Antim Adhyay
(0)
Author:
Bhairavprasad Gupt, Ramdhari Singh DiwakarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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गाँव की पृष्ठभूमि से पढ़े-लिखे युवा वर्ग का एक बड़ा तबका जो नगरों-महानगरों में रहने लगा है, इसमें कुछ उच्चपदस्थ अधिकारी भी हैं। आरक्षण की सुविधा के कारण पिछड़े और दलित भी इसमें शामिल हैं। अपनी पृष्ठभूमि से विच्छिन्न सुविधा सम्पन्न जिन्दगी जीनेवाले अधिसंख्य ऐसे लोग अहंवादी आत्मकेन्द्रित हैं। इनमें समरेश-जैसे नृशंस मनोवृत्ति के कृतघ्न भी हैं जो छल-छद्म से अपने माता-पिता को बेघर-बेजमीन बना देते हैं। इसकी दारुण परिणति होती है भूख और गरीबी से पिता की मृत्यु। गाँव के लोग कफन-काठी का इन्तजाम करते हैं। चार बेटों की बेसहारा माँ पड़ोस में नौकरानी बन जाती है।<br>जीवन के अन्तिम पड़ाव पर पहुँचे ऐसे कुछ पात्र हैं इस उपन्यास में जो बेटों के मारे हैं, लेकिन दयनीय नहीं हैं। टूटते मान-मूल्यों वाले गाँव के इन बूढ़ों में निरीहता और अकेलापन नहीं है। इनमें एक-दूसरे के दुख में शामिल होने, सहायता करने और सामूहिकता में सोल्लास जीने की मानवीय आकांक्षा और आश्वस्ति है। अमेरिका में रह रहे दो बेटों और और लन्दन में डॉक्टर-पुत्री द्वारा माँ को रिश्ते के मोहक मायाजाल में बन्दिनी बनाकर रखने और पीछे छूट गए पिता की विक्षिप्त होकर पागलखाने में मृत्यु दिल दहलानेवाली है।<br>ग्रामीण जीवन के कथाशिल्पी रामधारी सिह दिवाकर ने बड़े मनोयोग से आज के यथार्थ की यह मार्मिक कथा शिल्पित की है।
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गाँव की पृष्ठभूमि से पढ़े-लिखे युवा वर्ग का एक बड़ा तबका जो नगरों-महानगरों में रहने लगा है, इसमें कुछ उच्चपदस्थ अधिकारी भी हैं। आरक्षण की सुविधा के कारण पिछड़े और दलित भी इसमें शामिल हैं। अपनी पृष्ठभूमि से विच्छिन्न सुविधा सम्पन्न जिन्दगी जीनेवाले अधिसंख्य ऐसे लोग अहंवादी आत्मकेन्द्रित हैं। इनमें समरेश-जैसे नृशंस मनोवृत्ति के कृतघ्न भी हैं जो छल-छद्म से अपने माता-पिता को बेघर-बेजमीन बना देते हैं। इसकी दारुण परिणति होती है भूख और गरीबी से पिता की मृत्यु। गाँव के लोग कफन-काठी का इन्तजाम करते हैं। चार बेटों की बेसहारा माँ पड़ोस में नौकरानी बन जाती है।<br>जीवन के अन्तिम पड़ाव पर पहुँचे ऐसे कुछ पात्र हैं इस उपन्यास में जो बेटों के मारे हैं, लेकिन दयनीय नहीं हैं। टूटते मान-मूल्यों वाले गाँव के इन बूढ़ों में निरीहता और अकेलापन नहीं है। इनमें एक-दूसरे के दुख में शामिल होने, सहायता करने और सामूहिकता में सोल्लास जीने की मानवीय आकांक्षा और आश्वस्ति है। अमेरिका में रह रहे दो बेटों और और लन्दन में डॉक्टर-पुत्री द्वारा माँ को रिश्ते के मोहक मायाजाल में बन्दिनी बनाकर रखने और पीछे छूट गए पिता की विक्षिप्त होकर पागलखाने में मृत्यु दिल दहलानेवाली है।<br>ग्रामीण जीवन के कथाशिल्पी रामधारी सिह दिवाकर ने बड़े मनोयोग से आज के यथार्थ की यह मार्मिक कथा शिल्पित की है।
Book Details
-
ISBN9788119835126
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
Suhag Ke Nupur
- Author Name:
Amritlal Nagar
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
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