Once Lost Found Forever
(0)
Author:
Jitender Rishi ParmarPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
EnglishCategory:
Literary-fiction₹
170
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When you chase love, love chases someone else. The moment you realise you are in love, only love remains; you disappear, and so is the chase forever. Read about shagun, Girija and Rishi, who once lost what was most important to them and then found something that made them essential eternally. Firmly glued to reality, this engaging tale of love, longing and fulfilment will inspire you to heal the corner of your heart that someone ever breaks. Jitender Rishi Parmar works as Assistant Professor at Hindu college, Sonipat. A gold Medallist in M.Phil, a doctorate in English and a seeker, he has been published widely by National and international Publishers. This book is his second novel. His interests in human relationships and spirituality are key writing inspirations.
Read moreAbout the Book
When you chase love, love chases someone else. The moment you realise you are in love, only love remains; you disappear, and so is the chase forever. Read about shagun, Girija and Rishi, who once lost what was most important to them and then found something that made them essential eternally. Firmly glued to reality, this engaging tale of love, longing and fulfilment will inspire you to heal the corner of your heart that someone ever breaks. Jitender Rishi Parmar works as Assistant Professor at Hindu college, Sonipat. A gold Medallist in M.Phil, a doctorate in English and a seeker, he has been published widely by National and international Publishers. This book is his second novel. His interests in human relationships and spirituality are key writing inspirations.
Book Details
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ISBN9788193827116
-
Pages130
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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निर्मल वर्मा के अनुवादों की शृंखला में भी इस पुस्तक का स्थान बहुत शुरू में आता है। तोल्स्तोय की लेखन-शैली और संवेदना को हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मूल की बारीकियों को सम्प्रेषणीय ढंग से वहन किया है।
Sujan
- Author Name:
Mithilesh Kumari Mishra
- Book Type:

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Description:
यह घनानन्द और सुजान की प्रेमकथा का औपन्यासिक पाठ है। प्रेम और शृंगार की जो ऊँचाई हमें घनानन्द के काव्य में दिखती है, कहते हैं, उसका श्रेय नर्तकी सुजान के सौन्दर्य और प्रेम की गहनता को जाता है।
स्वर्णकार की दुलारी बेटी सुजान साहित्य-संगीत और धर्म आदि की शिक्षा में पारंगत थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति के चलते उसे एक रुग्ण व्यक्ति से ब्याह दिया गया। परिणाम कि जल्दी ही उसके सामने वैधव्य आन खड़ा हुआ, और साथ ही दुर्भाग्य भी। अन्तत: शरण मिली आगरा की विख्यात नर्तकी विश्वमोहिनी के यहाँ। वहाँ सुजान की कला पर और रंग चढ़ा।
मुग़ल साम्राज्य के जिस दरबार में घनानन्द मीर मुंशी थे, सुजान वहीं की राजनर्तकी बनी। शहंशाह रँगीले शाह दोनों को समान भाव से सराहते थे। इसी परिवेश में दोनों की प्रेमकथा परवान चढ़ी और सुजान को अपनी नृत्यकला में तो आनन्द को अपने स्वर तथा शब्द-साधना को चरम पर पहुँचाने के लिए दु:ख, पीड़ा और जीवट की खुराक़ मिली।
