Inteha
(0)
Author:
Ramendra KumarPublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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टूटी फूटी इक ख्वाइश है मेरी। इक हल्की सी गुज़ारिश है मेरी । बेइंतेहा चाहतों में लिपटी, इक सहमी सी सिफ़ारिश है मेरी ... रमेन्द्र कुमार (रमेन) राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक हैं। इन्होंने लेखन की प्रायः हर विधा जैसे फ़िक्शन, व्यंग, यात्रा संस्मरण एवं कविताओं के लेखन का कार्य किया है। इन्होंने अब तक कुल 28 पुस्तकें लिखी हैं जिनका अनुवाद कई भारतीय और विदेशी भाषाओं मे किया जा चुका है। इनकी रचनाएँ अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुकी हैं एवं संग्रहीत हैं। 2014 में प्रकाशित इनके उपन्यास 'मोहिनी' का प्रथम संस्करण मात्र एक हफ्ते में ही पूर्ण रूप से बिक गया। इनकी प्रथम नॉन-फ़िक्शन रचना 'इफेक्टिव पेरेंटिंग' भी काफी सराही जा रही है। रमेन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कथा वाचक और प्रेरणात्मक वक्ता हैं जो श्रोताओं के बीच अपनी अमिट छाप छोड़ने की क्षमता रखते हैं। इन्होंने 'जगन्नाथ संस्कृति' पर देश-विदेश में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया है। 'इंतेहा' इनके गीत एवं ग़ज़ल का प्रथम संग्रह है।
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टूटी फूटी इक ख्वाइश है मेरी। इक हल्की सी गुज़ारिश है मेरी । बेइंतेहा चाहतों में लिपटी, इक सहमी सी सिफ़ारिश है मेरी ... रमेन्द्र कुमार (रमेन) राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक हैं। इन्होंने लेखन की प्रायः हर विधा जैसे फ़िक्शन, व्यंग, यात्रा संस्मरण एवं कविताओं के लेखन का कार्य किया है। इन्होंने अब तक कुल 28 पुस्तकें लिखी हैं जिनका अनुवाद कई भारतीय और विदेशी भाषाओं मे किया जा चुका है। इनकी रचनाएँ अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुकी हैं एवं संग्रहीत हैं। 2014 में प्रकाशित इनके उपन्यास 'मोहिनी' का प्रथम संस्करण मात्र एक हफ्ते में ही पूर्ण रूप से बिक गया। इनकी प्रथम नॉन-फ़िक्शन रचना 'इफेक्टिव पेरेंटिंग' भी काफी सराही जा रही है। रमेन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कथा वाचक और प्रेरणात्मक वक्ता हैं जो श्रोताओं के बीच अपनी अमिट छाप छोड़ने की क्षमता रखते हैं। इन्होंने 'जगन्नाथ संस्कृति' पर देश-विदेश में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया है। 'इंतेहा' इनके गीत एवं ग़ज़ल का प्रथम संग्रह है।
Book Details
-
ISBN9789385137327
-
Pages67
-
Avg Reading Time1 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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चौदह फेरे तब केबल टी.वी. के धारावाहिक शुरू नहीं हुए थे और हिन्दी पत्रिकाओं में छपनेवाले लोकप्रिय धारावाहिक साहित्य-प्रेमियों के लिए आकर्षण और चर्चा का वैसे ही विषय थे, जैसे आज के सीरियल। चौदह फेरे जब ‘धर्मयुग’ में धारावाहिक रूप में छपने लगा तो इसकी लोकप्रियता हर किस्त के साथ बढ़ती गई। कूर्मांचल समाज में तो शिवानी को कई लोग चौदह फेरे ही कहने लगे थे। उपन्यास के रूप में इसका अन्त होने से पहले अहिल्या की फैन बन चुकी प्रयाग विश्वविद्यालय की छात्राओं के सैकड़ों पत्र उनके पास चले आए थे, ‘प्लीज, प्लीज शिवाजी जी, अहिल्या के जीवन को दुःखान्त में विसर्जित मत कीजिएगा।’ कैम्पसों में, घरों में शर्तें बदी जाती थीं कि अगली किस्त में किस पात्र का भविष्य क्या करवट लेगा। स्वयं शिवानी के शब्दों में ‘‘मेरे पास इतने पत्र आए कि उत्तर ही नहीं दे पाई। परिचित, अपरिचित सब विचित्र प्रश्न पूछते हैं - ’’ ‘क्या अहिल्या फलाँ समझा गया इसी भय से गर्मी में पहाड़ जाने का विचार त्यागना पड़ा। क्या पता किसी अरण्य से निकलकर कर्नल साहब छाती पर दुनाली तान बैठें?’’ कूर्मांचल से कलकत्ता आ बसे एक सम्पन्न-कुटिल व्यवसायी और उसकी उपेक्षिता परम्पराप्रिय पत्नी की रूपसी बेटी अहिल्या, परस्पर विरोधी मूल्यों और संस्कृतियों के बीच पली है। उसका राग-विराग और उसकी छटपटाती भटकती जड़ों की खोज आज भी इस उपन्यास को सामयिक और रोचक बनाती है। जाने-माने लेखक ठाकुरप्रसाद सिंह के अनुसार, इस उपन्यास की कथा धारा का सहज प्रवाह और आँचलिक चित्रकला के से चटख बेबाक रंग इस उपन्यासकी मूल शक्ति हैं।
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Book
Inteha by Ramendra Kumar is a work that begins with the soft-spoken vulnerability of unfulfilled longing — "टूटी फूटी इक ख्वाइश है मेरी" — and expands into a literary meditation on desire wrapped in hesitation. Published in 2014, this book is the work of a national award-winning author whose 28 books have been translated into multiple Indian and foreign languages. Kumar's voice is neither declarative nor ornamental; it moves with the restraint of someone who has lived through what he writes. Inteha is not a collection that performs emotion — it inhabits it, making room for readers who understand that the most honest yearnings are often the quietest. The work reflects a maturity born of range: Kumar has written across fiction, satire, travel memoir, and verse, and this cross-genre fluency lends Inteha a layered emotional architecture that rewards slow, reflective reading.
इंतेहा पढ़ते समय पाठक को कैसा अनुभव मिलेगा?
यह पुस्तक एक शांत, आत्मीय अनुभव देती है जो जल्दबाजी में नहीं पढ़ी जाती। रमेन्द्र कुमार की भाषा में संयम है, और हर पंक्ति एक ठहरी हुई चाहत को छूती है। पाठक को अपनी भावनाओं के साथ बैठने का समय मिलता है, जैसे किसी पुरानी यादों की डायरी पलटना। यह उन्हें अकेलेपन और इच्छाओं की बारीकियों से परिचित कराती है, बिना किसी नाटकीयता के।
यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?
यह उन पाठकों के लिए है जो काव्यात्मक गद्य और भावनात्मक सूक्ष्मता को सराहते हैं। जो लोग तेज कथानक के बजाय भाषा की बुनावट और आंतरिक संवेदना में रुचि रखते हैं, उन्हें यह किताब संतुष्ट करेगी। यह उन पाठकों की अपेक्षा करती है जो धीरे पढ़ सकें और हर शब्द को महसूस करने का धैर्य रखें।
इंतेहा का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक रूप से क्यों प्रासंगिक है?
आज के तेज़ और शोरगुल भरे समय में, इंतेहा अधूरी इच्छाओं और मौन की भाषा की याद दिलाती है। यह उस भारतीय भावुकता को छूती है जो खुलकर नहीं कही जाती, लेकिन मन में गहरे बसी रहती है। समकालीन भारत में जहां हर चीज़ तेज़ और सीधी है, यह किताब ठहरकर अपने भीतर झांकने का अवसर देती है।
रमेन्द्र कुमार का लेखन इस विषय को अन्य लेखकों से अलग कैसे बनाता है?
कुमार की विशेषता उनकी बहुविधा दक्षता में है — वे फ़िक्शन, व्यंग्य, यात्रा संस्मरण और कविता सभी में सिद्ध हैं। यह अनुभव इंतेहा में एक परिपक्व, संयत स्वर लाता है जो न तो अतिशय भावुक है, न ही सूखा। उनकी भाषा सादगी में गहराई छुपाती है, और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता होने के बावजूद वे दिखावा नहीं करते।
यह किताब पढ़कर पाठक के मन में क्या बचता है?
- अपनी अधूरी चाहतों के प्रति एक नरम स्वीकृति
- भाषा की सादगी में छुपी भावनात्मक गहराई की समझ
- यह अहसास कि कुछ इच्छाएं पूरी न होने में भी सुंदर होती हैं
- शांत, आत्मचिंतन का मूड जो कुछ समय तक मन में रहता है