Vishwas Bhara Ehasas
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निराकार वीणा पर भावों के परदे रखकर, कल्पना की तार कस ख्यालों को भरकर उँगली से दबाकर जिस कंपन को उजागर करती हूँ वहाँ जी उठता है सजीव रूप साकार, धवल, उज्ज्वल, अपने रूप और जुण में सिमटा कोमल रागनुमा सरल, सत्य साहित्य इसे अपनाकर, अपना बनाकर जी उठती है कल्पना की साकार प्रतिमा जो अलंकृत है विभिन्न रुपों में अपनाए जाने योग्य इस तेज को जो अपनाए, हो जाए वो भी भाव-विभोर मन गद्णद, निलांजना-सी अद्भ्रुत, मुखरित हो उठें हृदय पटल पर और पुकार उठें- धमनियों की गलियों से ये ही झंकार, झंकृत हो, झंकृत हो, झंकृत हो.
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निराकार वीणा पर भावों के परदे रखकर, कल्पना की तार कस ख्यालों को भरकर उँगली से दबाकर जिस कंपन को उजागर करती हूँ वहाँ जी उठता है सजीव रूप साकार, धवल, उज्ज्वल, अपने रूप और जुण में सिमटा कोमल रागनुमा सरल, सत्य साहित्य इसे अपनाकर, अपना बनाकर जी उठती है कल्पना की साकार प्रतिमा जो अलंकृत है विभिन्न रुपों में अपनाए जाने योग्य इस तेज को जो अपनाए, हो जाए वो भी भाव-विभोर मन गद्णद, निलांजना-सी अद्भ्रुत, मुखरित हो उठें हृदय पटल पर और पुकार उठें- धमनियों की गलियों से ये ही झंकार, झंकृत हो, झंकृत हो, झंकृत हो.
Book Details
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ISBN9789390825066
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कहना न होगा कि ‘महुआचरित’ को ‘वृत्तान्त का अन्त’ करती कथा-रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।
अस्सी साल के स्वतंत्रता सेनानी पिता की पुत्री महुआ की देहासक्ति से विवाह तक की यात्रा और फिर उसमें जागता अस्मिता-बोध—इस कथा को लेखक ने समुचित सामाजिक सन्दर्भों के साथ प्रस्तुत किया है। स्त्री-विमर्श की अनुगूँज के बावजूद यह प्रश्न आकार लेता है, ‘ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता/लेकिन मन का सारा रिश्ता-नाता तहस-नहस हो जाता है।’
सघन संवेदना और सर्वथा नवीन संरचना से समृद्ध ‘महुआचरित’ उपन्यास निश्चित रूप से पाठकों की आत्मीयता अर्जित करेगा।
Kathghare
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Ballabh Sidharth
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Description:
“जब कभी अपनी अजीबोग़रीब हरकतों के पीछे अपने अन्तश्चेतन की प्रेरणाओं को एक कोलाज में रखकर देखता हूँ तो एक अजीब-सा चित्र बनता है मेरे व्यक्ति का। सिर से जानवर। धड़ से मनुष्य जैसा। सुअर मानव।...वाराह अवतार। बस इसमें से अवतार की दिव्यता हटा दें। गले तक कटीले, आशाओं और कामनाओं से भरी जीवन की अपनी चिथड़ा-चिथड़ा हुई गठरी को सँभाले। अपनी इसी गर्हित भूमिका में अपनी सार्थकता और मुक्ति की तलाश करता हुआ...”
—इसी उपन्यास से।
बाहर से एक छोटी-सी जीवन स्थिति लेकिन गहरे में कितने-कितने द्वन्द्वों, तनावों, समझौतों की दुनिया जिसमें हर व्यक्ति पल-प्रतिपल टूट रहा है, ढह रहा है...फिर भी अपने को बचाए रखने की कोशिश-दर-कोशिश किए जा रहा है। भ्रष्ट और जर्जर आदमी के ढाँचे में मनुष्यता की दीप्ति जलती हुई। इसलिए आशा अब भी है!
