Yashpal Ka Kahani Sansar : Ek Antrang Parichya
Author:
C. M. YohannanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 128
₹
160
Unavailable
यह सर्वविदित है कि यशपाल प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में श्रेष्ठतम हैं। भारतीय जीवन के आदर्शवादी विचारों और व्यवहार में जो झूठ की दीवारें खड़ी थीं, उन्हें गिराने में यशपाल ने अपनी क़लम का इस्तेमाल किया। जीवन का कोई भी क्षेत्र उनके प्रहारों से बच न सका।</p>
<p>यशपाल कालजयी लेखक हैं। कथाकार की हैसियत से यशपाल की लोकप्रियता हिन्दी-जगत में जितनी व्यापक है, हिन्दीतर-जगत में उससे थोड़ी भी कम नहीं है। इसका कारण यह है कि कथाकार यशपाल ने शोषित वर्ग के जीवन का यथार्थपरक चित्र अंकित किया है।
ISBN: 9788180310423
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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पदमावत ने हमारे इतिहास वाड्मय को अत्यधिक प्रभावित किया है। पदमावत का अध्ययन उसके ऐतिहासिक आधार को टटोलते हुए किया गया है। पद्मावत का अनुशीलन पदमावत के ऐतिहासिक आधार', प्रकाशित होने पर संक्षिप्त संस्करण प्रकाशित करने की जरूरत महसूस हुई, जिससे जिन पाठकों को पूरी पदमावत पढ़ने का अवकाश नहीं है, वे भी इस अमर काव्य का रसास्वादन कर सकें। प्रस्तुत संग्रह उसी प्रयास का फल है। पदमावत का यह संक्षिप्त संग्रह प्रस्तुत करने में प्रयत्न किया गया है कि-
क. पदमावत के कथानक का सूत्र अटूट बना रहे.
ख. काव्य की दृष्टि से उत्कृष्ट सभी अंशों कासमावेश हो जाय,
ग. पदमावत के सभी पात्रों का चरित्र स्पष्ट हो जाय।
ठेठ अवधी भाषा के माधुर्य और भावों की गम्भीरता की दृष्टि से यह काव्य निराला है। इसके पठन-पाठन का मार्ग कठिनाइयों के कारण अब तक बन्द-सा रहा। एक तो इसकी भाषा पुरानी और ठेठ अवधी, दूसरे भाव भी गूढ़, अतः किसी शुद्ध अच्छे संस्करण के बिना इसके अध्ययन का प्रयास मुश्किल था। पदमावत का अनुशीलन पुस्तक इसी ओर एक प्रयास मात्र है।
Kitabnama
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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Description:
नामवर सिंह पाठ से गहरा, आत्मीय और संवादी तादात्म्य स्थापित कर सकने वाले आलोचक थे। अपने व्याख्यानों और साक्षात्कारों में वे उपन्यासों, कहानियों, कविताओं, निबन्धों, नाटकों और आलोचना-निबन्धों पर जिस तरह बात करते थे, उससे इसकी पुष्टि होती है।
पाठ का आस्वाद करने की क्षमता आलोचक के संवेदनात्मक आधारों पर निर्भर करती है और उसका विवेचन कर पाने की शक्ति उसकी ज्ञानात्मक तैयारी पर। यदि वह अपनी तैयारी के दौरान अन्तरानुशासित होकर जीवन-जगत को देखने की दृष्टि विकसित कर पाया है, तभी वह रचना के पाठ के जीवन-जगत में फैले आधारों को देख पाएगा।
प्रत्येक कृति अन्तत: एक विशिष्ट भाषा, उसकी साहित्यिक परम्परा और विधागत विरासत से संबद्ध होती है। एक परम्परा-सजग आलोचक ही इस बात की पहचान कर सकता है कि रचना परम्परा में कहाँ और किस वैचारिक-सौन्दर्यात्मक धारा में स्थित है। नामवर सिंह एक आलोचक के रूप में ‘पाठ’ से ऐसा गहरा और संवादी रिश्ता बना पाते थे, जहाँ उनकी ये सारी खूबियाँ एक साथ देखी जा सकती हैं।
Aalochana Ka Stree Paksha : Paddhati, Parampara Aur Paath
- Author Name:
Sujata
- Book Type:

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Description:
