Sadabahar Kahaniya : Chatursen
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आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने हिंदी के ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों को नया प्रस्थान दिया। स्पष्ट विषय, युग विशेष का समर्थ चित्रण, संस्कृतनिष्ठ तथा आलंकारिक भाषा-शैली में के नाते अलग से पहचाने जाते हैं। वैशाली की नगरवधू, वयं रक्षामः, सोमनाथ जैसे उनके उपन्यासों ने उन्हें लोगों के ज़ेहन में अमर कर दिया। उन्होंने अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया है लेकिन उपन्यास और कहानियाँ ही उनकी प्रतिष्ठा का आधार हैं। यहाँ उनकी हर टेस्ट की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ दी जा रही हैं। आशा है आपको पसंद आएँगी।
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आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने हिंदी के ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों को नया प्रस्थान दिया। स्पष्ट विषय, युग विशेष का समर्थ चित्रण, संस्कृतनिष्ठ तथा आलंकारिक भाषा-शैली में के नाते अलग से पहचाने जाते हैं। वैशाली की नगरवधू, वयं रक्षामः, सोमनाथ जैसे उनके उपन्यासों ने उन्हें लोगों के ज़ेहन में अमर कर दिया। उन्होंने अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया है लेकिन उपन्यास और कहानियाँ ही उनकी प्रतिष्ठा का आधार हैं। यहाँ उनकी हर टेस्ट की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ दी जा रही हैं। आशा है आपको पसंद आएँगी।
Book Details
-
ISBN9789392088810
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age0-11 yrs
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Country of OriginIndia
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‘अछूत’ मराठी के दलित लेखक दया पवार का बहुचर्चित आत्मकथात्मक उपन्यास है, जो पाठकों को न केवल एक अनबूझी दुनिया में अपने साथ ले चलता है, बल्कि लेखन की नई ऊँचाई से भी परिचित कराता है।
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कथाकार ने छुटपन से वयस्क होने की संघर्ष-यात्राओं को बड़ी बारीकी से लेखनीबद्ध किया है। उसकी दृष्टि उन मार्मिक स्थलों पर अत्यन्त संवेदनशील हो जाती है, जो आभिजात्य तथा वादपरक आग्रहों के कारण उपेक्षित कर दिए जाते रहे हैं। यही कारण है कि इस रचना में वर्णित पिता मज़बूत इंसान, समर्पित कलाकार, पिसता हुआ गोदी मज़दूर और ओछा-चोट्टा सभी एक साथ हैं। माँ अत्यन्त अपमानजनक स्थितियों को नकारते हुए भी सभी कुछ को अनदेखा कर देती है। मित्रों, पड़ोसियों और आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोगों का जीवन कठोर होते हुए भी अत्यन्त रस-रंग भरा है। राजनीति में ह्रास का वातावरण मौजूद रहते हुए भी उसकी सार्थक भूमिका खोजी जा रही है।
‘अछूत’ साधारण लोगों की असाधारण गाथा है। आद्यन्त पठनीय तथा मन को भीतर तक छू लेनेवाली रचना।
Deshdrohi
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Yashpal
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Description:
हमारे वर्तमान जीवन का यथार्थ क्या है? क्या ऐसे समय में भी मिथ्या-विश्वास और प्रवंचना की पिनक में सन्तुष्ट रह सकना सम्भव है? सौन्दर्य और तृप्ति की अभिलाषा उत्पन्न कर देना एक काम है। सौन्दर्य और तृप्ति की स्मृति जगा कर सुख की अनुभूति उत्पन्न कर देना भी काम है, परन्तु उससे बढ़कर काम हो सकता है, सौन्दर्य और तृप्ति के साधनों की उत्पादन और परिस्थिति के निर्माण के लिए भावना और संकेत द्वारा सहयोग देना।
