Agnileek
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अग्निलीक’ उपन्यास आज़ादी के उत्तरार्द्ध की वह कथा है जिसके रक्त में आज़ादी के पूर्वार्द्ध यानी अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह के गर्व की गरमाहट तो है, लेकिन अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कभी जो हिदू-मुसलमान एक साथ लड़े थे, आज उसी ज़मीन पर बदली हुई राजनीति का खेल ऐसा कि उनके मंतव्य भी बदल गए है और मंसूबे भी। यह हिन्दी का सम्भवत: पहला उपन्यास है जिसमें हिन्दू-मुसलमान अपनी जातीय और वर्गीय ताक़त के साथ उपस्थित हैं। और यही कारण कि कथा शमशेर साँई के क़त्ल से शुरू होती है, उसकी गुत्थी मुखिया लीलाधर यादव और सरपंच अकरम अंसारी के बीच अन्तत: रहस्यमय बनी रहती है। क़ानून भी ताक़त के साथ ही खड़ा। असल में टूटते-छूटते सामन्तवाद के युग में अपने वर्चस्व को बनाए रखने की राजनीति क्या हो सकती है, इसे भावी मुखिया लीलाधर यादव की पोती रेवती के ज़रिए जिस रणनीति को लेखक ने गहराई से साधा है, उससे न सिर्फ़ बिहार को बल्कि भारतीय राजनीति में गहरी ज़ड़े जमा चुके वंशवाद को भी देखा-समझा जा सकता है। साथ ही यह भी कि इसको मज़बूत बनाने में रेशमा कलवारिन के रूप में उभरती हुई स्त्री-शक्ति का भी इस्तेमाल कितनी चालाकी से किया जा सकता है। ‘अग्निलीक’ अपने काल के घटना-क्रम में जीवन के कई मोड़ों से गुज़री रेशमा कलवारिन के साथ-साथ कई अन्य स्त्री-चरित्रों की अविस्मरणीय कथा बाँचता उपन्यास है। वह चाहे कभी प्रेम में रँगी यशोदा हो या उनकी पोती रेवती जिसके प्रेमी की उसका भाई ही अछूत होने के कारण हत्या कर देता है। सरपंच अकरम अंसारी के साथ बिन ब्याहे रहनेवाली उसी की फूफेरी बहन मुन्नी बी हो या शमशेर साँई को बेवा गुलबानो; सब अलग होते हुए भी उपन्यास को मुख्य कथा से अभिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यह उपन्यास महात्मा गाँधी के सपनों के गाँवों का उपन्यास नहीं है, इसमें वे गाँव हैं जो ‘हिन्द स्वराज’ की क़ब्र पर खड़े हैं। यहाँ जो हैं कलाली के धंधे में हैं, गंजेड़ी-जुआरी भी हैं। यहाँ राजनीति में प्रतिद्वंद्वी कट्टर दुश्मन हैं। जिन्हें अपने बच्चों की शिक्षा की फिक्र है, गाँव छोड़ चुके हैं। लेकिन हाँ, यहाँ जो स्त्रियाँ हैं, वे सिर्फ भोग की वस्तु नहीं हैं, मुक्ति का साहस भी रचना जानती हैं। अग्निलीक पुरबियों के जीवन-यथार्थ की दुर्लभ कथा है।
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अग्निलीक’ उपन्यास आज़ादी के उत्तरार्द्ध की वह कथा है जिसके रक्त में आज़ादी के पूर्वार्द्ध यानी अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह के गर्व की गरमाहट तो है, लेकिन अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कभी जो हिदू-मुसलमान एक साथ लड़े थे, आज उसी ज़मीन पर बदली हुई राजनीति का खेल ऐसा कि उनके मंतव्य भी बदल गए है और मंसूबे भी। यह हिन्दी का सम्भवत: पहला उपन्यास है जिसमें हिन्दू-मुसलमान अपनी जातीय और वर्गीय ताक़त के साथ उपस्थित हैं। और यही कारण कि कथा शमशेर साँई के क़त्ल से शुरू होती है, उसकी गुत्थी मुखिया लीलाधर यादव और सरपंच अकरम अंसारी के बीच अन्तत: रहस्यमय बनी रहती है। क़ानून भी ताक़त के साथ ही खड़ा। असल में टूटते-छूटते सामन्तवाद के युग में अपने वर्चस्व को बनाए रखने की राजनीति क्या हो सकती है, इसे भावी मुखिया लीलाधर यादव की पोती रेवती के ज़रिए जिस रणनीति को लेखक ने गहराई से साधा है, उससे न सिर्फ़ बिहार को बल्कि भारतीय राजनीति में गहरी ज़ड़े जमा चुके वंशवाद को भी देखा-समझा जा सकता है। साथ ही यह भी कि इसको मज़बूत बनाने में रेशमा कलवारिन के रूप में उभरती हुई स्त्री-शक्ति का भी इस्तेमाल कितनी चालाकी से किया जा सकता है।
