Jali Kitab
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Author:
Krishna KalpitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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‘जाली किताब’ अपने ढंग का पहला और अकेला उपन्यास है। इसमें आलोचना भी है और आलोचना की आलोचना भी। हिन्दी का इतिहास भी है। भारत देश के इतिहास की छवियाँ भी इसमें हैं, लोक और शास्त्र भी।</p> <p>किताब पर किताब पर किताब—लेखक के अनुसार, यही इस उपन्यास का कथानक है। एक महाकाव्य लिखा गया ‘पृथ्वीराज रासो’। कुलीन विद्वानों ने उसे नितान्त साहित्येतर कारणों से जाली कह दिया। ‘रासो’ की प्रतिष्ठा को जनमानस में अखंड रखने के लिए ‘चंद छंद बरनन की महिमा’ नामक ग्रन्थ की रचना हुई जिसे खड़ी बोली गद्य की प्रथम कृति कहा जाता है। इसे भी विद्वज्जन ने जाली ठहरा दिया।</p> <p>इन्हीं दोनों पुस्तकों को, जो अपनी अन्तर्वस्तु, कल्पनाशील रचनात्मकता और शिल्प के चलते आज भी बची हुई हैं, उक्त आरोपों से बरी करने के लिए यह किताब लिखी गई है, जो इससे पहले कि पंडित कुछ बोलें, ख़ुद ही ख़ुद को जाली कह रही है।</p> <p>यह आलोचना होती, लेकिन उपन्यास हो गई। इसमें किताबें ही पात्र हैं और उन किताबों के पात्र भी यहाँ इसी के पात्र हैं। उन किताबों को लिखनेवाले भी इसके पात्र हैं, और इस किताब का लेखक ख़ुद भी।</p> <p>इस किताब से गुज़रना एक बेहतरीन गद्य से गुज़रना है, उपन्यास की एक नई क़िस्म को जानना भी और हिन्दी साहित्येतिहास के कुछ अहम इलाक़ों की पुनर्यात्रा भी। पाठों, विधाओं और काल की सीमाओं का अतिक्रमण करती यह किताब कृष्ण कल्पित जैसी औघड़ मेधा से ही सम्भव थी।
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‘जाली किताब’ अपने ढंग का पहला और अकेला उपन्यास है। इसमें आलोचना भी है और आलोचना की आलोचना भी। हिन्दी का इतिहास भी है। भारत देश के इतिहास की छवियाँ भी इसमें हैं, लोक और शास्त्र भी।</p>
<p>किताब पर किताब पर किताब—लेखक के अनुसार, यही इस उपन्यास का कथानक है। एक महाकाव्य लिखा गया ‘पृथ्वीराज रासो’। कुलीन विद्वानों ने उसे नितान्त साहित्येतर कारणों से जाली कह दिया। ‘रासो’ की प्रतिष्ठा को जनमानस में अखंड रखने के लिए ‘चंद छंद बरनन की महिमा’ नामक ग्रन्थ की रचना हुई जिसे खड़ी बोली गद्य की प्रथम कृति कहा जाता है। इसे भी विद्वज्जन ने जाली ठहरा दिया।</p>
<p>इन्हीं दोनों पुस्तकों को, जो अपनी अन्तर्वस्तु, कल्पनाशील रचनात्मकता और शिल्प के चलते आज भी बची हुई हैं, उक्त आरोपों से बरी करने के लिए यह किताब लिखी गई है, जो इससे पहले कि पंडित कुछ बोलें, ख़ुद ही ख़ुद को जाली कह रही है।</p>
<p>यह आलोचना होती, लेकिन उपन्यास हो गई। इसमें किताबें ही पात्र हैं और उन किताबों के पात्र भी यहाँ इसी के पात्र हैं। उन किताबों को लिखनेवाले भी इसके पात्र हैं, और इस किताब का लेखक ख़ुद भी।</p>
<p>इस किताब से गुज़रना एक बेहतरीन गद्य से गुज़रना है, उपन्यास की एक नई क़िस्म को जानना भी और हिन्दी साहित्येतिहास के कुछ अहम इलाक़ों की पुनर्यात्रा भी। पाठों, विधाओं और काल की सीमाओं का अतिक्रमण करती यह किताब कृष्ण कल्पित जैसी औघड़ मेधा से ही सम्भव थी।
Book Details
-
ISBN9788119028481
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
दुनिया में सुख भले ही सुलभ न हो, दुख खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता। सबके अपने-अपने दुख हैं लेकिन सबसे ज्यादा दुखी हैं अमरनाथ बाबू जिनका पोता मयंक मन्दबुद्धि है, मानसिक विकलांग।
उनके लिए यह छोटी बात नहीं है। वे अपने पोते से गहरे जुड़े हैं। उनके लिए उसका ठीक होना ज़रूरी है जो सम्भव नहीं लग रहा। इसलिए वे दुस्वप्नों में रहते हैं। उन्हें हथियारबन्द हत्यारों के आगे भागते बच्चों की भीड़ दिखाई देती है। दुनिया-भर की सूचनाएँ उनके दुस्वप्नों में आकर जुड़ती जाती हैं, इतिहास के अनेक खून-सने अध्याय जहाँ विकलांग और अनचाहे बच्चों को मारा जाता है।
उनकी बेचैनी उस समय एक नई दिशा अख्तियार करती है जब वे देखते हैं कि सीरिया के एक बच्चे अयलान की सागर किनारे पड़ी निर्जीव देह का चित्र देखकर कैसे पूरा विश्व व्यथित हो उठा। तब आशंकाओं की छायाओं से निकलकर इसी दुनिया से उन्हें उम्मीद की किरणें दिखाई देने लगती हैं। वे दुनिया के दुखग्राम को सुखग्राम बनाने की ठान लेते हैं और इस मुहिम के लिए उन्हें सबसे भरोसेमन्द लगता है साहित्य, किताबें, लिखने और पढ़ने वाले। कहानीकार श्रीकान्त उनके हमराज हैं, जो इस नए सफ़र में भी उनके साथ होंगे।
वरिष्ठ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का यह उपन्यास गहरे जुड़े दादा-पोता के बहाने दुनिया-भर में बच्चों के लिए खराब होते हालात का जायजा लेता है। भ्रूणहत्या से लेकर युद्धों तक बच्चों के लिए लगातार क्रूर होती जा रही दुनिया का हवाला देते हुए यह वस्तुत: सम्पूर्ण मनुष्यता के भविष्य की चिन्ता साझा करता है।
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