Kullibhat
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
₹ 159.2 (20% off)
Available
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‘कुल्ली भाट’ अपनी कथा-वस्तु और शैली-शिल्प के नएपन के कारण न केवल निराला के गद्य-साहित्य की बल्कि हिन्दी के सम्पूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है।</p> <p>यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है। यही कारण है कि सन् 1939 के मध्य में प्रकाशित यह कृति उस समय की प्रगतिशील धारा के अग्रणी साहित्यकारों के लिए चुनौती के रूप में सामने आई, तो देशोद्धार का राग अलापनेवाले राजनीतिज्ञों के लिए इसने आईने का काम किया।</p> <p>संक्षेप में कहें तो निराला के विद्रोही तेवर और ग़लत सामाजिक मान्यताओं पर उनके तीखे प्रहारों ने इस छोटी-सी कृति को महाकाव्यात्मक विस्तार दे दिया है, जिसे पढ़ना एक विराट जीवन-अनुभव से गुज़रना है।
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‘कुल्ली भाट’ अपनी कथा-वस्तु और शैली-शिल्प के नएपन के कारण न केवल निराला के गद्य-साहित्य की बल्कि हिन्दी के सम्पूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है।</p>
<p>यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है। यही कारण है कि सन् 1939 के मध्य में प्रकाशित यह कृति उस समय की प्रगतिशील धारा के अग्रणी साहित्यकारों के लिए चुनौती के रूप में सामने आई, तो देशोद्धार का राग अलापनेवाले राजनीतिज्ञों के लिए इसने आईने का काम किया।</p>
<p>संक्षेप में कहें तो निराला के विद्रोही तेवर और ग़लत सामाजिक मान्यताओं पर उनके तीखे प्रहारों ने इस छोटी-सी कृति को महाकाव्यात्मक विस्तार दे दिया है, जिसे पढ़ना एक विराट जीवन-अनुभव से गुज़रना है।
Book Details
-
ISBN9788126713714
-
Pages151
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस उपन्यास में शरतचन्द्र ने स्त्री–पुरुष के मन को लेकर जो आख़िरी सवाल, मुख्यत: मनोरमा और अजित तथा कमल और अविनाश के सम्बन्धों के माध्यम से उठाया है, उसका जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया है। सवाल यह है कि क्या किसी भी विधि–विधान से विवाह कर लेने के बाद स्त्री–पुरुष के मन का मेल चिरस्थायी हो जाता है? क्या विवाह के बाद पति या पत्नी का मन क्रमश: परस्त्री और परपुरुष के प्रति आकर्षित नहीं होता है? और अगर ऐसा होता है, तो क्या यह अस्वाभाविक है? अगर यह अस्वाभाविक है, तो भटका मन लिए जीवन-भर कुढ़–कुढ़कर जीना स्वाभाविक है? अगर यह स्वाभाविक है तो फिर जीवन सुन्दर कैसे है? और अगर जीवन सुन्दर नहीं है, तो जीने का सुख और आनन्द क्या है? विवाह एक समझौता है, एक अनुबन्ध है। जब तक चलता है, ठीक है, नहीं चलता है, तो भी ठीक है। इसमें नैतिकता नहीं ढूँढ़ी जानी चाहिए। मन का मेल नैतिकता के आधार पर नहीं होता है। मन का मेल रुचि, पसन्द और विचार के आधार पर होता है। मनोरमा अजित की वाग्दत्ता है। कमल और अविनाश का विवाह वैदिक रीति से नहीं, अन्य रीति से हुआ है। इसलिए लोग उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। देखनेवालों में मनोरमा और अजित भी शामिल हैं। पर मन का खेल अजीब है। एक समय आता है जब मनोरमा अविनाश से विवाह कर लेती है और अजित कमल से विवाह करना चाहता है। कमल विवाह–संस्कार को महत्त्व नहीं देती है। वह मन के मेल को तरजीह देती है। वह अजित के साथ बिना विवाह किए जीवन-भर साथ रहने को राजी हो जाती है। स्त्री–पुरुष के मन को लेकर समाज में बार–बार यह सवाल उठाया जाता है कि क्या नैतिक है और क्या अनैतिक? यही तो आखिरी सवाल है। पाठक अपने मन के अनुसार आख़िरी सवाल का जवाब इस उपन्यास में पा जाएँगे।
—विमल मिश्र
Nauka Doobi
- Author Name:
Rabindranath Thakur
- Book Type:

- Description: भारत को आधुनिक समाज बनने के मार्ग पर आगे बढऩे की शक्ति प्रदान करनेवाले रवीन्द्रनाथ ने 'नौका डूबी' उपन्यास में व्यक्ति की मनोव्याकुलता के रहस्य उद्घाटित किए हैं। इसमें व्यक्ति के अन्तर्लोक और समाज की इच्छाओं-आस्थाओं के मध्य होनेवाली टकराहट से उत्पन्न त्रासद जीवन-दशाओं की अभिव्यक्ति हुई है। कमला, रमेश, हेमनलिनी और नलिनाक्ष तेज़ी से तथा अकस्मात् आकार लेती घटनाओं के जाल में निरन्तर उलझते रहते हैं। 'गोरा' की रचना के पूर्व रवीन्द्रनाथ भारत के समाज का जो रूप देख रहे थे और व्यक्तियों की चिन्तन-प्रणाली में जिस परिवर्तन की आहट सुन रहे थे, वही इस कृति में है। 'नौका डूबी' को उसमें निहित विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक प्रयोगों को जाने बिना अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता। ध्यान यह भी रखना होगा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारतीय साहित्य की अवधारणा के पहले-पहले पक्षधरों में से थे; अत: उन्होंने अपनी रचनाओं में समग्र समाज के भीतरी व्यवहारों को भरपूर जगह दी है। जो पाठक यथास्थान प्रस्तुत टिप्पणियों पर ध्यान देंगे, उन्हें पता चल जाएगा कि 'नौका डूबी' के अनुवाद में इस सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है। प्रामाणिकता और मूल की यथासाध्य रक्षा इस अनुवाद-कार्य का लक्ष्य रहा है।
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