‘अग्निलीक’ अपने काल के घटना-क्रम में जीवन के कई मोड़ों से गुज़री रेशमा कलवारिन के साथ-साथ कई अन्य स्त्री-चरित्रों की अविस्मरणीय कथा बाँचता उपन्यास है। वह चाहे कभी प्रेम में रँगी यशोदा हो या उनकी पोती रेवती जिसके प्रेमी की उसका भाई ही अछूत होने के कारण हत्या कर देता है। सरपंच अकरम अंसारी के साथ बिन ब्याहे रहनेवाली उसी की फूफेरी बहन मुन्नी बी हो या शमशेर साँई को बेवा गुलबानो; सब अलग होते हुए भी उपन्यास को मुख्य कथा से अभिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यह उपन्यास महात्मा गाँधी के सपनों के गाँवों का उपन्यास नहीं है, इसमें वे गाँव हैं जो ‘हिन्द स्वराज’ की क़ब्र पर खड़े हैं। यहाँ जो हैं कलाली के धंधे में हैं, गंजेड़ी-जुआरी भी हैं। यहाँ राजनीति में प्रतिद्वंद्वी कट्टर दुश्मन हैं। जिन्हें अपने बच्चों की शिक्षा की फिक्र है, गाँव छोड़ चुके हैं। लेकिन हाँ, यहाँ जो स्त्रियाँ हैं, वे सिर्फ भोग की वस्तु नहीं हैं, मुक्ति का साहस भी रचना जानती हैं।
अग्निलीक पुरबियों के जीवन-यथार्थ की दुर्लभ कथा है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2019
- Weight
- 256 grams
- ISBN-13
- 9789389577419
- Pages
- 256
- Reading time
- ~9 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21 cm
- Language
- Hindi
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...“इतने दिन बीत गए और मैं आज तक मुंडाओं को उनका राज नहीं दिला सका। गुलामी का अँधेरा उनके ऊपर पहले की तरह ही छाया हुआ है। ...पर कुछ दरवाज़े तो खुले हैं।...थोड़ी उजास तो आ रही है। मैंने उनके कई बन्धनों को खोल दिया है। अब वे असुरों की पूजा नहीं करते। अब वे प्रेतों से नहीं डरते। अब उन्होंने पहानों-ओझाओं को भेंट चढ़ाना बन्द कर दिया है।...पर मैंने यह कैसी राह चुन ली। इतनी कठिन राह! क्या वे सब इस राह पर चल सकेंगे? जानता हूँ मैं, यह एक कठिन राह है। जब पैर बढ़ाओ, तब काँटे। पर यही एक राह है जिस पर चलकर मुंडा गोरे साहबों के डर और पकड़ से आज़ाद हो सकते हैं। यह जो कुछ हो रहा है, क्या यह सब मैं कर रहा हूँ? नहीं, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता।...मैं तो बस उनकी साँसों में...उनके मन में,...उनकी आत्माओं में...उनकी नसों में एक तेज़ तूफ़ान की तरह रहना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे अपना पिता कहा और मैंने उनका पिता बनना स्वीकार किया। वे ग़ुलामी के बन्धन से छूटना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भरोसा चाहिए, और उन्होंने उस भरोसे को मेरे भीतर पाया।...उन्हें एक भगवान चाहिए, वे धर्म के बिना न तो जी सकते हैं और न ही मर सकते हैं। जनम-जनम से वे सिंबोङा को पूजते रहे, पर सिंबोङा ने उनकी सुधि नहीं ली। मेरे ऊपर उनके भरोसे ने उन्हें मेरे भीतर भगवान दिखाया। उन्होंने मुझे अपना भगवान माना और मुझे उनका भगवान बनना पड़ा। क्या करता मैं? उनके भरोसे को कैसे तोड़ता? मैं जानता हूँ दिकुओं, ज़मींदारों, साहेबों की ताक़त को। पर बिना लड़े कुछ नहीं हो सकता। हार के डर से लड़ने को रोका नहीं जा सकता। मैं जानता हूँ बन्दूक की ताक़त। मालूम है मुझे कि संथाल हूल में हारे, कोल, खरुआ और सरदार हारे, पर लड़ाई सिर्फ़ हार-जीत नहीं होती।...