साहित्य का कलाकार केवल चारण बनकर सौन्दर्य, पौरुष और तृप्ति की महिमा गाकर ही अपने सामाजिक कर्त्तव्य को पूरा नहीं कर सकता। विकास और पूर्णता के सामाजिक प्रयत्न की इच्छा और उत्साह उत्पन्न करना और उस उत्साह को विवेक और विश्लेषण की प्रवृत्ति द्वारा सजग और सचेत रखने की भावना जगाना, साहित्य के कलाकार का काम है।
Mitro Marjani (Typographic)
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Krishna Sobti
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Description:
आलोचकों द्वारा पिछली सदी के दस महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में शुमार ‘मित्रो मरजानी’ ने सर्जना के रचनात्मक पाठ की लेखकीय सीमाओं को उलाँघकर मित्रो जैसा एक ऐसा धड़कता पात्र हमें दिया है जो लेखक से अलग और आगे नितान्त अपने होने के बलबूते पर पाठकों और दर्शकों की महापंचायत में दशकों से बना हुआ है। मान लेना होगा कि इस रचना की बुनत में कुछ ऐसा ज़रूर घटित हुआ है जो सर्वसाधारण के चैतन्य में कुछ जगाता है। अपने शब्दों से, अपनी भाषा से कुछ ऐसा कहता है जो नया भी है और पुराना भी। पारिवारिक जीवन का ढका-छिपा नेपथ्य और उसके संवेदन का द्रष्टव्य मित्रो की उपस्थिति के साथ-साथ उसके संवाद की नकोर भाषा में मुखर होता है। गृहस्थ की देहरी पर टिकी स्त्री की पारम्परिक छवि आदिम उत्तेजनाओं से निजात पाने को व्याकुल दीखती है, पर छटपटाहट में ही अपने वजूद में उसे भी खोज रही है जिसे ‘अपने’ में अपना व्यक्तित्व कहते हैं।
प्रसिद्ध ग्राफ़िक कलाकार-चित्रकार नरेन्द्र श्रीवास्तव ने इस पात्र से प्रभावित हो ‘मित्रो मरजानी’ उपन्यास के मूलपाठ को चित्रात्मक वर्णमाला/लिपि में आबद्ध करने का निर्णय लिया और बरसों के परिश्रम से उपन्यास में अंकित मानवीय व्यवहार के विविध मुखड़ों को जिस ध्वनि-चित्रात्मक कौशल और स्फुरण से प्रस्तुत किया है, वह पाठक को उपन्यास की रेखाओं की त्वरित और ऊर्जावान सचित्र लिपि में भारतीय परिवार को पढ़ने और देखने का नया अनुभव देगा।
भारत में किसी पुस्तक की टाइपोग्राफ़िक प्रस्तुति का यह पहला प्रयास है, जो बेशक हिन्दी समाज के पाठकीय अहसास में भी कुछ अभिनव जोड़ेगा।
Bhairavee
- Author Name:
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...“कैसा आश्चर्य था कि वही चन्दन, जो कभी सड़क पर निकलती अर्थी की रामनामी सुनकर माँ से चिपट जाती थी, रात-भर भय से थरथराती रहती थी, आज यहाँ शमशान के बीचोबीच जा रही सड़क पर निःशंक चली जा रही थी। कहीं पर बुझी चिन्ताओं के घेरे से उसकी भगवा धोती छू जाती, कभी बुझ रही चिता का दुर्गंधमय धुआँ हवा के किसी झोंके के साथ नाक-मुँह में घुस जाता।...”
जटिल जीवन की परिस्थितियों ने थपेड़े मार-मारकर सुन्दरी चन्दन को पतिगृह से बाहर किया और भैरवी बनने को बाध्य कर दिया। जिस ललाट पर गुरु ने चिता-भस्मी टेक दी हो क्या उस पर सिन्दूर का टीका फिर कभी लग सकता है?
शिवानी के इस रोमांचकारी उपन्यास में सिद्ध साधकों और विकराल रूपधारिणी भैरवियों की दुनिया में भटककर चली आई भोली, निष्पाप चन्दन एक ऐसी मुक्त बन्दिनी बन जाती है, जो सांसारिक प्रेम-सम्बन्धों में लौटकर आने की उत्कट इच्छा के बावजूद अपनी अन्तर्आत्मा की बेड़ियाँ नहीं त्याग पाती और सोचती रह जाती है—क्या वह जाए? पर कहाँ?
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