Dantkatha
Author:
Abdul BismillahPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 236
₹
295
Available
बहुचर्चित कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह की क़लम से लिखा गया यह एक अद् भुत उपन्यास है। अद्भुत इस अर्थ में कि इसकी समूची संरचना उपन्यास के प्रचलित मुहावरे से एकदम अलग है। इसमें मनुष्य की कहानी है या मुर्ग़े की अथवा दोनों की, यह जिज्ञासा लगातार महसूस होती है, हालाँकि यह न तो फंतासी है, न कोई प्रतीक-कथा।</p>
<p>कथा-नायक है एक मुर्ग़ा, जो मनुष्य की हत्यारी नीयत को भाँपकर अपनी प्राण-रक्षा के लिए एक नाबदान में घुस जाता है। लेकिन हुआ क्या? यह तो अब नाबदान से भी बाहर निकलना मुश्किल है। ऐसे में वह लगातार सोचता है : अपने बारे में, अपनी जाति के बारे में। और सिर्फ़ सोचता ही नहीं, दम घोंट देनेवाले उस माहौल से बाहर निकलने के लिए जूझता भी है। लगातार लड़ता है भूख और चारों ओर मँडराती मौत से, क्योंकि वह ज़िन्दा रहना चाहता है और चाहता है कि मृत्यु भी अगर हो तो स्वाभाविक, मनुष्य के हाथों हलाल होकर नहीं। इस प्रकार यह उपन्यास नाबदान में फँसे एक मुर्ग़े के बहाने पूरी धरती पर व्याप्त भय, असुरक्षा और आतंक तथा इनके बीच जीवन-संघर्ष करते प्राणी की स्थिति का बेजोड़ शब्दचित्र प्रस्तुत करता है। लेकिन मनुष्य और मुर्ग़े के अन्तःसम्बन्धों की व्याख्या-भर नहीं है यह, बल्कि मुर्ग़ों-मुर्ग़ियों का रहन-सहन, उनकी आदतें, उनके प्रेम-प्रसंग, उनकी आकांक्षाएँ, यानी सम्पूर्ण जीवन-पद्धति यहाँ पेन्ट हुई है। शायद यही कारण है कि 'दंतकथा’ में हर वर्ग का पाठक अपने-अपने ढंग से कथारस और मूल्यों की तलाश कर सकता है।
ISBN: 9789388933193
Pages: 87
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
आदिकाल से भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैली अस्पृश्यता की समस्या पर एक नए नज़रिए से लिखा गया उपन्यास। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में इस सामाजिक अवरोध से समाज को विमुक्त करने का प्रयास किया गया पर वैधानिक उपायों का समाज में व्यावहारिक अनुपालन नहीं हो सका। यह उपन्यास जाति-प्रथा की वर्तमान अवस्थिति को रेखांकित करते हुए इसके अतीत पर भी दृष्टिपात करता है जब सत्ताधारी समाज ने सवर्ण-अवर्ण की लक्ष्मण-रेखाएँ बनाकर मानवीय संवेदनाओं का तिरस्कार किया, अपने ही जैसी चमड़ी और ख़ून वाले व्यक्ति के साथ पाशविक व्यवहार किया और असंख्य लोगों को नारकीय जीवन जीने को विवश किया।
उपन्यास की कहानी में शोषित समाज के एक युवक का उपयोग उच्चवर्ण द्वारा अपना वंश बढ़ाने के लिए किया जाता है लेकिन उससे मिलती-जुलती मुखाकृति वाली सन्तान पैदा होने पर शोषक समाज उसे लोक-लज्जा से भयभीत होकर समाप्त करने की साज़िश में जुट जाता है। उपन्यास अतीत और वर्तमान की एक कड़ी के रूप में सामने आता है और सवाल उठाता है कि क़ानून की बन्दिशों के बावजूद क्या यह सामाजिक बुराई समाप्त हो पाई? क्या संस्कारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी घोली गई इस घृणा से समाज विमुक्त हो पाया? वर्तमान महानगरीय संस्कृति में अब जाति का कितना महत्त्व रह गया है और वर्तमान ग्रामीण समाज में क्या जाति ने कोई नया रूप लिया है? एक और सवाल जिस पर यह उपन्यास फ़ोकस करता है, वह है स्थानान्तरण—अपनी मूलभूमि को छोड़कर कहीं और जाकर सिर छिपाना। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह भी हमारे वर्तमान की एक ज्वलन्त समस्या है। कह सकते हैं कि तमाम सवालों के बीच इस उपन्यास में यह सवाल बराबर मौजूद रहता है। यह औपन्यासिक कृति पाठकों को निश्चय ही इन सभी सवालों से दो-चार होने को प्रेरित करेगी।
Mithila
- Author Name:
Amrit Tripathi
- Book Type:

- Description: मिथिला और कुसुमाकर के अधूरे प्रेम की कहानी है। उनमें भी मिथिला की ज़्यादा, कुसुमाकर की कम। एक पारम्परिक, संस्कारी परिवार की संगीत-प्रेमी मिथिला अन्तत: इस संसार से उस प्रेम के बिना ही विदा हो गई जिस प्रेम की प्यास उसकी आत्मा तक भरी हुई थी। संगीत में गहरी रुचि का धनी कुसुमाकर जीवन की आवश्यकताओं के मद्देनज़र पहले उससे दूर चला जाता है, उसे ख़्याल भी नहीं आता कि जिस मिथिला को वह अपने ऑटोग्राफ़ देकर चला आया है, वही एक दिन उसके जीवन में लौटेगी। वह लौटी और उसकी अतृप्त रूह का एकमात्र आसरा बन गई, पर तब तक वह किसी और की हो चुकी थी। कोई ऐसा व्यक्ति उसके जीवन का कर्णधार हो गया था जो उसके मन को नहीं समझता था। लेकिन जो उसे आपादमस्तक समझता-जानता था, क्या वह उसका हो सकता था? नहीं। अन्तत: वही हुआ। मृत्यु-शैया पर लेटी हुई मिथिला ने उसे अपना अन्तिम पत्र लिखा, और उसके प्रति अपनी आत्मा में बसे प्यार को स्वीकार करते हुए बताया कि वह जा रही है, उस अज्ञात की ओर जहाँ हो सकता है वे कभी मिलें, या हो सकता है कभी नहीं मिलें। गहरे प्रेम से पगी इस प्रेम-कथा को पढ़ना अधूरी और अतृप्त रूहों से भरे हमारे वर्तमान को एक राहत देता है, और हमें सोचने पर भी विवश करता ह
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