मुझे अपना अन्त मालूम है, पर मैं जानता हूँ कि उनकी जीत उनके भरोसे में ही छिपी है।...हाँ मैं आबा हूँ इस धरती का...भगवान हूँ मुंडाओं का...। मैंने मिशन में प्रभु यीशु की प्रशंसा में सुना था कि एक रोटी में उन्होंने हज़ारों-हज़ार लोगों की भूख मिटाई थी। आनन्द पांडे के घर सुना था कि भक्त प्रह्लाद के लिए भगवान ने सिंह का रूप धरा और खम्भा से निकलकर उसके मामा को मार डाला। मैं भी उन्हीं की तरह हूँ। लँगोटी पहने, तीर-धनुही लिये, भूखे पेट मुंडाओं को मैंने निडर किया है। आज हर मुंडा निडर है और दुनिया पर राज करनेवाले साहेबों के सामने छाती ताने खड़ा है।” —इसी पुस्तक से
Halant
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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हृषीकेश सुलभ के कथा संकलन ‘हलंत’ की कहानियाँ हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा का विकास प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों में भारतीय समाज की परम्परा, जीवनदृष्टि, समसामयिक यथार्थ और चिन्ताओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ विकृतियों और विसंगतियों का भी चित्रण है। मनुष्य की सत्ता और प्रवृत्ति की भीतरी दुर्गम राहों से गुज़रते हुए भविष्य के पूर्वाभासों और संकेतों को रेखांकित करने की कलात्मक कोशिश इन कहानियों की अलग पहचान बनती है। यथार्थ के अन्त:स्तरों के बीच से ढेरों ऐसे प्रसंग स्वत:स्फूर्ति उगते चलते हैं, जो हमारे जीवन की मार्मिकता को विस्तार देते हैं। संचित अतीत की ध्वनियाँ यहाँ संवेदन का विस्तार करती हैं और इसी अतीत की समयबद्धता लाँघकर यथार्थ जीवन की विराटता को रचता है। हृषीकेश सुलभ की कहानियाँ भाषा और शिल्प के स्तर पर नए भावबोधों के सम्प्रेषण की नई प्रविधि विकसित करती हैं। नई अर्थछवियों को उकेरने के क्रम में इन कहानियों का शिल्प पाठकों को कहीं आलाप की गहराई में उतारता है, तो कहीं लोकलय की मार्मिकता से सहज ही जोड़ देता है। जीवन के स्पन्दन को कथा-प्रसंगों में ढालती और जीवन की संवेदना को विस्तृत करती ये कहानियाँ पाठकों से आत्मीय और सघन रिश्ता बनाती हैं। हृषीकेश सुलभ के कथा-संसार में एकान्त के साथ-साथ भीड़ की हलचल भी है। सपनों की कोमल छवियों के साथ चिलचिलाती धूप का सफ़र है। पसीजती हथेलियों की थरथराहट है, तो विश्वास से लहराते हाथों की भव्यता भी है। भावनाओं और संवेदनाओं के माध्यम से अपना आत्यन्तिक अर्थ अर्जित करती इन कहानियों में क्रूरता और प्रपंच के बीच भी जीवन का बिरवा उग आता है, जो मनुष्य की संवेदना के उत्कर्ष और जिजीविषा की उत्कटता को रेखांकित करता है।
Joothi Gali
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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‘जूठी गली’ जीवनानुभव का एक ऐसा लोक है जिसके भीतर वर्तमान की आँधी में इतिहास की धूल और राख उड़ती रहती है। जब अठारहवीं सदी के आरम्भ में पटना का नाम अज़ीमाबाद हुआ, उन्हीं दिनों जूठी गली की नींव पड़ी थी। उन दिनों से अब तक यह गली ज़िन्दा है। लोग जनमते और विदा होते रहे, मकान बिकते-ढहते-बनते रहे, जूठी गली अपना रूप बदलती रही और किसी ज़िन्दा इनसान की तरह धड़कती रही। इसके बाशिन्दे ख़बरों के रसिया हैं। ख़बरें इस गली में