की कहानी कहते हैं। मेवात के ये अकिंचन पात्र अपने में वे सभी अनुभव, त्रासदी, ख़ुशियाँ समेटे हुए हैं, जो किसी दूरदराज़ अनजाने हिन्दुस्तानी की भी जीवन-पूँजी हो सकते हैं। लेखक जहाँ ऐतिहासिक पात्र व मेवात-नायक ‘हसन ख़ाँ मेवाती’ की ओर आकृष्ट है, वहीं वह अयोध्या-त्रासदी की परछाइयों को भी समेटता है, इस त्रासदी में झुलसनेवाली बहुलतावादी संस्कृति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। उपन्यास की विशेषता यह है कि इसने समाज के हाशिए के लोगों को अपने कथा-फ़लक पर उन्मुक्त भूमिका निभाने की छूट दी है। मोरवाल की पृष्ठभूमि दलित ज़रूर है लेकिन किरदारों के ‘ट्रीटमेंट’ में वह दलित ग्रन्थि से अछूते हैं।

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उपन्यास का काम समकालीन यथार्थ के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अतीत को पुनर्जीवित और भविष्य के मिज़ाज को रेखांकित करना है। भगवान मोरवाल के ‘काला पहाड़’ में ये विशिष्टताएँ हैं। ‘काला पहाड़’ के पात्रों की कर्मभूमि ‘मेवात क्षेत्र’ है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सीमाओं में विस्तृत यह वह क्षेत्र है, जिसने मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर से टक्कर ली थी और जिसने भारत की ‘मिलीजुली तहज़ीब’ को आज तक सुरक्षित रखा है।

‘काला पहाड़’ एक उपन्यास का शीर्षक नहीं है, वरन् मेवात की भौगोलिक-सांस्कृतिक अस्मिता और समूचे देश में व्याप्त बहुआयामी विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक है। इसके पात्र—सलेमी, मनीराम, रोबड़ा, हरसाय, सुलेमान, छोटेलाल, बाबू ख़ाँ, सुभान ख़ाँ, रुमाली, अंगूरी, रोमदेई, तरकीला, मेमन, चौधरी करीम हुसैन व चौधरी मुर्शीद अहमद आदि ठेठ देहाती हिन्दुस्तान की कहानी कहते हैं। मेवात के ये अकिंचन पात्र अपने में वे सभी अनुभव, त्रासदी, ख़ुशियाँ समेटे हुए हैं, जो किसी दूरदराज़ अनजाने हिन्दुस्तानी की भी जीवन-पूँजी हो सकते हैं।

लेखक जहाँ ऐतिहासिक पात्र व मेवात-नायक ‘हसन ख़ाँ मेवाती’ की ओर आकृष्ट है, वहीं वह अयोध्या-त्रासदी की परछाइयों को भी समेटता है, इस त्रासदी में झुलसनेवाली बहुलतावादी संस्कृति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। उपन्यास की विशेषता यह है कि इसने समाज के हाशिए के लोगों को अपने कथा-फ़लक पर उन्मुक्त भूमिका निभाने की छूट दी है। मोरवाल की पृष्ठभूमि दलित ज़रूर है लेकिन किरदारों के ‘ट्रीटमेंट’ में वह दलित ग्रन्थि से अछूते हैं।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
4th
Publication year
2004
Weight
438 grams
ISBN-13
9788171198108
Pages
46
Reading time
~2 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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