Nacohus
(0)
Author:
Purushottam Agrawal, Purushottam AgarwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
₹ 239.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
एक दशक पहले, आहत भावनाओं की हिंसक राजनीति के बढ़ते संकट पर टिप्पणी करते हुए, पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक व्यंग्य-लेख में, प्रस्ताव किया था, ‘आहट भावना आयोग का गठन’ कर ही दिया जाए...</p> <p>अब यह उपन्यास...ज़बान पर लगते जा रहे नित नए तालों की डरावनी ख़बर की पड़ताल करने के साथ ही, सूचना और मनोरंजन के सब तरफ़ पसरते जंजाल में, तकनीकी आतंक तले चेतना के हाशिए पर धकेले जा रहे विवेक की चीत्कार को स्वर देता है यह उपन्यास...</p> <p>पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ नई-नई गढ़ी जा रही वास्तविकता की पड़ताल के लिए गढ़े गए ‘बौनैसर’ और ऐसे अनेक विचारोत्तेजक शब्दों के कारण भी ध्यान खींचता है...</p> <p>स्वयं ‘नाकोहस’ भी ऐसा ही एक शब्द है...
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
एक दशक पहले, आहत भावनाओं की हिंसक राजनीति के बढ़ते संकट पर टिप्पणी करते हुए, पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक व्यंग्य-लेख में, प्रस्ताव किया था, ‘आहट भावना आयोग का गठन’ कर ही दिया जाए...</p>
<p>अब यह उपन्यास...ज़बान पर लगते जा रहे नित नए तालों की डरावनी ख़बर की पड़ताल करने के साथ ही, सूचना और मनोरंजन के सब तरफ़ पसरते जंजाल में, तकनीकी आतंक तले चेतना के हाशिए पर धकेले जा रहे विवेक की चीत्कार को स्वर देता है यह उपन्यास...</p>
<p>पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ नई-नई गढ़ी जा रही वास्तविकता की पड़ताल के लिए गढ़े गए ‘बौनैसर’ और ऐसे अनेक विचारोत्तेजक शब्दों के कारण भी ध्यान खींचता है...</p>
<p>स्वयं ‘नाकोहस’ भी ऐसा ही एक शब्द है...
Book Details
-
ISBN9788126728411
-
Pages164
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Kiya Ankiya
- Author Name:
Purushottam Agarwal +3
- Book Type:

- Description:
पुरुषोत्तम अग्रवाल हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक और सर्जनात्मक उपस्थिति हैं। उनका लेखन रूप और अन्तर्वस्तु की दृष्टि से विविध और विशाल है। उनकी कई स्वतंत्र छवियाँ हैं, लेकिन कोई एक छवि नहीं है। चिन्तक, आलोचक, कवि, कथाकार, विमर्शकार, कार्यकर्ता, पत्रकार, व्यंग्यकार, प्राध्यापक, फ़िल्म-विशेषज्ञ, धर्मशास्त्री से मिलकर उनकी छवि बनती है। उनकी समग्र छवि की परख और पहचान के लिए उनके सम्पूर्ण लेखन का परिचय प्राप्त करना जितना ज़रूरी है, उतना ही कठिन भी। उनका समग्र पाठ श्रमसाध्य है, इसलिए उनकी रचनाओं का एक प्रतिनिधि चयन और प्रकाशन विलम्बित माँग थी जिसे इस संचयन के प्रकाशन से पूरा करने का प्रयास किया गया है। नवीन और प्राचीन वैश्विक वैचारिक निरूपणों और साहित्यिक सिद्धान्तों की स्पष्ट समझदारी और उनसे संवाद की प्रवृत्ति पुरुषोत्तम अग्रवाल की शक्ति है, जो उनके लेखन को निरन्तर आकर्षक और विचारोत्तेजक बनाए रखती है। इसी से उनमें बौद्धिक