हवा के पर लगाकर उड़ती हैं। जन्म और मृत्यु दोनों के लिए यहाँ समान भाव से सुख-दुःख उपजता है। प्रेम और नफ़रत एक ही बटुए में रखकर लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जो ज़ुबान प्रशंसा करते नहीं थकती वह पीठ फेरते ही निन्दा रस उड़ेलने लगती है। इस गली में मध्यवर्गीय प्रपंचों के कीचड़ में लिथड़कर जीती स्त्रियों के साथ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जो पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देती हैं और परिदृश्य बदल जाता है। राजनीति ने अपने नाख़ूनों के खरोचों से जूठी गली को जो घाव दिए हैं, लोग उन्हें सहलाते हुए जीते हैं। इस गली में जाति-दंश की ज़हरीली हवा बहती है। प्रेम करनेवाले यहाँ सम्मान नहीं, हँसी के पात्र हैं। हृषीकेश सुलभ अपनी रचनाओं में स्वयं नहीं बोलते बल्कि उनके पात्रों का जीवन-व्यापार और परिवेश कथ्य को सघनता से प्रकट करता है। अपनी सहज भाषा की मार्मिकता और आत्मीय कहन के हुनर के सहारे वे कथा के बीहड़ में उतरते हैं और जीवन के ऐसे क्षणों को रचते हैं जो मानवीय गरिमा की रक्षा करते हैं। जूठी गली हमारे समय का जीवन्त दस्तावेज़ है।
Rang Arang
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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‘रंग अरंग’ में भारतीय रंगमंच की विविधवर्णी छवियाँ अंकित हैं। इन छवियों को सहेजते हुए रंग-चिंतक हृषीकेश सुलभ अपने समय के सरोकारों के साथ शताब्दियों पुरानी रंगपरम्परा के गह्वरों में उतरते हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार की रंग-अवधारणाओं से टकराते हैं और अपने समय का रंगविमर्श रचते हैं। ‘रंग अरंग’ के आलेखों में एक ओर संस्कृत रंगमंच के बाद भाषा नाटकों के उदयकाल के लक्षणग्रन्थ वर्णरत्नाकर और धूर्त्तसमागम, पारिजातहरण और गोरक्षविजय जैसे नाटकों का गहन विश्लेषण है, तो दूसरी ओर प्रोबीर गुहा, अरविन्द गौड़ और सुबोध पटनायक जैसे रंगकर्मियों के माध्यम से आज के रंगकर्म की संघर्षशील धारा की विवेचनात्मक पड़ताल है। इनमें आज़ादी के समय अपने नाटकों से गाँवों में अलख जगानेवाले विस्मृत रसूल मियाँ के स्मरण के साथ-साथ हबीब तनवीर, श्यामानन्द जालान, विजय तेंडुलकर, नेमिचन्द्र जैन, जगदीश चन्द्र माथुर, देवेन्द्र राज अंकुर आदि की रचनात्मकता से गुज़रने का विनम्र प्रयास है,...और हैं सत्ता और सत्ता के पहरुओं से संस्कृति की टकराहट की ध्वनियाँ। प्रस्तुतियों में नवाचार के बहाने नाटक की समग्र प्रभावान्विति और रंगप्रविधियों के विश्लेषण से रंगआस्वादन के लिए राहों की खोज रंग अरंग के आलेखों की विशिष्टता है। हृषीकेश सुलभ उन विरल लोगों में हैं जो साहित्य और रंगमंच के साथ-साथ कला की विविध सरणियों में अपनी आवाजाही के लिए जाने जाते हैं। रंग अरंग उनकी इसी आवाजाही का साक्ष्य है। वे कथाकार, नाटककार और रंग-चिंतक तो हैं ही, रंगमंच, संगीत, नृत्य, फ़िल्म और चित्रकला के रसिक भी हैं। उनकी रसिकता रसज्ञता से परे जाकर रंगमंच और अन्य कलाओं की दीप्ति से हमारा साक्षात्कार करवाती है। ֹ‘रंग अरंग’ में रंगमंच के अलावा और भी बहुत कुछ समाहित है।
Rangmanch Ka Jantantra