हिन्दी कविता और आलोचना की दुनिया लम्बे अरसे से ‘मुख्यधारा’ के इकहरे आख्यान से संचालित होती रही है, वह भी सवर्ण पुरुष-दृष्टि से। शिक्षा और संसाधनों पर उसका वर्चस्व साहित्य और कला को भी अपने ढंग से अनुकूलित करता रहा है। स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूहों की अभिव्यक्तियाँ इसी आधार पर या तो विस्मृत कर दी गईं या हाशिये पर डाल दी गईं।
आलोचना का स्त्री पक्ष सुजाता को अस्मिता-विमर्श की संश्लिष्ट धारा की प्रतिनिधि के रूप में सामने लाती है। वह गहन शोध द्वारा इतिहास के विस्मृत पन्नों से दमित अभिव्यक्तियों की निशानदेही करती हैं और समकालीन सृजन की बारीक परख भी। वह सबसे पहले हिन्दी कविता की मुख्यधारा की जड़ता को उजागर करती हैं, फिर लोक और परम्परा में स्त्री-कविता के निशान ढूँढ़ते हुए उसे नाकाफ़ी पारम्परिक कैननों में रखे जाने पर सवाल उठाती हैं और उसे परखने की स्त्रीवादी आलोचना-दृष्टि प्रस्तावित करती हैं। यह किताब एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह है जो हिन्दी आलोचना में एक ज़रूरी कैनन–स्त्रीवाद–को जोड़ती हुई उसे विमर्श के केन्द्र में ले आती है।
जहाँ वैश्विक स्तर पर हेलेन सिक्सू, लूस इरिगिरे, जूलिया क्रिस्टेवा जैसी आलोचकों ने स्त्री-भाषा को लेकर महत्त्वपूर्ण काम किए हैं, वहीं हिन्दी में अभी इस पर कुछेक अकादमिक काम के अलावा कोई ठोस बहस दिखाई नहीं देती। ऐसे में यह किताब ख़ासकर हिन्दी कविता और आम तौर पर भारतीय साहित्य में स्त्री-भाषा की समझ विकसित करने के लिए एक आवश्यक सैद्धान्तिक उपकरण उपलब्ध कराती है। साथ ही ‘आस्वाद की लैंगिक निर्मिति’ की सैद्धान्तिकी भी प्रस्तावित करती है।
पुस्तक का विशेष खंड वह है जिसमें सुजाता कुछ प्रमुख स्त्री कवियों के लेखन का विश्लेषण करते हुए स्त्रीवादी आलोचना की पद्धति भी प्रस्तावित करती हैं।
यह पुस्तक आलोचना की कथित मुख्यधारा को चुनौती भी है और वैकल्पिक, सर्वसमावेशी पद्धति का प्रस्ताव भी।
Rahasyavad
- Author Name:
Rammurti Tripathi
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में रहस्यवाद जैसे गूढ़, गहन और अस्पष्ट विषय पर साहित्य और दर्शन के अध्येता डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने स्पष्ट और सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया है। पुस्तक पाँच अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय—स्वरूप तथा प्रकार; द्वितीय अध्याय—अनुभूत रहस्य तत्त्व का स्वरूप; तृतीय अध्याय—रहस्यानुभूति की प्रक्रिया; चतुर्थ अध्याय—साधनात्मक रहस्यवाद; पंचम अध्याय—रहस्य की अभिव्यक्ति।
रहस्यवाद के स्वरूप पर विचार करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि रहस्यवाद ‘मिस्टीसिज़्म’ का रूपान्तर नहीं है बल्कि स्वतंत्र शब्द है और स्वतंत्र रूप में यह शब्द भारतीय प्रयोगों के आधार पर सुनिश्चित अर्थ से सम्पन्न है। ‘अनुभूत रहस्य तत्त्व का स्वरूप’ बताते हुए लेखक ने उपनिषद, तंत्र एवं नाथसिद्ध विचार परम्परा के आधार पर रहस्यानुभूति की व्याख्या की है।
पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय ‘रहस्यानुभूति की प्रक्रिया’ है जिसमें लेखक ने कबीर, जायसी आदि प्राचीन सन्त कवियों एवं प्रसाद, महादेवी आदि आधुनिक छायावादी कवियों के काव्य में प्राप्त रहस्यानुभूति के विविध रूपों का विवेचन किया है। रहस्यवादी कवियों की रूपगत और शिल्पगत विशेषताओं के विवेचन की दृष्टि से इस पुस्तक का अन्तिम अध्याय 'रहस्य की अभिव्यक्ति' विशेष रूप से द्रष्टव्य है।
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