Ek Karore Ki Botal
(0)
Author:
Krishna ChanderPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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ज़िन्दगी एक फूल होती है जो मुरझा जाती है; ज़िन्दगी एक पत्थर होती है और घिस जाती है; ज़िन्दगी लोहा होती है और जंग खा जाती है; ज़िन्दगी आँसू होती है और गिर जाती है; ज़िन्दगी महक होती है और बिखर जाती है; ज़िन्दगी समन्दर होती है और...“यही है कृश्न चंदर की जादुई क़लम, जिसने जीवन की भयावह सचाइयों को अत्यन्त रोमैंटिक लहज़े में पेश किया है।</p> <p>'एक करोड़ की बोतल' उनका एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जिसमें उन्होंने नारी के समस्त कोमल मनोभावों एवं उसकी आन्तरिक पीड़ा को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। एक कुशल कथाकार के नाते उनकी लेखनी ने बहुत सफलता के साथ सेक्स, रोमांस, धनाभाव और माया-लोक की सम-विषम परिस्थितियों में फँसे अपने मुख्य पात्रों को इस बात की पूरी स्वतंत्रता दी है कि वे अपने-आपको पाठक के सामने स्वयं उपस्थित करें।</p> <p>वास्तव में कृश्न चंदर का यह उपन्यास मानव-मन की दुर्बलताओं का दर्पण तो है ही, इसमें सामाजिक विघटन एवं कुंठा से उत्पन्न वे घिनौने प्रसंग भी हैं, जो हमें चिन्तन के नए छोरों तक ले जाकर रचनात्मक पुनर्रचना के लिए प्रेरित भी करते हैं।
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ज़िन्दगी एक फूल होती है जो मुरझा जाती है; ज़िन्दगी एक पत्थर होती है और घिस जाती है; ज़िन्दगी लोहा होती है और जंग खा जाती है; ज़िन्दगी आँसू होती है और गिर जाती है; ज़िन्दगी महक होती है और बिखर जाती है; ज़िन्दगी समन्दर होती है और...“यही है कृश्न चंदर की जादुई क़लम, जिसने जीवन की भयावह सचाइयों को अत्यन्त रोमैंटिक लहज़े में पेश किया है।</p>
<p>'एक करोड़ की बोतल' उनका एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जिसमें उन्होंने नारी के समस्त कोमल मनोभावों एवं उसकी आन्तरिक पीड़ा को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। एक कुशल कथाकार के नाते उनकी लेखनी ने बहुत सफलता के साथ सेक्स, रोमांस, धनाभाव और माया-लोक की सम-विषम परिस्थितियों में फँसे अपने मुख्य पात्रों को इस बात की पूरी स्वतंत्रता दी है कि वे अपने-आपको पाठक के सामने स्वयं उपस्थित करें।</p>
<p>वास्तव में कृश्न चंदर का यह उपन्यास मानव-मन की दुर्बलताओं का दर्पण तो है ही, इसमें सामाजिक विघटन एवं कुंठा से उत्पन्न वे घिनौने प्रसंग भी हैं, जो हमें चिन्तन के नए छोरों तक ले जाकर रचनात्मक पुनर्रचना के लिए प्रेरित भी करते हैं।
Book Details
-
ISBN9788171788118
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न मनों की पीड़ा तथा ग्लोबलाइजेशन से बौराए हमारे मौजूदा वक़्त की कथा है। एक तरफ़ लोग कहीं मजबूरन तो कहीं नए दौर के प्रवाह में अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ़ जीना एक वैश्विक स्पर्धा होता जा रहा है।
कश्मीर से जान बचाकर निकला एक पंडित परिवार अपने जैसे अनेक लोगों के साथ राजधानी दिल्ली में आकर नए सिरे से जीवन शुरू करता है। धीरे-धीरे उनके पैर नई ज़मीन पर अपनी जगह भी बनाने लगते हैं लेकिन यह अहसास कि अगर हम अपने ही देश में शरणार्थी हैं तो फिर दुनिया में कहीं भी रहें, क्या फ़र्क़ पड़ता है; भावी पीढ़ी के लिए निर्णायक बन जाता है।
कश्मीरी संस्कृति और मूल्यों में रसे-पगे माता-पिता का प्रशिक्षण परिवार को बिखरने तो नहीं देता लेकिन अपने घर-ज़मीन से दूर, महानगरों के परायेपन में सम्बन्धों को उस तरह जीना भी सम्भव नहीं जैसे अपनी भूमि पर अपनी संस्कृति, अपने माहौल के बीच हो सकता था।