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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रंगमंच का जनतंत्र ऐसी रचनाओं का संकलन है, जो रंगमंच की जनतांत्रिकता को गहराई से रेखांकित करती हैं। यह अतीत और वर्तमान की यायावरी है। इस यात्रा में समय, समाज, जीवन और रंगमंच के कई पहलू उद्घाटित होते हैं। इन रचनाओं का भूगोल काफ़ी विस्तृत है। यहाँ संस्कृत रंगमंच की महान परम्परा से लेकर आज के रंगमंच तक की अर्थवान छवियाँ अंकित हैं। इनमें एक ओर विदूषक और सूत्रधार जैसे रूढ़ चरित्रों तथा पूर्वरंग जैसी रंगरूढ़ियों का विश्लेषण है, तो दूसरी ओर भाषा संगीतकों के उदय, पारसी रंगमंच के अवसान, आज़ादी के बाद की रंगचेतना आदि की विवेचनात्मक पड़ताल है। समय के अन्तरंग में उतरकर अपनी रंगसम्पदा को जानने-समझने की ज़िद करती ये रचनाएँ पाठकों से आत्मीय संवाद क़ायम करती हैं। शास्त्रीयता, पारम्परिकता, महाकाव्यात्मकता, कालविद्धता और जनपक्षधरता की खोज में हृषीकेश सुलभ कई अजाने रास्तों से भी गुज़रते हैं और नए अन्तर्विरोधों की तरफ़ संकेत करते हैं। समय और समाज को अभिव्यक्त करने के लिए नई रंगभाषा, रंगदृष्टि, रंगयुक्तियों आदि की खोज करते हुए वह समकालीन रंगमंच की समस्याओं-चिन्ताओं से टकराते हैं और हमारे समय का रंगविमर्श रचते हैं। अपनी बात कहने के लिए हृषीकेश सुलभ ने रंगसिद्धान्तों, रंगव्यक्तित्वों, पुस्तकों, शैलियों, रंगप्रदर्शनों आदि विविध माध्यमों का सहारा लिया है। यह विविधता ही सही अर्थों में ‘रंगमंच का जनतंत्र’ की विशिष्टता है।
Pratinidhi Kahaniyan : Ajneya
- Author Name:
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
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रचनाकर्म को अर्थवत्ता की खोज से जुड़ा मानने वाले अज्ञेय की कहानियाँ प्रचलित अर्थों में ‘यथार्थ’ से क़रीबी जताती भले ही मालूम न पड़ती हों लेकिन, उनके ही शब्दों में कहें तो, अर्थवत्ता की खोज की मानवीय जिजीविषा को वे सूक्ष्मता से उद्घाटित करती हैं। उनका यथार्थ-बोध बाहरी दृश्य-जगत के बजाय आन्तरिक सत्य पर अधिक आश्रित है, मानवीय जीवन-सन्दर्भ से परे कहानी के सन्दर्भ की स्वतंत्र सत्ता को वे स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि व्यक्ति-वैशिष्ट्य केन्द्रित है, वह सामाजिकता की विरोधी नहीं है। वस्तुतः जिस दौर में हिन्दी कहानी-लेखन में ‘यथार्थ’ से जुड़ाव और उसका चित्रण ही श्रेष्ठता की कसौटी समझा जा रहा था, उसी दौर में अज्ञेय ने अपनी कहानियों में यथार्थ को सामाजिकता की सतही सीमा तक सीमित न मानकर वैयक्तिक संवेदनाओं के आधार पर उसको रचने या परखने को प्राथमिकता दी। दुर्भाग्य से इसे सामाजिक चेतना के अभाव के रूप में देखा गया। यह उनकी रचनात्मकता का सही आकलन नहीं था। यह ऐसा अवरोध था जिसको हटाए बिना उनकी कहानियों के मर्म तक पहुँचना सम्भव नहीं हो सकता। आज के कथित उत्तर-आधुनिक बल्कि अधुनान्तिक समय में अज्ञेय की कहानियाँ मानवीय जीवन के ऐसे अनेक प्रासंगिक पहलुओं की तरफ ध्यान दिलाती हैं जिन्हें अतीत की रूढ़ बहसों से फैले धुन्ध में देखना कठिन था।
Pratinidhi Kahaniyan : Ajneya
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
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जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Hamara Shahar Us Baras
- Author Name:
Geetanjali Shree