यह उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और देश-काल की तत्कालीन परिस्थितियों को अंकित करते हुए इस प्रेमकथा को सहानुभूतिपूर्वक शब्दांकित करता है।
Shakuntika
- Author Name:
Bhagwandas Morwal
- Book Type:

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Description:
भारतीय समाज में बेटी को पराया धन माना जाता है। ऐसा पराया धन जिसे विवाह के समय वधू के रूप में उसे वर रूपी, लगभग एक अपरिचित व्यक्ति को दानस्वरूप सौंप दिया जाता है। मगर हम भूल जाते हैं कि दान बेटी का नहीं, धन या पशुओं का किया जाता है। बेटी को तो सिर्फ़ अपने घर से उसके नए जीवन के लिए विदा किया जाता है।
विवाह उपरान्त घर से बेटी के विदा होने की व्यथा क्या होती है, उसे उस घर के माता-पिता और उसके दादा-दादी ही जानते हैं। उसकी कमी उस विलुप्त होती गौरैया की तरह रह-रह कर महसूस होती है, जिसकी चहचहाहट से घर-आँगन और उसकी मोखियाँ गूँजती रहती हैं। इसीलिए बेटियाँ तो उस ठंडे झोंके की तरह होती हैं, जो अपने माता-पिता पर किसी भी तरह के दुःख या संकट आने की स्थिति में सबसे अधिक सुकून-भरा सहारा प्रदान करती हैं।
हमारे समाज में आज भी बेटियों के बजाय बेटों को प्रधानता दी जाती है, मगर हम यह भूल जाते हैं कि समय आने पर बेटियाँ ही सुख-दुःख में सबसे अधिक काम आती हैं। आज गौरैया अर्थात् शकुंतिकाएँ हमारे आँगनों और घर की मुँडेरों से जिस तरह विलुप्त हो रही हैं, यह उपन्यास इसी बेटी के महत्त्व का आख्यान है। एक ऐसा आख्यान जिसकी अन्तर्ध्वनि आदि से अन्त तक गूँजती रहती है।
Kason Kahon Main Dardiya
- Author Name:
Rita Shukla
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- Description: "संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आई विद्वन्मंडली उनके परंपराभंजक रूप को देखकर चमत्कृत थी । ताजा हवा के झोंकों- से स्कूर्त वे विचार उनकी अंतरात्मा की प्रतिध्वनि बनकर फूटे थे ।-दहेज समाज की रगों में प्रवाहित होनेवाला सबसे बड़ा प्रदूषण है... .विवाह के पारंपरिक स्वरूप में विकृतियाँ उत्पन्न करनेवाले. ऐसे अभिशप्त संदर्भों से मुक्ति पानी ही होगी... .दहेज देनेवाला भी समान पातक का भागी होता है.... वापसी की यात्रा तय करते समय उनके विचार विरु बनकर उनका मुँह चिढ़ाने लगे थे.... । कीचड़ में जन्म लेकर उससे निर्लिप्तता कि स्थिति पंकज की हो सकती है-जिंदगी पुरइन का पात नहीं... .जिसकी चिकनाहट जल की एक बूँद की भी अवधारणा नहीं कर सके । सामाजिकता में सराबोर जलकुंभी-सा परंपरा-ग्रथित मन अपनी निस्पृहता सिद्ध करना चाहे भी तो उसे लोकधर्म की परिभाषाओं से मुक्ति पानी होगी- संसार में रहकर संसार से ऊपर उठने की महती आकांक्षा यतिभाव को जन्म देती है-संन्यास लोकाचार से पलायन का दूसरा नाम हो सकता है; लेकिन लोकाचार पूर्वजों के द्वारा पोषित होती चली आ रही परंपराओं का एक ऐसा विवश स्वीकार है, जिसके बगैर जीवन की गति नहीं.... । विस्मय तो उन्हें तब हुआ था जब उनकी दूसरी पुत्री ने स्वयं उनके सामने प्रस्ताव रखा था-बाबूजी, इनके कार्यालय में सबके पास स्कूटर, मोटर साइकल हैं -सिर्फ ये ही... .हमारी सासजी कहती हैं -इतने बड़े प्राध्यापक हैं, क्या अपने दामाद को एक स्कूटर भी नहीं दे सकते... .हमने तो मोटरगाड़ी की आस लगाई थी । - इसी संकलन से बहुचर्चित कथाकार ऋता शुक्ल की कहानियों में समाज का संत्रास आँखोंदेखी घटना के रूप में उभरता है । तभी तो उनकी कहानियाँ संस्मरण, रेखाचित्र और कहानी का मिला-जुला अनूठा आनंद प्रदान करती हैं । उनकी हृदयस्पर्शी कहानियों का संकलन है- कासों कहों मैं दरदिया । "
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