साहस उत्पन्न होता है, इस साहस का एक प्रमाण है अस्मितावाद की शक्ति और सीमाओं का तटस्थ व साहसपूर्ण मूल्यांकन। इसी साहस का एक और प्रमाण है—धर्म, अध्यात्म और साम्प्रदायिकता पर उनका रुख़। वे धर्म को सत्ता-तंत्र मानते हैं लेकिन आध्यात्मिकता को सहज मानवीय प्रवृत्ति के रूप में देखते हैं। कबीर, कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के धर्म और अध्यात्म सम्बन्धी विचारों के आधार पर अपनी अवधारणा को तैयार करते हैं। उनकी दृढ़ मान्यता है कि धर्म का फलतः साम्प्रदायिकता का, उन्मूलन तभी सम्भव है जब आध्यात्मिकता को मानव सुलभ मानकर धर्म से उसे स्वायत्त किया जाए। पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेखन का एक बड़ा हिस्सा भक्तिकाल पर है। ख़ास तौर पर कबीर पर। जाति, धर्म, औपनिवेशिक आधुनिकता, अस्मितावाद इत्यादि वैचारिक निरूपणों से आच्छादित कबीर के कवि रूप को सामने लाकर उन्होंने उनकी प्रासंगिकता को पुनः अनुभूत बनाया है। बौद्धिक बेचैनी, साहित्यिक अभिरुचि, सांस्कृतिक अन्तर्दृष्टि और आलोचकीय विवेक के साथ समकालीन जीवन के विविध पक्षों और प्रश्नों पर विचार करनेवाले बुद्धिजीवी विरल हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल की पत्रकारिता इस दृष्टि से आश्वस्तिदायक है। उनका कथा साहित्य विविध संकटों से आच्छन्न बौद्धिक-जीवन के संघर्ष और जिजीविषा को सामने लाता है। उनके साहित्य में फासीवाद के देशी संस्करण के दबाव में अभिव्यक्ति के संकट और कला-बुद्धि-विरोधी दमघोंटू वातावरण की भयावहता का एहसास मुक्तिबोध की याद दिलाता है।
Hindi Saray : Astrakhan Vaya Yerevan
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
...और कई प्रमाणों की तरह अस्त्राखान के हिन्दू व्यापारी भी उस वास्तविकता के प्रमाण हैं, जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं महसूस की जाती। वे ऐसे पात्र हैं जो सैकड़ों सालों से अपने लिए लेखक तलाश रहे हैं। वे हिन्दी सराय में बुला रहे हैं, कोई जाने को तैयार नहीं। अस्त्राखान की हिन्दी सराय की ये आवाज़ें, यों तो काफ़ी पहले से सुनता रहा था, धुँधली सी यादें बनी हुई थीं। ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के अलावा, राहुल जी के ‘मध्य एशिया के इतिहास' में भी अस्त्राखान के व्यापारियों के भारत-सम्पर्क का उल्लेख है। ‘अकथ कहानी प्रेम की' लिखने के दौरान इन आवाज़ों की धुँधली यादें तो ताज़ा हो ही गईं, कुछ और आवाज़ें भी सुनाई देने लगीं। भारत के साथ-साथ अन्य सभ्यताओं के इतिहासों से भी आती हैं ऐसी आवाज़ें, जिन्हें औपनिवेशिक इतिहास-दृष्टि के अन्धविश्वास दबाते रहे हैं। ऐसी आवाज़ें मुझे बुलाती रहती हैं, कभी मेक्सिको तो कभी अस्त्राखान।
इन्हीं आवाज़ों को सुनने की उत्सुकता ने, अस्त्राखान में हिन्दी-सराय बनानेवाले, वोल्गा किनारे के तातार-बाज़ार में अपने मकानों और मक़ामों के अब तक दिखनेवाले निशान छोड़ जानेवाले मुलतानियों, मारवाड़ियों, सिन्धियों, गुजरातियों से बात करने की बेचैनी ने ही कराया, मेरा यह सफ़र हिन्दी सराय अस्त्राखान वाया येरेवान का...
