Jadia Bai
(0)
Author:
Kusum KhemaniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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कुसुम खेमानी के नारी-विमर्श की प्रकृति एकदम भिन्न है। वे अपने स्त्री-चरित्रों का ऐसा उदात्तीकरण करती हैं कि इस धरती की होते हुए भी वे अपने अनोखे व्यक्तित्व के कारण किसी और ही जगत की लगती हैं। जड़ियाबाई उपन्यास भी एक ऐसी ही मारवाड़ी स्त्री के उत्कर्ष की गाथा है, जो धनाढ्य परिवार की होने के बावजूद धुर बचपन से ही प्राणी मात्र के लिए संवेदनशील और करुणामयी हैं एवं खरे जीवन मूल्यों में जीती हुई आश्चर्यजनक ढंग से वह शुरू से ही गांधी जी की ट्रस्टीशिप सिद्धान्त का घोर अनुयायी बन जाती हैं।</p> <p>जड़ियाबाई कथनी में ही नहीं करनी में भी पंचशील के पाँचों सिद्धान्तों का अनुशीलन करती हैं। वे सर्वे भवन्तु सुखिन: के लिए अपना 'तन-मन-धन' सब कुछ अर्पित कर देती हैं। जड़ियाबाई अपने ज़मीनी सद्कर्मों के स्तूपाकार से वह ऊँचाई हासिल कर लेती हैं, जो उन्हें इस धरती पर ही अलौकिक बना देती हैं।</p> <p>आश्चर्यजनक ढंग से जड़ियाबाई पूर्णत: गल्प के धरातल पर खड़ी होकर ऐसी काव्यात्मक गुणों की ऊँचाइयों पर परचम फहराती नज़र आती हैं, जो कल्पनातीत है। वे संवेदनशीलता से इतनी सराबोर हैं कि छोटे-से-छोटे कीड़े की कर्मठता और अवदान के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करती हैं।</p> <p>जड़ियाबाई का आचार-व्यवहार समग्र प्रकृति के अणु-अणु के प्रति श्रद्धापूर्ण है। वे पृथ्वी की प्रकृति और इसके वासियों में ही उस अलौकिक दिव्य सत्ता को अनुभूत करती रहती हैं और उन्हीं के समक्ष श्रद्धावनत रहती हैं। वे उस असमी को मन्दिर, मस्जिद और शिवालों में नहीं ढूँढ़तीं, बल्कि यहाँ की माटी के कण-कण में उन्हें उसकी उपस्थिति महसूस होती रहती है।
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कुसुम खेमानी के नारी-विमर्श की प्रकृति एकदम भिन्न है। वे अपने स्त्री-चरित्रों का ऐसा उदात्तीकरण करती हैं कि इस धरती की होते हुए भी वे अपने अनोखे व्यक्तित्व के कारण किसी और ही जगत की लगती हैं। जड़ियाबाई उपन्यास भी एक ऐसी ही मारवाड़ी स्त्री के उत्कर्ष की गाथा है, जो धनाढ्य परिवार की होने के बावजूद धुर बचपन से ही प्राणी मात्र के लिए संवेदनशील और करुणामयी हैं एवं खरे जीवन मूल्यों में जीती हुई आश्चर्यजनक ढंग से वह शुरू से ही गांधी जी की ट्रस्टीशिप सिद्धान्त का घोर अनुयायी बन जाती हैं।</p>
<p>जड़ियाबाई कथनी में ही नहीं करनी में भी पंचशील के पाँचों सिद्धान्तों का अनुशीलन करती हैं। वे सर्वे भवन्तु सुखिन: के लिए अपना 'तन-मन-धन' सब कुछ अर्पित कर देती हैं। जड़ियाबाई अपने ज़मीनी सद्कर्मों के स्तूपाकार से वह ऊँचाई हासिल कर लेती हैं, जो उन्हें इस धरती पर ही अलौकिक बना देती हैं।</p>
<p>आश्चर्यजनक ढंग से जड़ियाबाई पूर्णत: गल्प के धरातल पर खड़ी होकर ऐसी काव्यात्मक गुणों की ऊँचाइयों पर परचम फहराती नज़र आती हैं, जो कल्पनातीत है। वे संवेदनशीलता से इतनी सराबोर हैं कि छोटे-से-छोटे कीड़े की कर्मठता और अवदान के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करती हैं।</p>
<p>जड़ियाबाई का आचार-व्यवहार समग्र प्रकृति के अणु-अणु के प्रति श्रद्धापूर्ण है। वे पृथ्वी की प्रकृति और इसके वासियों में ही उस अलौकिक दिव्य सत्ता को अनुभूत करती रहती हैं और उन्हीं के समक्ष श्रद्धावनत रहती हैं। वे उस असमी को मन्दिर, मस्जिद और शिवालों में नहीं ढूँढ़तीं, बल्कि यहाँ की माटी के कण-कण में उन्हें उसकी उपस्थिति महसूस होती रहती है।
Book Details
-
ISBN9788126729371
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इ पोथी कें लोकप्रियता सिर्फ समाजक यथार्थ चित्रण सँ नहि मिलल। एकर भाषा आ शिल्प अप्रतिम अछि। इ उपन्यास मैथिली समाजक मनोवृत्ति आ विसंगति कें बिना लाग-लपेट अभिव्यक्त करैत अछि। हास्यक रस होयतो इ पुस्तक मर्मस्पर्शी अछि। अहि लेल एकरा पढ़बा लेल गैर-मैथिली भाषी सेहो मैथिली सिखलाह। आ जे पढ़बा मे समर्थ नहि छलाह, से वाचन सं एकर रसास्वादन कैलाह। हरिमोहन झा हास्य सम्राट जरूर कहल जायत छैथ, मुदा ओ एहन दक्ष गद्यकार सेहो छलाह, जे मनोरंजक ढंग सँ कथा कहैत पाठक कें यथार्थक भूमि पर विस्मित कऽ दैत छथिन। हुनकर लेखनी विमर्शक एतेक द्वारि खोलैत अछि कि पाठकगण सोचबा लेल विवश होयत छैथ। ‘कन्यादान’ सेहो इ कसौटी कें सार्थक करैत अछि। इ उपन्यास मे अपन बिटियाक विवाहक हेतु माय-बाप कें चिन्ता अछि, विवाह कें सम्भव बनैबाक हेतु सूत्रधारक दाँव-पेच, नव रंग-ढंग मे रंगल पतिक आकांक्षा, अनपढ़ आ गामक संस्कृति मे रमल पत्निक कायान्तरण, आ सबसँ उल्लेखनीय, पुरातन बनाम आधुनिक परम्पराक जंग अछि। हरिमोहन झा कें नजर से केओ बाँचल नहि छैथ, अहि लेल ‘कन्यादान’ अनवरत प्रासंगिक बनल अछि।
इ पोथी मे ‘कन्यादान’ तथा ‘द्विरागमन’ (1943)— जे वस्तुत: एके उपन्यासक दू भाग अछि—एक संग प्रकाशित अछि। पाठक लोकनि हरिमोहन झा कऽ इ करिश्मा कें स्वयं अनुभव करू...
Naukar Ki Kameez
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Book Type:

