Pahighar
Author:
Kamlakant TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 239.2
₹
299
Available
‘पाहीघर’ अवध के एक गाँव, ख़ासकर एक परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई कथा के साथ-साथ सन् 1857 के उस तूफ़ान की इतिहास-कथा भी है जिसके थपेड़ों से अवध का मध्ययुगीन ढाँचा पूरी तरह चरमरा उठा। एक ओर इसमें तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का विवरण है तो दूसरी ओर अंग्रेज़ों के भारत में पैर जमाने के पीछे के कारणों पर लेखक की वस्तुपरक दृष्टि और पैनी सोच की भी झलक है।</p>
<p>यह उपन्यास तत्कालीन समाज की विसंगतियों और अन्तर्द्वन्द्व का भी दर्पण है, जिसके कारण कल और आज में कोई तात्त्विक फ़र्क़ नहीं दिखता। साम्प्रदायिक और जातीय तनाव पैदा कर राजनीति करनेवाले तब भी थे और आज भी हैं, बस फ़र्क़ यह है कि उनके मुखौटे बदल गए हैं। उस वक़्त यह काम विदेशी करवाते थे और अब यही काम देशी चरित्र करा रहे हैं।</p>
<p>वस्तुतः ‘पाहीघर’ की कथा एक बहुआयामी अनुभव की धरोहर की दस्तावेज़ है, जो अपनी अन्तर्धारा के व्यापक फैलाव के चलते किसी स्थान या काल विशेष की परिधि में बँधना अस्वीकार कर जाती है।
ISBN: 9788171784011
Pages: 334
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्राय: शैली की माँग का दबाव ही ज़िम्मेदार होता है। इस प्रकार का अनुशासित लेखन दुर्लभ–सा है,
ख़ास तौर से ऐसी शैली में जहाँ भाषाई चमत्कार और आधुनिक जीवन के विविध सन्दर्भ–संकेतों का
खुलकर उपयोग किया गया हो। कुछ अलग–अलग स्थितियों, घटनाओं और फंतासियों को लेकर ही
उपन्यास का ताना–बाना तैयार किया गया है, पर उनका अन्तर्गुम्फन ऐसा है जो सहज रूप से
उपन्यास को एकसूत्रता में बाँध लेता है।
Gurukul : Ek Adhoori Kahani : Vol. 1
- Author Name:
Anita Rakesh
- Book Type:

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Description:
ऊपरी तौर पर एकरैखिक प्रतीत होनेवाला यह उपन्यास कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज़ से हमें कई स्तरों पर सम्बोधित करता है। मूलतः यह ज्ञान के उद्भव और सम्प्रेषण के अभाव को महसूस करते हुए उसकी सर्जना का प्रयास करता है। दुनियादारी के प्रिज़्म से दुनिया की विविधता को जानने और पहचानने वाला कर्नल हर शाम पार्थ को सम्बोधित करता है। हर दिन एक नई सुर्ख़ी, हर दिन एक नया उद्घाटन और हर दिन वयस्कता का एक-एक क़दम चढ़ता हुआ पार्थ।
यहाँ पार्थ हमारे मध्यवर्गीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो अपनी दैनिक चर्या से बाहर अक्सर नहीं देख पाता और नतीजतन उस दुनिया और व्यवस्था के बारे में उसकी कोई निर्णायक राय नहीं बन पाती जो उसकी नियति को निर्धारित करती है। कर्नल एक-एक करके उसको न्याय व्यवस्था, आतंकवाद, कारपोरेट जगत, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध आदि पर इधर की स्थितियों से अवगत कराता है।
अन्त में वह आता है पुरुष समलैंगिकता के प्रश्न पर जिस पर आज भी भारतीय समाज और क़ानून दोहरा पैमाना लागू करता है। वह इस नज़रिए को ख़ारिज करते हुए समलैंगिकों, समलैंगिक पुरुषों की सामाजिक स्थिति, उनके भीतरी-बाहरी अकेलेपन और दूसरी पीड़ाओं को रेखांकित करता है और कहता है कि यह लोग न अपराधी हैं, न समस्या। इन्हें दंड की नहीं, समझे जाने की ज़रूरत है।
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