—इसी पुस्तक से।
Jan Gopal : Sant Dadu Ke Jivanikar
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
हालाँकि आज उन्हें बहुत लोग नहीं जानते, लेकिन जन गोपाल आरम्भिक आधुनिक भारत के एक महत्त्वपूर्ण देशज बुद्धिजीवी थे। ‘जन गोपाल : संत दादू के जीवनीकार’ पुस्तक के लेखकों का कहना है कि ऐसे कई निर्गुण भक्त कवि रहे हैं जिन पर उनकी काव्य-मेधा और ऐतिहासिक अहमियत के बावजूद उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हक़दार थे। उन्नींसवीं सदी के राजस्थानी कवि एवं कथावाचक जन गोपाल भी ऐसी ही प्रतिभा हैं। यह पुस्तक उनके जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित एक अभूतपूर्व अध्ययन है। जन गोपाल किसी आम निर्गुणपंथी भक्त के साँचे में पूरी तरह फ़िट नहीं बैठते। उनका जन्म एक व्यापारी परिवार में हुआ; निर्गुण पंथ का चुनाव उन्होंने किसी पारिवारिक या सामाजिक परम्परा के चलते नहीं, बल्कि अपने सचेत निजी निर्णय के आधार पर किया। उन्होंने अपने साहित्य में न केवल छन्दशास्त्र, काव्य-परम्परा और शास्त्रीय हिन्दुस्तानी संगीत के अपने अद्भुत ज्ञान का बल्कि एक नागर तथा प्रगतिशील संवेदना का भी परिचय दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दादू जनम लीला’ का नाम सबसे पहले आता है जो उनके गुरु और अकबर के समकालीन दादू दयाल की जीवन-गाथा है। भागवत पुराण की कथाओं को भी उन्होंने अपने काव्य में पिरोया जिनमें ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘जड़ भरत चरित्र’ मुख्य हैं। इस पुस्तक में स्पष्ट होता है कि जन गोपाल का विशेष महत्त्व इसलिए है कि उन्होंने लोक-प्रचलित पौराणिक कथाओं को अपनी हिन्दी व ब्रज रचनाओं में समकालीनता का एक सूक्ष्म तेवर दिया। साथ ही इन कथाओं के नैतिक पक्ष को नए रूप में रचने की प्रक्रिया में उन्होंने पारम्परिक धर्मशास्त्र के मूल तत्त्व पर भी नई दृष्टि डाली और भक्ति को एक समतावादी और मुक्तिकारी रूप में प्रस्तुत किया। जन गोपाल के जीवन और कृतित्व के विश्लेषण के साथ और भक्ति परम्परा में उन्हें उनका उचित स्थान देते हुए लेखकों ने इस पुस्तक में उनके रचे तीनों चरित्रों (प्रह्लाद, ध्रुव और भरत) के साथ ही उनके बीस पद भी प्रस्तुत किए हैं। देशज बौद्धिक परम्पराओं और निर्गुण भक्ति के अध्ययन के लिए यह पुस्तक निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है।
‘Kaun Hain Bharat Mata?’
