Nirmohi Bhanvara
(0)
Author:
Prabodh Kumar SanyalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
75
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सुबह के पक्षी का प्रभात-वन्दना सुनकर तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं<strong>, </strong>किन्तु पक्षी का धर्म स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? पक्षी का धर्म यानी स्वतंत्रता का उछाह-भरा आवेग और अपने जमाए-जुटाए से निर्मोह!</p> <p>बांग्ला के प्रख्यात कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल के चर्चित उपन्यास ‘बिबागी भ्रमर’ का यह अनुवाद बांग्ला के माधुर्य को बरकरार रखते हुए संलग्नता और विराग की इस कथा को हम तक पहुँचाता है।</p> <p>पार्थ<strong>, </strong>नवेन्दु और हिना की यह कहानी रिश्तों के त्रिकोण की उतनी नहीं है जितनी पक्षी-धर्म यानी स्वातंत्र्य की चाहना की है। हिना अपनी व्यक्ति-चेतना को पत्नी की उस सीमित परिभाषा में नहीं ढल पाती जिसकी उम्मीद अन्तत: हर पुरुष करने लगता है<strong>, </strong>वह चाहे अपनी मान्यताओं में कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो। पार्थ एक ठिकाना है जहाँ वे दोनों न सिर्फ़ अपना मन खोल पाते हैं<strong>, </strong>बल्कि स्वयं को भी नए सिरे से देखने की कोशिश करते हैं।</p> <p>बांग्ला उपन्यासों-कहानियों की पठनीयता का प्रवाह और पात्रों का अपने जीवन-जगत में गहरे तक पैठे होना उन्हें लेखक से मुक्त करके हर पाठक की अपनी रचना बना देता है। यह कौशल इस उपन्यास में भी है। साथ ही है मानव-प्रकृति की अज्ञात तहों में उतरने का साहस जो समाजशास्त्रीय-वैचारिक आग्रहों से नहीं<strong>, </strong>जीवन को जस का तस देखने<strong>, </strong>उसे समझने की कोशिश करने और वास्तविकता को यथारूप ग्रहण करने की तैयारी से आता है।</p> <p>
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सुबह के पक्षी का प्रभात-वन्दना सुनकर तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं<strong>, </strong>किन्तु पक्षी का धर्म स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? पक्षी का धर्म यानी स्वतंत्रता का उछाह-भरा आवेग और अपने जमाए-जुटाए से निर्मोह!</p>
<p>बांग्ला के प्रख्यात कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल के चर्चित उपन्यास ‘बिबागी भ्रमर’ का यह अनुवाद बांग्ला के माधुर्य को बरकरार रखते हुए संलग्नता और विराग की इस कथा को हम तक पहुँचाता है।</p>
<p>पार्थ<strong>, </strong>नवेन्दु और हिना की यह कहानी रिश्तों के त्रिकोण की उतनी नहीं है जितनी पक्षी-धर्म यानी स्वातंत्र्य की चाहना की है। हिना अपनी व्यक्ति-चेतना को पत्नी की उस सीमित परिभाषा में नहीं ढल पाती जिसकी उम्मीद अन्तत: हर पुरुष करने लगता है<strong>, </strong>वह चाहे अपनी मान्यताओं में कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो। पार्थ एक ठिकाना है जहाँ वे दोनों न सिर्फ़ अपना मन खोल पाते हैं<strong>, </strong>बल्कि स्वयं को भी नए सिरे से देखने की कोशिश करते हैं।</p>
<p>बांग्ला उपन्यासों-कहानियों की पठनीयता का प्रवाह और पात्रों का अपने जीवन-जगत में गहरे तक पैठे होना उन्हें लेखक से मुक्त करके हर पाठक की अपनी रचना बना देता है। यह कौशल इस उपन्यास में भी है। साथ ही है मानव-प्रकृति की अज्ञात तहों में उतरने का साहस जो समाजशास्त्रीय-वैचारिक आग्रहों से नहीं<strong>, </strong>जीवन को जस का तस देखने<strong>, </strong>उसे समझने की कोशिश करने और वास्तविकता को यथारूप ग्रहण करने की तैयारी से आता है।</p>
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Book Details
