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Author:
Devendra Kumar, Nadine GordimerPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘नोबेल पुरस्कार’ सम्मानित लेखिका नादिन गोर्डाइमर का उपन्यास ‘मेरे बेटे की कहानी’ दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी, रंगभेदवादी निरंकुश, अमानवीय शासन के निषेध-दर-निषेध की चक्की में पीसे जाते उन 87 प्रतिशत बहुसंख्य कालों, अश्वेतों तथा अन्यवर्णी जनों पर 13 प्रतिशत विशेष सुविधाभोगी गोरों के संवेदनहीन अत्याचार और शोषण-चक्र की स्मृतियाँ जगानेवाली कृति है। यहाँ से गुज़रना अँधेरी सुरंग की कष्टकर किन्तु अनिवार्य यात्रा की तरह है—एक ऐसी लम्बी, काली रात जिसकी कोई सुबह नहीं है। जैसे-जैसे हम पृष्ठ पलटते हैं एक भयानक बेचैनी जकड़ती चलती है, लेकिन हम उससे भाग नहीं सकते। हमारे अन्दर बैठा मनुष्य अपने नियतिचक्र का यह उद्वेलन अपनी हर शिरा में महसूस करना चाहता है—अगले संघर्ष की तैयारी के लिए, जो कहीं, कभी शुरू हो सकता है। ‘मेरे बेटे की कहानी’ एक ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ मनुष्य होने के हर अधिकार को निषेधों और वर्जनाओं के बुलडोज़रों के नीचे कुचल दिया गया है। लेकिन इस दमनचक्र में पीसे जाने के बावजूद संघर्ष जीवित है। उपन्यास में कथा कई स्तरों पर चलती है। पीड़ा भोगते अधिसंख्य जन, उन्हीं के बीच से उभरकर संघर्ष करनेवाले क्रान्तिबिन्दु किशोर और युवक, जो बड़ी बेरहमी से भून दिए जाते हैं। उनकी क़ब्रों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जुटी भीड़ पर फिर गोलियाँ बरसाई जाती हैं। हर रोज़, हर कहीं यही होता है। कथा का आरम्भ ऐसा आभास कराता है जैसे यह विवाहेतर अवैध काम सम्बन्धों की चटपटी कथा है। ‘दूसरी औरत’ के साथ अपने क्रान्तिकारी पिता को, जो हाल ही में जेल से छूटकर आया है, देखनेवाली किशोर बेटे की आँख इस सन्दर्भ को नए आयाम देती है। एक भयानक, विद्रूपित कंट्रास्ट की क्षणिक आश्वस्ति—और पाठक को लगता है वह क्षण-भर को खुलकर साँस ले सकता है। लेकिन अन्ततः यह किंचित् रोमानी स्थिति भी हमें बेमालूम तौर पर बहुत ऊँचाई से इस संघर्ष के भँवर में फेंक देती है, और हम अन्दर ही अन्दर उतरते चले जाते हैं। स्थितियों का यह प्रतिगामी विचलन एक नए शिल्प के तहत रचना के समग्र प्रभाव को और भी धारदार बना देता है।
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‘नोबेल पुरस्कार’ सम्मानित लेखिका नादिन गोर्डाइमर का उपन्यास ‘मेरे बेटे की कहानी’ दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी, रंगभेदवादी निरंकुश, अमानवीय शासन के निषेध-दर-निषेध की चक्की में पीसे जाते उन 87 प्रतिशत बहुसंख्य कालों, अश्वेतों तथा अन्यवर्णी जनों पर 13 प्रतिशत विशेष सुविधाभोगी गोरों के संवेदनहीन अत्याचार और शोषण-चक्र की स्मृतियाँ जगानेवाली कृति है। यहाँ से गुज़रना अँधेरी सुरंग की कष्टकर किन्तु अनिवार्य यात्रा की तरह है—एक ऐसी लम्बी, काली रात जिसकी कोई सुबह नहीं है। जैसे-जैसे हम पृष्ठ पलटते हैं एक भयानक बेचैनी जकड़ती चलती है, लेकिन हम उससे भाग नहीं सकते। हमारे अन्दर बैठा मनुष्य अपने नियतिचक्र का यह उद्वेलन अपनी हर शिरा में महसूस करना चाहता है—अगले संघर्ष की तैयारी के लिए, जो कहीं, कभी शुरू हो सकता है।