- Author Name:
Purushottam Agarwal +3
- Book Type:

- Description:
यह भारतमाता कौन है, जिसकी जय आप देखना चाहते हैं’? 1936 की एक सार्वजनिक सभा में जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से यह सवाल पूछा। वही जवाहरलाल जो भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन के सबसे महत्त्वपूर्ण नायकों में रहे और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री भी बने। फिर उन्होंने कहा : बेशक ये पहाड़ और नदियाँ, जंगल और मैदान सबको बहुत प्यारे हैं, लेकिन जो बात जानना सबसे ज़रूरी है वह यह कि इस विशाल भूमि में फैले भारतवासी सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। भारतमाता यही करोड़ों-करोड़ जनता है और भारतमाता की जय उसकी भूमि पर रहने वाले इन सब की जय है।’ यह किताब इस सच्ची लोकतांत्रिक भावना और समावेशी दृष्टिकोण को धारण करने वाले शानदार दिमाग़ को हमारे सामने रखती है। यह पुस्तक आज के समय में ख़ासतौर से प्रासंगिक है जब ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारतमाता की जय’ के नारे का इस्तेमाल भारत के विचार को एक आक्रामक चोगा पहनाने के लिए किया जा रहा है जिसमें यहाँ रहनेवाले करोड़ों निवासियों और नागरिकों को छोड़ दिया गया है।
‘कौन हैं भारतमाता?’ में नेहरू की क्लासिक किताबों—‘आत्मकथा’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और ‘भारत की खोज’—से लेख और अंश लिये गए हैं। उनके भाषण, निबन्ध और पत्र, उनके कुछ बहुत प्रासंगिक साक्षात्कार भी इसमें हैं। संकलन के दूसरे भाग में नेहरू का मूल्यांकन करते हुए अन्य लेखकों के अलावा महात्मा गांधी, भगत सिंह, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, अरुणा आसफ़ अली, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, अली सरदार जाफ़री, बल्देव सिंह, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, रिचर्ड एटनबरो, ली कुआन यू और अटल बिहारी वाजपेयी के आलेख शामिल हैं। बहुत सारे विषयों से गुँथी इस किताब के पन्नों में—जिसमें एक बहुत शानदार प्रस्तावना भी है—नेहरू एक ऐसे महत्त्वपूर्ण कर्मशील व विचारशील व्यक्ति के रूप में उभरते हैं जिनमें भारत की सभ्यतामूलक आत्मा की एक सहज समझदारी थी और साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता भी; और एक राजनेता के रूप में राजनीति की सारी मजबूरियों के बावजूद जो हमेशा एक लोकतंत्रवादी बने रहे। उनकी विरासत आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है—शायद हमारे इतिहास के किसी भी दौर से ज़्यादा वह आज प्रासंगिक है।
Sanskriti : Varchswa Aur Pratirodh
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
‘संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध’ भारतीय समाज और संस्कृति के उन सुविधाजनक सवालों से टकराने के क्रम में लिखी गई है, जिनसे बचने का हर सम्भव प्रयास अब तक किया जाता रहा है। संस्कृति पर अमूर्तनों की भाषा में लिखे गए तमाम पोथों से भिन्न यह पुस्तक मोहक आवरणों से ढके छद्म को उद्घाटित करती है। बढ़ता साम्प्रदायिक ज़हर, शोषण के नए तरीक़े, कुर्सी हथियाने के लिए धर्म का सीढ़ी की तरह किया जानेवाला इस्तेमाल, स्त्री-दमन का अनवरत सिलसिला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ जारी होनेवाले फ़तवे, उभरते दलित आन्दोलन को नाकाम करने में लगी अमानुषिक ताक़तें और मानवीय संवेदनातंत्र के निरन्तर छीजते जाने की प्रक्रिया—ये अब हमारे समय की कटु वास्तविकताएँ हैं। ईमानदार रचनाधर्मी मानस ने इन सभी मुद्दों को इस पुस्तक में उठाया है, सरलीकरणों से बचने की सफल कोशिश की है और इन प्रश्नों से जुड़ी प्रचलित प्रगतिशील व्याख्याओं की जाँच भी की है। सुपरिभाषित सांस्कृतिक प्रतीकों को पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नई दृष्टि से विश्लेषित करने का प्रयास किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसी कारण यह पुस्तक हमारे परम्परागत संस्कारों, स्वीकृत मूल्यों और प्रश्नातीत बना दी गई आस्थाओं को झकझोर देने में समर्थ हो सकेगी।