-
ISBN9788180311413
-
Pages198
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: पिनोकियो के कारनामेद एडवेंचर्स ऑफ पिनोकियो (इतालवी : ले एडवेंचर डि पिनोकियो; जिसे अक्सर अंग्रेजी में पिनोकियो के रूप में संदर्भित किया जाता है) इतालवी लेखक कार्लो कोलोडी द्वारा छत्तीस अध्यायों का एक बच्चों का कॉमेडी फंतासी उपन्यास है। पहले पंद्रह अध्याय मूल रूप से बच्चों की साप्ताहिक पत्रिका जिओर्नेल प्रति बम्बिनी में 7 जुलाई, 1881 और 18 फरवरी, 1882 के बीच स्टोरिया डि उन बुराटिनो (‘एक कठपुतली की कहानी’) शीर्षक के तहत क्रमबद्ध किए गए थे। उन अध्यायों को 1883 में, इक्कीस अतिरिक्त अध्यायों के साथ, पुस्तक के रूप में फिर से प्रकाशित किया गया। उपन्यास का शीर्षक चरित्र और नायक एक जीवित लकड़ी की कठपुतली है, जिसे गेपेटो नामक एक खिलौना निर्माता ने बनाया है जो उसे अपने दत्तक पुत्र के रूप में लेता है। पिनोकियो प्रारंभ में अवज्ञाकारी और शरारती है। वह अपने पिता को त्याग देता है और रोमांच की तलाश में निकल जाता है। पिनोकियो को उसके कई दुष्कर्मों के लिए फाँसी दिए जाने के साथ ही मूल समाचार पत्र क्रमांकन समाप्त हो गया। विस्तारित उपन्यास संस्करण में, पिनोकियो को सोलहवें अध्याय में एक परी द्वारा बचाया जाता है। परी पिनोकियो को शिक्षित करती है और उसे अपने तरीके बदलने के लिए प्रेरित करती है। अपने अच्छे व्यवहार के पुरस्कार के रूप में, पिनोकियो अंततः एक वास्तविक लड़के में बदल जाता है। उपन्यास का लगभग दो सौ पचास विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया है। द एडवेंचर्स ऑफ पिनोकियो के विभिन्न संगीत, मंच, टेलीविजन और फिल्म रूपांतरण हुए हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध वॉल्ट डिज़्नी की 1940 की एनिमेटेड फिल्म पिनोकियो है। झूठ बोलने पर किसी की नाक बढ़ने का विचार, जिसे द एडवेंचर्स ऑफ पिनोकियो में पेश किया गया था, लोकप्रिय पौराणिक कथाओं में शामिल हो गया है।
Alokuthi
- Author Name:
Vijay Gaur
- Book Type:

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Description:
आलोकुठि सुन्दरबन में होते हुए भी वहाँ के नक्शे में दर्ज नहीं है। इस महादेश के त्रासद विभाजन के वक्त तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से भारत आए अधिसंख्य दलित शरणार्थियों के जीवन में आलोकुठि इतिहास के अँधेरों से बाहर आने की छटपटाती हुई कहानी है जो सुन्दरबन के वास्तविक भूगोल में घटित होती है। बानी, रुक्मी और रूपेन हालदार जैसे चरित्र मारीच झांपी जैसे वास्तविक भूगोल में बार-बार निर्वासन की त्रासद कथा से साक्षात्कार करते हैं।
1905 से लेकर बांग्लादेश बनने तक के काल खंड को छूती हुई यह कथा बंगाल से दंडकारण्य भेज दिए गए मनुष्यों की त्रासदी से साक्षात्कार कराती है। जड़ों को जमीन में जगह बनाने का स्वप्न गंगा-पद्मा की लहरों के साथ उपन्यास में हिलोरें लेता रहता है। लेकिन सुन्दरबन से दूसरे निर्वासन के लिए अभिशप्त शरणार्थियों की यह कथा उन मनुष्यों की त्रासदी को उजागर करती है जिसके बारे में इतिहास ने सायास चुप्पी साध रखी है।
हिन्दी में इस तरह के अछूते विषय पर यह सम्भवत: पहला उपन्यास है जिसको लिखने के लिए लेखक ने इतिहास के प्राय: विस्मृत कर दिए गए पक्ष को चुना। गंगा और पद्मा का जीवन्त भूगोल मनुष्य के जीवट और संघर्ष से भरी इस कथा को प्रामाणिकता प्रदान करता है।
— नवीन कुमार नैथानी
Aatankit
- Author Name:
Abid Surti
- Book Type:

- Description: "आबिद सुरती चित्रकार हैं, कार्टूनिस्ट हैं, व्यंग्यकार हैं, उपन्यासकार हैं, घुमक्कड़ हैं, फक्कड़ हैं—और एक कहानीकार भी हैं। विभिन्न कला-विधाएँ उनके लिए जिंदगी के ढर्रे को तोड़ने का माध्यम हैं। उनकी ये कोशिशें जितनी उनके चित्रों में नजर आती हैं, उससे अधिक नहीं तो कम-अज-कम उतनी ही उनकी कहानियों में भी नजर आती हैं। स्वभाव से यथार्थवादी होते हुए भी वे अपनी कहानियों में मानव-मन की उड़ानों को शब्दांकित करते हैं। जीवन की सच्चाई से सीधे साक्षात्कार न करके फंतासी और काल्पनिकता का सहारा लेते हैं। व्यंग्य का पैनापन इसी से आता है; क्योंकि यथार्थ से फंतासी की टकराहट से जो तल्खी पैदा होती है, उसका प्रभाव सपाट सच्चाई के प्रभाव से कहीं ज्यादा तीखा होता है। एक सचेत-सजग कलाकार की तरह आबिद अपनी कहानियों में सदियों से चली आ रही जड़-रूढ़ियों, परंपराओं और जिंदगी की कीमतों पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाते हैं और उन्हें तोड़ने के लिए भरपूर वार भी करते हैं। यह बात उन्हें उन कलाकारों की पंक्ति में ला खड़ा करती है, जो कला को महज कला नहीं, जिंदगी की बेहतरी के माध्यम के रूप में जानते हैं। सबसे बड़ी खूबी यह है कि आबिद के भीतर अब भी एक जिज्ञासु बालक मौजूद है, जो हर चीज पर क्या, क्यों, कैसे जैसे प्रश्नचिह्न लगाता रहता है। यही वजह है कि उनकी रचनाएँ जहाँ हमें आंदोलित और उद्वेलित करती हैं, वहीं हमारा बौद्धिक मनोरंजन भी करती हैं। विचार और रोचकता का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण बहुत कम रचनाकारों में नजर आता है—और जिनमें नजर आता है, वे प्रथम पंक्ति के रचनाकार हैं। —सुदीप "
Jai Somnath
- Author Name:
K. M. Munshi
- Book Type:

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Description:
भारत की प्राचीन संस्कृति के द्योतक सोमनाथ के भग्नावशेषों में आज फिर से नए जीवन का संचार हो रहा है। ‘जय सोमनाथ’ भारतीय इतिहास के उसी युग का संस्मरण है जब सोमनाथ के विश्वविख्यात मन्दिर का ग़ज़नी के महमूद के हाथों पतन हुआ और इस तरह यवनों द्वारा हमारी संस्कृति को एक असह्य धक्का सहना पड़ा।
इस ऐतिहासिक गाथा को सुविख्यात लेखक और इतिहासवेत्ता कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने एक अत्यन्त रोचक उपन्यास का रूप दिया है। इस उपन्यास में उस युग की राजनीतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि में ही इतिहास के पात्र फिर से सजीव हो उठे हैं। भाषा, भाव, शैली और प्रतिपत्ति की दृष्टि से जय सोमनाथ साहित्य-जगत को मुंशी जी की अमूल्य देन है।
Morchebandi
- Author Name:
Surendra Pratap
- Book Type:

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Description:
मोर्चेबन्दी’ उपन्यास जीवन और समाज के कई मोर्चो की कथा है जिसमें निजी और राजनीतिक मोर्चे हैं। मुख्य रूप से इस उपन्यास में भाषा समस्या को उठाया गया है। यह उपन्यास अंग्रेजी हटाओ पर आधारित है जिसमें अंग्रेजों से भारतीय भाषाओं की टकराहट है। भाषा की समस्या एक जटिल और विवादास्पद समस्या है। भारत में आज भी राष्ट्रभाषा का मुद्दा सुलझ नहीं पाया। मोर्चेबन्दी में अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं में सरकारी काम-काज की भाषा बनाने की प्रबल मांग है।
मोर्चेबन्दी का समूचा आन्दोलन गाँधीवादी समाजवादी मूल्यों आदर्शों पर आधारित है। इस उपन्यास में भाषा के अतिरिक्त छात्रों की अन्य समस्याओं शिक्षा-परीक्षा ढाँचे में अमूल-चूल परिवर्तन, सभी विश्वविद्यालयी समितियों में साझेदारी, पुस्तकालय का आधुनिकीकरण, बुकबैंक, शिक्षा ऋण, मुफ्त चिकित्सा, छात्र न्यायालय, मैरेज ब्यूरो सेंटर, शिक्षा के लिए फेलोशिप, रोजगार की गारंटी या बेरोजगारी भत्ता आदि का उल्लेख किया गया है।
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