‘मेरे बेटे की कहानी’ एक ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ मनुष्य होने के हर अधिकार को निषेधों और वर्जनाओं के बुलडोज़रों के नीचे कुचल दिया गया है। लेकिन इस दमनचक्र में पीसे जाने के बावजूद संघर्ष जीवित है।
उपन्यास में कथा कई स्तरों पर चलती है। पीड़ा भोगते अधिसंख्य जन, उन्हीं के बीच से उभरकर संघर्ष करनेवाले क्रान्तिबिन्दु किशोर और युवक, जो बड़ी बेरहमी से भून दिए जाते हैं। उनकी क़ब्रों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जुटी भीड़ पर फिर गोलियाँ बरसाई जाती हैं। हर रोज़, हर कहीं यही होता है। कथा का आरम्भ ऐसा आभास कराता है जैसे यह विवाहेतर अवैध काम सम्बन्धों की चटपटी कथा है। ‘दूसरी औरत’ के साथ अपने क्रान्तिकारी पिता को, जो हाल ही में जेल से छूटकर आया है, देखनेवाली किशोर बेटे की आँख इस सन्दर्भ को नए आयाम देती है। एक भयानक, विद्रूपित कंट्रास्ट की क्षणिक आश्वस्ति—और पाठक को लगता है वह क्षण-भर को खुलकर साँस ले सकता है। लेकिन अन्ततः यह किंचित् रोमानी स्थिति भी हमें बेमालूम तौर पर बहुत ऊँचाई से इस संघर्ष के भँवर में फेंक देती है, और हम अन्दर ही अन्दर उतरते चले जाते हैं। स्थितियों का यह प्रतिगामी विचलन एक नए शिल्प के तहत रचना के समग्र प्रभाव को और भी धारदार बना देता है।
Book Details
-
ISBN9788126708697
-
Pages228
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Dhoday Charitmanas
- Author Name:
Satinath Bhaduri
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Ateet Ke Chalchitra
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein
- Author Name:
Mahesh Katare
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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
Yah Path Bandhu Tha
- Author Name:
Naresh Mehta
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भारतीय स्वाधीनता संग्राम-काल के एक साधारण व्यक्ति श्रीधर ठाकुर की असाधारण-कथा का यह बृहत् उपन्यास श्रीनरेश मेहता के विवादास्पद प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ से बिलकुल भिन्न भावभूमि, संस्कार तथा शैली को प्रस्तुत करता है। कथा-नायक श्रीधर बाबू एक व्यक्ति न रहकर प्रतीक बन गए हैं, उन सब अज्ञात छोटे-छोटे लोगों के जो उस काल के राष्ट्रीय संघर्ष, परम्परागत-निष्ठा तथा वैष्णव-मूल्यों के लिए चुपचाप होम हो गए। इतिहास ऐसे साधारण-जनों को नहीं देखता है, लेकिन उपन्यासकार किसी एक साधारण-जन को इतिहास का महत्त्व दे देता है। लेखक की परिपक्व जीवनी-दृष्टि, जीवनानुभव और कलात्मक-शक्ति ने एक साधारण-जन को सारी मानवीय संवेदना देकर अनुपम बना दिया है। श्रीनरेश मेहता अपनी भाषा, संस्कार तथा शिल्प के लिए कवियों और गद्यकारों में सर्वथा विशिष्ट माने जाते हैं और यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास हमारे इस कथन की पुष्टि करता है।
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