अपने भाषिक रचाव में यह पुस्तक विशिष्ट है। विचारगत नवीनता भाषा का नया तेवर चाहती है, जिसे डॉ. अग्रवाल ने सघन सर्जनात्मकता में अर्जित किया है। मधुर पदबन्धों के आदी हो चुके लोगों को इसमें ज़रूरी औषधीय कड़वाहट मिलेगी, साथ ही आद्यन्त कवि-सुलभ रससिक्तता भी।
तथाकथित ‘जातिवाद’ के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थों की सर्वथा नई व्याख्या और वर्णाश्रम के सांस्कृतिक अर्थ का विचारोत्तेजक रेखांकन इस पुस्तक के तर्क की अपनी विशेषताएँ हैं।
समाज, संस्कृति और सर्जनात्मकता का गतिशील परिप्रेक्ष्य विकसित करने की बौद्धिक बेचैनी से भरपूर यह किताब उन सबके लिए ज़रूरी है, जो भारतीय समाज के अन्तर्निहित वर्चस्वतंत्र से जिरह करना चाहते हैं।
Vichar Ka Ananta
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
वर्तमान समय के केन्द्रीय किन्तु अवरुद्ध प्रश्नों के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल के टकराव और आत्ममन्थन की फलश्रुति है—‘विचार का अनंत’। एकेश्वरवाद को स्वयंसिद्ध और इतिहास का लक्ष्य मानने की सर्वस्वीकृत मान्यता का तर्कसंगत विरोध करते हुए इस पुस्तक में एकेश्वरवादी आस्था-तन्त्र और ज्ञान-मीमांसा की गहरी पड़ताल की गई है। इन निबन्धों में सर्जनात्मकता के आत्मसंघर्ष और समाज के साथ उसके सम्बन्ध को समझने की अकुलाहट है।
‘विचार का अनंत’ एक ऐसी पुस्तक भी है जिसमें सर्जनात्मकता मात्र की अपनी विशिष्ट ज्ञान-मीमांसा को अत्यन्त विचारोत्तेजक ढंग से रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक भक्ति-संवेदना को ‘शास्त्रोक्त’ और ‘काव्योक्त’ की परस्पर संबद्ध किन्तु भिन्न कोटियों में देखने का आग्रह करती है। ‘विचार का अनंत’ इस अर्थ में विशिष्ट है कि यह सभ्यताओं, संस्कृतियों, परम्पराओं के साथ संवाद करती है और यह भी स्पष्ट करती है कि उन दिनों अत्यन्त प्रचलित अस्मिता-विमर्श की नैतिक परिणतियाँ किस हद तक अनर्थकारी हैं या हो सकती हैं। संवेदनशील मनुष्य के मन में सहज रूप से विद्यमान, साझे मानवीय चैतन्य की सम्भावना को सशक्त स्वर देने के कारण ‘विचार का अनंत’ की उपस्थिति अपनी विशिष्टता के साथ सदैव बनी रहेगी।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
कबीर के समय को, जबदी हुई मनोवृत्ति का ‘मध्य-काल’ नहीं, देशज आधुनिकता का समय बताती हुई यह चर्चित और बहु-प्रशंसित पुस्तक प्रामाणिक और विचारोत्तेजक ढंग से कबीर और उनके समय का नया आख्यान रचती है। कबीर की काव्य-संवेदना का मार्मिक विश्लेषण करते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल याद दिलाते हैं कि ‘नारी-निंदक’ कहे गए कबीर प्रेम के पलों में नारी का ही रूप धारण करते हैं। यह पाठक पर है कि वह सम्बन्ध नारी-निन्दा के संस्कार से बनाता है, या नारी रूप धारण करती कवि-संवेदना से। पुस्तक काव्योक्त और शास्त्रोक्त भक्ति की धारणाएँ प्रस्तुत कर भक्ति-संवेदना के इतिहास पर पुनर्विचार की दिशा भी देती है। पुरुषोत्तम जी ने व्यापारियों और दस्तकारों द्वारा रचे जा रहे भक्ति के लोकवृत्त की अभूतपूर्व अवधारणा प्रस्तुत की है, और