वरिष्ठ कथाकार चन्द्रकान्ता अपने इस नए उपन्यास में कश्मीर से विस्थापित परिवार की कहानी के माध्यम से जैसे वर्तमान का पूरा चित्र ही खींच देती हैं। बुज़ुर्गों का अकेलापन, नई पीढ़ी के भटकाव, सतत एक होड़ में डूबे युवाओं का तनाव, बिखरता दाम्पत्य, पश्चिमी संस्कृति और तकनीक के दबाव, विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हो रहा विस्थापन, सार्वजनिक स्पेस में स्त्रियों पर होनेवाले हमले और वह सब जो इस दौर को एक शान्त धारा नहीं, भीषण भँवर का रूप देता है; इन सबको लेकर एक गम्भीर चेतावनी यहाँ मौजूद है।
उपन्यास के मुख्य पात्र सुरेन्द्रनाथ का यह कथन कि 'यह समय बूढ़ों का नहीं है' जैसे इस पूरे परिदृश्य पर एक सम्पूर्ण टिप्पणी है। अर्थात धीरता, गम्भीरता, ठहराव, गहराई और प्रकृति के हमक़दम चलने का यह समय नहीं है। देश से लेकर विदेश तक बेलगाम बहती एक गति है जिसके बने रहने के लिए हर किसी की साँसें उखड़ी जा रही हैं। चन्द्रकान्ता की सधी हुई क़लम एक-एक पंक्ति में वैश्विक विडम्बना की एक-एक परत खोलती है।
Vilakshan Shabda Chitra
- Author Name:
Purushottam Laxman Deshpande
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- Description: ‘‘नाम्यां, अबे गधे! मेरी शर्ट?’’ ‘‘मेरे शरीर में बराबर फिट हो गई।’’ नामू ने गठरी खोलकर कपड़े निकालते हुए कहा। ‘‘शर्म नहीं आती? रखे रहने दे वे कपड़े और चला जा।’’ ‘‘परंतु साहब, आपको नया कॉण्ट्रेक्ट मिला है, उससे आप दर्जन भर नई कमीज सिलवा सकते हो।’’ ‘‘अरे! लेकिन बिना पूछे कमीज को चोरी करना माने...?’’ गुस्से के मारे निर्देशक पूरा वाक्य ही नहीं बोल पा रहा था, क्योंकि गुस्से में शब्द ही नहीं सूझ रहे थे। ‘‘साहब, मैंने यदि चोरी की होती तो यह कमीज आपके सामने पहनकर आता क्या? आप ही बोलिए, पी.एल. साहब?’’ ‘‘अब मैं क्या बोलूँ? बेटा, दूसरे की शर्ट बिना पूछे अपनी मरजी से पहन लेना, क्या इसीलिए काम पर रखा है?’’ ‘‘अरे साहब, यह दुनिया सच्चे की नहीं है।’’ ‘‘सच्चे की दुनिया से तेरा क्या संबंध?’’ ‘‘मैंने तो एक संवाद बोल दिया है।’’ नामू अपने मन में कोई फिल्मी संवाद बोलना अच्छा समझता है, जो चतुराई का लक्षण है। इसी संग्रह से ——1—— प्रसिद्ध मराठी लेखक श्री पु.ल. देशपांडे विलक्षण शब्द-साधक थे। उनकी विशिष्ट भाषा-शैली और भावाभिव्यक्ति अप्रतिम है। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके उकेरे कुछ विलक्षण शब्द-चित्र उन लोगों के, जिनसे उनका संपर्क आया और जिनसे उन्होंने कुछ जाना-सीखा।
Gaban
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Premchand
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- Description: ग़बन प्रेमचन्द का प्रसिद्ध उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय नारी के आभूषण-प्रेम को आधार बनाकर मध्यवर्ग के आर्थिक और सामाजिक अंतर्विरोधों का मनोहारी चित्रण किया है। रमानाथ जैसा चरित्र प्रेमचन्द की गहरी दृष्टि का परिणाम है जो अपनी पत्नी की आभूषण लिप्सा के लिए चोरी करने पर उतर आता है। ग़बन करता है और फिर ग़बन के अपराध से बचने के लिए शहर छोड़कर भागने के लिए मजबूर हो जाता है। इसी कारण रमानाथ लगातार एक के बाद दूसरी कठिनाइयों में फँसता चला जाता है लेकिन प्रेमचन्द का अभिप्राय मात्र रमानाथ की कहानी कहना नहीं है। वे इसके माध्यम से व्यवस्था और पुलिसतंत्र के भ्रष्टाचार, क्रूरता और अमानवीयता का चित्रण करते हैं, और बताते हैं कि सारी व्यवस्था भ्रष्टाचार के दलदल में धँस चुकी है। लोग ग़लत ढंग से धन कमाने को ही अपनी असली कमाई मानने लगे हैं। प्रेमचन्द इस उपन्यास में राष्ट्रीय आन्दोलन की गतिविधियों को भी ले आते हैं और इससे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को अत्यन्त कलात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि ‘ग़बन’ इतने लम्बे अरसे के बाद भी भारतीय मानव में एक महत्त्वपूर्ण कथा-कृति के रूप में टिका हुआ है।
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