- Description:
‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Book Type:


- Description:
सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास नक़्क़ाशीदार केबिनेट वर्ष 2016 का अत्यंत सफल उपन्यास है। यह उपन्यास पेपरबैक और ऑडियोबुक में भी उपलब्ध है।
Rumi - Ek Aaina Si Zindagi
- Author Name:
Rabisankar Bal
- Book Type:

- Description:
Rabishankar Bal’s novel “Rumi – Ek Aaina Si Zindagi” portrays the spiritual revolution that transformed Jalaluddin Balkhi into Maulana Rumi. The work offers a fresh interpretation of the centuries-spanning influence of the Masnavi and Rumi’s poetry. Exploring the turning points of love, separation, and creative passion in Rumi’s life, the book delves deep into the layers of his inner world. Narrated through the gaze of Ibn Battuta, this account conveys the soul’s yearning for a “Ghar Wapsi”. The book preserves within itself that pain and quest that call the human being back toward their true homeland. Rabishankar Bal (1962–2017) was among the renowned short-story writers of Bengali literature, whose creative work spanned more than three decades. He wrote more than fifteen novels, several collections of short stories and poetry, as well as non-fiction works. He also made significant contributions through the selection and translation of Saadat Hasan Manto’s chosen writings. His celebrated novel Dozakhnama was honoured with the Bankimchandra Smriti Award (2011). The English translations of his works, Dozakhnama and Aaina Jeevan, were also widely appreciated. This novel has been translated from Bengali by well-known translator Amrita Bera.
Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein
- Author Name:
Mahesh Katare
- Book Type:

- Description:
राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
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