Kashi Ka Assi
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ज़िन्दगी और ज़िन्दादिली से भरा एक अलग क़िस्म का उपन्यास। उपन्यास के परम्परित मान्य ढाँचों के आगे प्रश्नचिह्न। ‘अस्सी’ काशीनाथ की भी पहचान रहा है और बनारस की भी। जब इस उपन्यास के कुछ अंश ‘कथा रिपोर्ताज’ के नाम से पत्रिकाओं में छपे थे तो पाठकों और लेखकों में हलचल-सी हुई थी। छोटे शहरों और क़स्बों में उन अंक विशेषों के लिए जैसे लूट-सी मची थी, फ़ोटोस्टेट तक हुए थे, स्वयं पात्रों ने बावेला मचाया था और मारपीट से लेकर कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ तक दी थीं। अब यह मुकम्मल उपन्यास आपके सामने है जिसमें पाँच कथाएँ हैं और उन सभी कथाओं का केन्द्र भी अस्सी है। हर कथा में स्थान भी वही, पात्र भी वे ही—अपने असली और वास्तविक नामों के साथ, अपनी बोली-बानी और लहज़ों के साथ। हर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दे पर इन पात्रों की बेमुरव्वत और लट्ठमार टिप्पणियाँ काशी की उस देशज और लोकपरम्परा की याद दिलाती हैं जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे। उपन्यास की भाषा उसकी जान है—भदेसपन और व्यंग्य-विनोद में सराबोर। साहित्य की ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर’ वाणी शायद कहीं दिख जाए!
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ज़िन्दगी और ज़िन्दादिली से भरा एक अलग क़िस्म का उपन्यास। उपन्यास के परम्परित मान्य ढाँचों के आगे प्रश्नचिह्न।
‘अस्सी’ काशीनाथ की भी पहचान रहा है और बनारस की भी। जब इस उपन्यास के कुछ अंश ‘कथा रिपोर्ताज’ के नाम से पत्रिकाओं में छपे थे तो पाठकों और लेखकों में हलचल-सी हुई थी। छोटे शहरों और क़स्बों में उन अंक विशेषों के लिए जैसे लूट-सी मची थी, फ़ोटोस्टेट तक हुए थे, स्वयं पात्रों ने बावेला मचाया था और मारपीट से लेकर कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ तक दी थीं।
अब यह मुकम्मल उपन्यास आपके सामने है जिसमें पाँच कथाएँ हैं और उन सभी कथाओं का केन्द्र भी अस्सी है। हर कथा में स्थान भी वही, पात्र भी वे ही—अपने असली और वास्तविक नामों के साथ, अपनी बोली-बानी और लहज़ों के साथ। हर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दे पर इन पात्रों की बेमुरव्वत और लट्ठमार टिप्पणियाँ काशी की उस देशज और लोकपरम्परा की याद दिलाती हैं जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे।
उपन्यास की भाषा उसकी जान है—भदेसपन और व्यंग्य-विनोद में सराबोर। साहित्य की ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर’ वाणी शायद कहीं दिख जाए!
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 23rd
- Publication year
- 2006
- Weight
- 212 grams
- ISBN-13
- 9788126711468
- Pages
- 172
- Reading time
- ~6 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था। ‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है। ‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
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आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Andha Ullu
- Author Name:
Sadegh Hedayat +1
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ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था। एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है। अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते। अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky +1
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Awating description for this book
Raat Ka Reporter
- Author Name:
Nirmal Verma
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रात का रिपोर्टर सम्भवत: आपातकाल के दिनों को लेकर लिखा गया हिन्दी में पहला उपन्यास है, और निर्मल जी के कथा-लेखन में नए मोड़ का सूचक भी। उपन्यास का कथा-नायक रिशी यहाँ एक ऐसे पत्रकार के रूप में सामने आता है, जिसका आन्तरिक संकट उसके बाह्य सामाजिक यथार्थ से उपजा है... हालात ने उसे जैसे अस्वस्थ और शंकालु बना दिया है। उसके चारों ओर अँधेरे का साम्राज्य है और उसका अन्तर्जगत भी उसकी ज़द में है। ऐसे में यदि वह अपने इर्द-गिर्द के अँधेरे को जाँचने-परखने की कोशिश करता है, तो स्वयं भी उसकी कसौटी पर होता है। वस्तुतः यह एक ऐसी कथाकृति है, जो एक बुद्धिजीवी की चेतना पर पड़ने वाले युगीन दबावों को रेखांकित करती है और उन्हें उसके व्यवहार में घटित होते हुए दिखाती है। इससे गुज़रते हुए हम जिस माहौल से गुज़रते हैं, वह चाहे हमारे अनुभव से बाहर रहा हो या हम उससे बाहर रहे हों, लेकिन वह हमारी दुनिया की आज़ादी के बुनियादी सवालों से परे नहीं है।
Muhar
- Author Name:
Chandan Pandey
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रोली घमंडी है, रोली अकडू है, रोली ज़िद्दी है... ऐसी तमाम तोहमतों के बीच रोली है कि नौकरी पाने, नौकरी की जगह तक पहुँच पाने और वहाँ से घर लौटने की जद्दोजेहद से रोज़ गुज़र रही है। यक़ीन कीजिए कि ये साधारण सी दिखने वाली बातें एक वर्किंग वूमन के लिये रोज़ लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ हैं। जेंडर, आयु और शहरी/ग्रामीण पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर किये जाने वाले कई सूक्ष्म और स्थूल भेदभाव हैं जिनका सामना रोली और उस जैसी तमाम कामकाजी स्त्रियों को रोज़ करना होता है। परिवार, समाज और रोज़गार के मुश्किल कुरुक्षेत्र में जूझती रोली को केंद्र में रखकर लिखी गई ये कहानियाँ हर कामकाजी स्त्री के जीवन, स्वप्न और संघर्ष का सूक्ष्म और मार्मिक दस्तावेज़ बन पड़ी हैं।
Banbhatt Ki Aatmakatha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीत-कालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है। इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती हैद-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?’’
Ajnabi
- Author Name:
Albert Camus +1
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फ्रांस के अमर लेखक, नोबेल पुरस्कार-विजेता अल्बैर कामू मानव-अन्तर्मन के संवेगों और कुंठाओं को अनावृत करने में पटु हैं। नियति में उनका विश्वास है और कृत्य की स्वतंत्रता एक निर्दिष्ट परिधि में ही वह मानते हैं। आरम्भ से अन्त तक पाठक की रुचि को साधे रखनेवाले इस उपन्यास में नायक के समस्त क्रिया-कलाप और उसके साथ घटी घटनाओं में उनका यही जीवन-दर्शन व्यक्त हुआ है। विश्व के विशिष्ट उपन्यास-साहित्य में स्थान पानेवाले उपन्यास ‘अजनबी’ की कथा-वस्तु न केवल हमारे मर्म को मथ देने में सफल होती है, वरन् हमें जीवन और कर्म, और इन दोनों के उद्देश्यों के सम्बन्ध में भी सोचने पर विवश करती है। सन् 1942 में प्रकाशित इस उपन्यास को द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न हताशा और विसंगतियों को अभिव्यक्त करनेवाली कृति माना जाता है। उपन्यास के नायक से कामू यहाँ जीवन की निरुद्देश्यता और मृत्यु की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं; नायक की समाज से विरक्ति और उदासीनता का जैसा मार्मिक चित्रण कामू ने इस उपन्यास में किया है, वह आज भी स्तब्ध कर देता है।
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