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आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति ‘हमारा शहर उस बरस’ में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाइयों से। बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन साम्प्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था। आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोज़मर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे। कृत्रिम जीवन-शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था। बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है। उस बरस को हम आज में भी घसीट लाए हैं। न ही बात है सिर्फ़ हमारे शहर की। ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’—सुलगता, खदकता—‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का। एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूँढ़ना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल। पुरानी धारणाएँ फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक़्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से। न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक। वे संगीनें जो दूर हैं उधर, उन पर मुड़ीं, वे हम पर भी न मुड़ जाएँ, वह धूल-धुआँ जो उधर भरा है, इधर भी न मुड़ आए। अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं—दूर, उस पार, उन लोगों में—पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके ख़ुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती। दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहाँ ख़ून बह रहा है। सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे। अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश ही इस गाथा का मूल। ख़ुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज़ पर धर देने जैसा। अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है। यही शुरुआत एक ज़बरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलि श्री ने ‘हमारा शहर उस बरस’ में की है। जान न पाने की बढ़ती बेबसी के बीच जानने की तरफ़ ले जाते हुए।
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

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आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky +1
- Book Type:

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Awating description for this book
Raat Ka Reporter
- Author Name:
Nirmal Verma
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रात का रिपोर्टर सम्भवत: आपातकाल के दिनों को लेकर लिखा गया हिन्दी में पहला उपन्यास है, और निर्मल जी के कथा-लेखन में नए मोड़ का सूचक भी। उपन्यास का कथा-नायक रिशी यहाँ एक ऐसे पत्रकार के रूप में सामने आता है, जिसका आन्तरिक संकट उसके बाह्य सामाजिक यथार्थ से उपजा है... हालात ने उसे जैसे अस्वस्थ और शंकालु बना दिया है। उसके चारों ओर अँधेरे का साम्राज्य है और उसका अन्तर्जगत भी उसकी ज़द में है। ऐसे में यदि वह अपने इर्द-गिर्द के अँधेरे को जाँचने-परखने की कोशिश करता है, तो स्वयं भी उसकी कसौटी पर होता है। वस्तुतः यह एक ऐसी कथाकृति है, जो एक बुद्धिजीवी की चेतना पर पड़ने वाले युगीन दबावों को रेखांकित करती है और उन्हें उसके व्यवहार में घटित होते हुए दिखाती है। इससे गुज़रते हुए हम जिस माहौल से गुज़रते हैं, वह चाहे हमारे अनुभव से बाहर रहा हो या हम उससे बाहर रहे हों, लेकिन वह हमारी दुनिया की आज़ादी के बुनियादी सवालों से परे नहीं है।
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