दिखाया है कि कबीर और अन्य सन्तों को ‘हाशिए की आवाज़’ देशज आधुनिकता में रचे गए भक्ति के लोकवृत्त ने नहीं, औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने बनाया है। देशभाषा स्रोतों से संवाद किए बिना भारतीय इतिहास को समझना असम्भव है। बीसवीं सदी में गढ़ी गई रामानन्द की संस्कृत निर्मिति के इतिहास को मौलिक शोध के आधार पर, जासूसी कहानी की सी रोमांचकता के साथ प्रस्तुत करते हुए पुरुषोत्तम जी बताते हैं कि ‘साजिश’ और ‘बुद्धूपन’ जैसे बीज-शब्दों के सहारे किसी परम्परा को नहीं समझा जा सकता। इस पुस्तक की स्थापना है कि औपनिवेशिक आधुनिकता ने ग़ैर-यूरोपिय समाजों में ‘मध्यकालीन जड़ता को तोड़नेवाली प्रगतिशील भूमिका’ नहीं, देशज आधुनिकता को अवरुद्ध करने की भूमिका निभाई है। इस अवरोध ने अब तक चला आ रहा जो सांस्कृतिक संवेदना-विच्छेद उत्पन्न किया है, उसे दूर किए बिना हम न तो अपने अतीत का प्रामाणिक आख्यान रच सकते हैं, और न भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकते हैं। कबीर की कविता और भारतीय इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए अनिवार्य पुस्तक।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
Purushottam Agarwal
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Nij Brahma Vichar
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
धर्म के सामान्य अनुयायी, साधारण आस्थावान् लोग हों या धर्म को हिंसक राजनीति में बदलनेवाले चतुर सुजान, धर्म के अध्येता हों या कठोर आलोचक और घोर विरोधी—अपने सारे मतभेदों के बावजूद इनमें से अधिकांश एक बात पर सहमत हैं। वह यह कि धर्म और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। या तो अध्यात्म फ़िज़ूल की बात है, या फिर धर्म ही अध्यात्म का एकमात्र आधार और माध्यम है। या तो अध्यात्म का आशय है—समाजनिरपेक्ष आत्मलीनता या अध्यात्म का अर्थ है प्रतिक्रियावादी रहस्यवाद। दोनों में से किसी भी तर्क-पद्धति को अपनाइए, निष्कर्ष पहले से तय है : यदि अध्यात्म के प्रश्नों में आपकी दिलचस्पी है तो आप धर्म को अपनाइए; यदि आप धर्म से असुविधा महसूस करते हैं तो अध्यात्म को भी साथ-साथ ख़ारिज कर दीजिए।
परस्पर विरोधी तर्क-पद्धतियों का निष्कर्ष के धरातल पर यह सामंजस्य अद्भुत है। धर्मेतर अध्यात्म की सम्भावनाओं पर विचार का प्रस्ताव, जो यह पुस्तक आपको देती है, विरुद्धों के इस सामंजस्य से टकराने का, और हो सके तो इसके परे जाने का प्रस्ताव है।
पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से दैनिक ‘जनसत्ता’ में चिन्तक-आलोचक
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल का चर्चित कॉलम ‘मुखामुखम’ एक समग्रबोध की साधना करने की भरसक कोशिश करता रहा है। सैद्धान्तिक प्रश्नों से जूझने से लेकर अटलांटा, वर्धा और गोपेश्वर के अनुभव-संवेदनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने तक के रूप में ये लेख लगातार उत्सुकता के साथ पढ़े गए। जाने-माने बुद्धिजीवियों से लेकर पाठकों तक सभी ने इनमें विशेष दिलचस्पी ज़ाहिर की। बहसें भी हुईं। शुरुआती एक वर्ष (मई 2003-मई 2004) में प्रकाशित चर्चित लेख यहाँ पुस्तक रूप में प्रस्तुत हैं। लेखक ने इनमें वे आवश्यक पाद-टिप्पणियाँ और सन्दर्भोल्लेख भी जोड़ दिए हैं, जो अख़बार में नहीं आ सकते थे, लेकिन ज़रूरी थे।
Kabir Granthawali : Parimarjit Paath
- Author Name:
Kabir +2
- Book Type:

- Description:
कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं।
ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो...
आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया।
यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है।
पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी।
‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Padmavat : Manush Pem Bhaeu Bainkunthi
- Author Name:
Purushottam Agrawal +1
- Book Type:

- Description:
एक थी रानी पद्मिनी जिसे लोक-मन की कल्पनाओं ने गढ़ा और इतिहास में स्थापित कर दिया। राजपूताना के सम्मान और शान के रूप में लोग उसकी कथा कहते-सुनते रहे। एक थी ‘पद्मावत’ जिसे मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी में लिखा, और जिसमें उन्होंने स्त्री, प्रकृति और प्रेम के सौन्दर्य की एक अमर छवि गढ़ी। छात्र उसके अंशों को पाठ्यक्रम में पढ़ते और कोर्स में लगी हर सामग्री की तरह रट-रट कर भूल जाते। फिर एक फ़िल्म बनी, जिससे पता चला कि लोग न पद्मिनी को जानते हैं, न ‘पद्मावत’ को; कि वे एक मिथक को सच की तरह पढ़ रहे हैं और जो चीज़ वास्तव में पढ़ने योग्य है, उसे पढ़ ही नहीं रहे। इसलिए यह किताब। नवोन्मेषकारी विचार और सृजनात्मक आलोचकीय मेधा के धनी प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल अपनी इस किताब में 'पद्मावत' को भारत के आरम्भिक आधुनिक काल की रचना कहते हैं जिसके केन्द्र में एक स्त्री है, एक ऐसा काव्य जिसमें चरित्रों का मूल्यांकन उनके व्यक्तिगत कार्यों और गुणों के अनुसार होता है, उनकी धार्मिक, जातिगत या सामाजिक पहचान से नहीं। यह एक प्रेम कविता है। श्रेष्ठ कविता जो स्त्रीत्व का जश्न मनाती है और शृंगार रस जिसका महत्त्वपूर्ण अंग है। ‘पद्मावत’ और उसकी इस मीमांसा से हम जान पाते हैं कि जायसी की संवेदना में इस्लामी परम्परा के ज्ञान और सूफ़ी आस्था के साथ-साथ हिन्दू पुराण कथाओं, मान्यताओं और अवध के लोकजीवन की गहरी जानकारी और लगाव एक साथ अनुस्यूत है। पुरुषोत्तम जी खुद इस किताब को ‘जायसी की कविता के नशे में बरसों से डूबे एक पाठक द्वारा’ अपनी एक प्रिय रचना का पाठ कहते हैं जो स्पष्ट है, सिर्फ़ आलोचना नहीं है, भारत की अपनी, उपनिवेश-पूर्व, आधुनिकता की सौन्दर्य-चेतना और काव्यबोध से सम्पन्न एक क्लासिक कृति का रचनात्मक अवगाहन है।
Majbuti Ka Naam Mahatma Gandhi
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
आक्रामकता किसी भी कीमत पर खुद को बचाए रखने की प्रेरणा से उत्पन्न होती है और यही प्रेरणा कायरता का भी स्रोत है। यदि आप दूसरे को ध्वस्त करके स्वयं को नहीं बचा सकते तो भागकर बचाते हैं। कायरता और अहिंसा पर्यायवाची नहीं हैं, हिंसा और कायरता एक-दूसरे की पूरक हैं। इसलिए गांधी की अहिंसा न कायरता है, न मजबूरी; वह एक सचेत संकल्प है ताकत, हिंसा और अविवेक की आँधी के सामने अचल खड़े रहने का। गांधी नामक भाव के आधारभूत मूल्यों, खासतौर पर अहिंसा को लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल लम्बे समय से सोचते रहे हैं। इसी चिन्तन का नतीजा है वह सूत्र जो इस पुस्तक का शीर्षक है ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ जिसने हर खासो-आम में स्वीकृत उस मुहावरे को एकदम पलट दिया जिसके मुताबिक महात्मा गांधी एक मजबूरी का नाम हैं। वे कहते हैं कि वे अगर मजबूरी हैं तो सिर्फ उन लोगों के लिए जिनके पास गांधी की मजबूती की कोई काट नहीं है, जो उनसे नफरत करते हुए भी उनको अनदेखा नहीं कर सकते। वे इस तथ्य पर भी जोर देते हैं कि गांधीजी की अहिंसा धार्मिक परम्पराओं में बताई गई अहिंसा नहीं है, वह उनकी मौलिक जीवन-दृष्टि है जो करुणा और संयम पर टिकी है। उनके लिए वह ऐसा मूल्य है जो किसी भी परिस्थिति में त्याज्य नहीं है, क्योंकि उससे मनुष्य का भविष्य जुड़ा है। ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ शीर्षक जो व्याख्यान पुरुषोत्तम अग्रवाल ने 2005 में गांधी- जयन्ती के अवसर पर दिया था, और अपनी मौलिक दृष्टि के चलते जो बार-बार सुधीजन का ध्यान खींचता रहा है, इस पुस्तक में उसके अलावा उनके वे आलेख भी संकलित हैं जो उन्होंने गांधी-विचार के अन्य पहलुओं पर सोचते हुए समय-समय पर लिखे हैं। देश और धर्म दोनों को हिंसा से ही व्याख्यायित करने को व्याकुल हमारे इस समय में गांधी की अहिंसा के अर्थ को खोलने वाली यह किताब एक जरूरी हस्तक्षेप है।
Pratinidhi Kavitayen : Kunwar Narain
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
- Book Type:

- Description:
शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

- Description:
आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Andha Ullu
- Author Name:
Sadegh Hedayat +1
- Book Type:

- Description:
ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था।
एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है।
अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते।
अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Banbhatt Ki Aatmakatha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीत-कालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। बाणभट्ट की आत्मकथा अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है। इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। इसमें वह वाणी मुखरित है जो सामगान के समान पवित्रा और अर्थपूर्ण है-‘सत्य के लिए किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्रा से भी नहीं; लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती हैद-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?’’
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
- Book Type:

- Description:
जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Ajnabi
- Author Name:
Albert Camus +1
- Book Type:

- Description:
फ्रांस के अमर लेखक, नोबेल पुरस्कार-विजेता अल्बैर कामू मानव-अन्तर्मन के संवेगों और कुंठाओं को अनावृत करने में पटु हैं। नियति में उनका विश्वास है और कृत्य की स्वतंत्रता एक निर्दिष्ट परिधि में ही वह मानते हैं। आरम्भ से अन्त तक पाठक की रुचि को साधे रखनेवाले इस उपन्यास में नायक के समस्त क्रिया-कलाप और उसके साथ घटी घटनाओं में उनका यही जीवन-दर्शन व्यक्त हुआ है।
विश्व के विशिष्ट उपन्यास-साहित्य में स्थान पानेवाले उपन्यास ‘अजनबी’ की कथा-वस्तु न केवल हमारे मर्म को मथ देने में सफल होती है, वरन् हमें जीवन और कर्म, और इन दोनों के उद्देश्यों के सम्बन्ध में भी सोचने पर विवश करती है।
सन् 1942 में प्रकाशित इस उपन्यास को द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न हताशा और विसंगतियों को अभिव्यक्त करनेवाली कृति माना जाता है। उपन्यास के नायक से कामू यहाँ जीवन की निरुद्देश्यता और मृत्यु की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं; नायक की समाज से विरक्ति और उदासीनता का जैसा मार्मिक चित्रण कामू ने इस उपन्यास में किया है, वह आज भी स्तब्ध कर देता है।
Punarutthan
- Author Name:
Leo Tolstoy +1
- Book Type:

- Description:
आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था।
‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है।
‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Naukar Ki Kameez
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Book Type:

- Description:
‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book