बल्लभ सिद्दार्थ ने इस छोटे-से उपन्यास को लिखने में दस से ज़्यादा वर्ष लगाए हैं। पात्र गिने-चुने हैं पर प्रत्येक के भीतर कितना विशाल संसार...कहानी छोटी-सी—गिने-चुने लोगों का जीवन-संघर्ष, पर ज्यों-ज्यों वह खुलता है, आधुनिक भारतीय समाज की हज़ारों विसंगतियों को उकेरता है...और सब कुछ लेखक की कलात्मक छुअन से—जहाँ फैलाकर कुछ नहीं कहा जाता, इशारा-भर कर दिया जाता है।
अगर साहित्य ज़िन्दा रहने की ताक़त पाने के लिए पढ़ा जाता है तो ‘कठघरे’ एक उम्दा मिसाल है, जिसकी जीवन-दर्शन से भरी कितनी पंक्तियों को संचित किया जा सकता है, उनसे लटककर जीवन काटा जा सकता है।
Cadence
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Pati-Patani Aur Woh
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वरिष्ठ उपन्यासकार कमलेश्वर का यह उपन्यास समकालीन समाज में पुरुष मानसिकता को उघाड़कर रख देता है। देहलोलुप पुरुषों की लिप्सा और कुंठा इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है। पत्नी हो या प्रेमिका, स्त्री हर तरह से पुरुषों द्वारा छली जाती है। इस उपन्यास का कथ्य भले ही रोमांटिक और हलका-फुलका लगे, लेकिन यह साधारणता ही इसकी खास विशेषता है।
समकालीन जीवन की कार्यालयी संस्कृति में स्त्रियों की नियति और पुरुष की लोलुपता को लेखक ने इस उपन्यास में गहरी आन्तरिकता से रेखांकित किया है। पूँजीवादी समाज के प्रतिस्पर्द्धामूलक परिवेश की विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों को उजागर करनेवाला यह उपन्यास शिल्प व भाषा की सहजता के लिए भी याद किया जाएगा।
Ek Saa Sangit
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Vikram Seth
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विक्रम सेठ अपनी अनूठी शैली के लेखक हैं। उनकी किसी भी पुस्तक में किसी क़िस्म का दोहराव नहीं होता, फिर भी उनकी प्रत्येक कृति पर उनकी अपनी पहचान अंकित होती है। कुछ आलोचक इस पहचान को ‘जीवन की अचूक साँस’ तो कुछ उसे ‘अनुल्लंघनीय सच्चाई’ कहते हैं।
‘ए सूटेबुल ब्वाय’ के बाद उनका यह पहला उपन्यास है जिसमें वे एक सघन और संवेदनशील कहानी लेकर आए हैं। इस कहानी में संगीत है, कला है, हास्य है और गुरु-गम्भीर अहसास भी। एक स्तर पर यह कहानी प्यार के बारे में है—एक स्त्री का प्यार जो मिलकर खो जाती है, फिर मिलती है और फिर खो जाती है। विक्रम सेठ इस उपन्यास में पुनः जीवन के विभ्रम की रचना करते हैं। और सबसे ऊपर यह पुस्तक संगीत के बारे में है और इस बारे में कि कैसे संगीत का प्यार जीवन के बीचोबीच एक घनीभूत धारा की तरह प्रवहमान रहता है।
तीखे दु:ख और दीप्तिमान मेधा की पुनरावृत्तियों के द्वारा यह उपन्यास विक्रम सेठ के लेखकीय व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू पाठक के सम्मुख खोलता है।
Anna Karenina : Vols. 1-2
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- Description: ‘आन्ना कारेनिना’ महाकाव्यात्मक त्रासदी को नए दिक्-काल सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित करने का दबाव बनानेवाला यह महान उपन्यास अपराध या पाप के नैतिक प्रश्न को गहरे ऐतिहासिक-सामाजिक सन्दर्भों में प्रस्तुत करते हुए, समाज और स्वयं अपने जीवन के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के उत्तरदायित्व को चिन्तन के केन्द्र में उपस्थित करता है। इसके साथ ही, यह तत्कालीन रूसी जीवन के सभी बुनियादी और केन्द्रीय अन्तर्विरोधों को भी चित्रित करता है। सामाजिक जीवन की समस्याओं तथा कला और दर्शन के प्रश्नों के साथ ही तोल्स्तोय ने इस उपन्यास में परिवार और नैतिक जीवन की समस्याओं पर केन्द्रित करते हुए स्त्री-प्रश्न को भी गहरी दार्शनिक चिन्ता के साथ प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद, तोल्स्तोय गम्भीर विचारधारात्मक संकट के दौर से गुज़रे, जिसकी परिणति के तौर पर, बल के द्वारा बुराई के अप्रतिरोध का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए भी, वे मौजूदा व्यवस्था की सभी बुनियादों को ख़ारिज करने तथा सामाजिक ढाँचे की निर्मम-बेलाग आलोचना करने की स्थिति तक जा पहुँचे। ‘आन्ना कारेनिना’ का दायरा हालाँकि ‘युद्ध और शान्ति’ की अपेक्षा संकुचित है, लेकिन इस उपन्यास के चरित्र अधिक जटिल हैं। वे अधिक संवेदनशील प्रतीत होते हैं और उनके आन्तरिक तनाव और चिन्ताएँ उपन्यास में समग्र जीवन की अनिश्चितता और अस्थायित्व के परिवेश को परावर्तित करती हैं। ‘आन्ना कारेनिना’ एक हद तक आत्मकथात्मक उपन्यास भी है। इसे लिखते हुए तोल्स्तोय अपने समय और अपने ख़ुद के जीवन के बारे में स्वयं ही स्पष्ट होने की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे। उपन्यास में जिन समस्याओं को उठाने और हल करने की कोशिश की गई थी, उनके प्रति तोल्स्तोय के सरोकार ने 1870 के दशक के अन्त में उन्हें एक नए विचारधारात्मक संकट के भँवर में धकेल दिया और पितृसत्तात्मक किसानी नज़रिए के प्रति उनकी पक्षधरता भी संकटग्रस्त हो गई।
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