Vibhajan Ki Vibheeshika
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Shri Manohar PuriPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
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भारत का विभाजन विश्व के सबसे बड़े नरसंहार के रूप में हिंदुओं और सिखों की महिलाओं की छाती पर हुआ। इसमें 30 लाख से अधिक लोगों की नृशंस हत्या हुई। विभाजन के समय हिंदू और सिख पुरुषों को एक लाइन में खड़ा करके पाकिस्तानी सेना ने गोलियों से भून दिया। एक लाख से अधिक महिलाओं का अपहरण व बलात्कार करके अधिकांश को मौत के घाट उतार दिया गया | उनकी संपत्ति को हड़प लिया अथवा उसे आग के हवाले कर दिया । विश्व में यह एकमात्र ऐसा उदाहरण है, जब करोड़ों की जनसंख्या का विनिमय बिना किसी योजना एवं पूर्व प्रबंधों के अचानक कर दिया गया। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इन दंगों में 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए। विभाजन का यह काला अध्याय विस्थापित हुए, भगाए गए, मारे गए और भटककर मौत को गले लगानेवाली मनुष्यता के खून के छींटों से भरा हुआ है। यह इतिहास के चेहरे पर पुती वह कालिमा है, जिसे कभी साफ नहीं किया जा सकेगा। इसका दंश इस पीढ़ी ने झेला, पर उसका दर्द और मार वहाँ से विस्थापित हुए परिवार आज भी झेल रहे हैं। विभाजन का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि इसके लिए उत्तरदायी नेता अपने इस अमानवीय कुकृत्य के लिए कभी शर्मिंदा नहीं हुए, बल्कि विभीषिका को “रक्तहीन क्रांति' कहकर स्वयं को गौरवान्वित करते रहे । इन्हीं खून के धब्बों की लोमहर्षक घटनाओं पर उकेरा गया है यह अत्यंत मर्मस्पर्शी एवं संवेदनशील उपन्यास--'विभाजन की विभीषिका ।
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भारत का विभाजन विश्व के सबसे बड़े नरसंहार के रूप में हिंदुओं और सिखों की महिलाओं की छाती पर हुआ। इसमें 30 लाख से अधिक लोगों की नृशंस हत्या हुई। विभाजन के समय हिंदू और सिख पुरुषों को एक लाइन में खड़ा करके पाकिस्तानी सेना ने गोलियों से भून दिया।
एक लाख से अधिक महिलाओं का अपहरण व बलात्कार करके अधिकांश को मौत के घाट उतार दिया गया | उनकी संपत्ति को हड़प लिया अथवा उसे आग के हवाले कर दिया । विश्व में यह एकमात्र ऐसा उदाहरण है, जब करोड़ों की जनसंख्या का विनिमय बिना किसी योजना एवं पूर्व प्रबंधों के अचानक कर दिया गया।
पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इन दंगों में 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए। विभाजन का यह काला अध्याय विस्थापित हुए, भगाए गए, मारे गए और भटककर मौत को गले लगानेवाली मनुष्यता के खून के छींटों से भरा हुआ है। यह इतिहास के चेहरे पर पुती वह कालिमा है, जिसे कभी साफ नहीं किया जा सकेगा। इसका दंश इस पीढ़ी ने झेला, पर उसका दर्द और मार वहाँ से विस्थापित हुए परिवार आज भी झेल रहे हैं।
विभाजन का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि इसके लिए उत्तरदायी नेता अपने इस अमानवीय कुकृत्य के लिए कभी शर्मिंदा नहीं हुए, बल्कि विभीषिका को “रक्तहीन क्रांति' कहकर स्वयं को गौरवान्वित करते रहे । इन्हीं खून के धब्बों की लोमहर्षक घटनाओं पर उकेरा गया है यह अत्यंत मर्मस्पर्शी एवं संवेदनशील उपन्यास--'विभाजन की विभीषिका ।
Book Details
-
ISBN9789355212627
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
मोहनदास करमचन्द गांधी ऐसे जननेता हैं जो वैश्विक उपस्थिति रखते हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के ऐसे नायक हैं जिन्होंने इसे जनता का आन्दोलन बना दिया। औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध करते हुए उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपनी लड़ाई का केन्द्रीय शिल्प बनाया। उन्होंने साध्य ही नहीं साधन की भी पवित्रता की बात की, बेलगाम उपभोग की संस्कृति का विरोध किया। सत्याग्रही के रूप में विरोधी के प्रति भी किसी तरह की कटुता न रखने की बात कही। अपने समय के शीर्ष लेखकों, चिन्तकों और कलाकारों पर गांधी के विचारों का गहरा असर रहा। वे लोगों से निरन्तर संवादरत रहे और अपने विचारों को मजबूती से रखते रहे। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए इस कठिन समकाल से जूझने की अनेक राहें रोशन होंगी।
Peechhe Firat Kahat Kabir-Kabir
- Author Name:
Mujeeb Rizvi
- Book Type:

- Description: तुलसी के राम में अनीस के हुसैन की झलक देखनी हो, कबीर में क़ुरान की आयतों का असर समझना हो, अनीस के मर्सियों में संस्कृत शेरियात की तलाश हो, तुलसी और जायसी का मुवाज़ना करना हो, हसरत मोहानी के कन्हैया को भगतों की राधा में खोजना हो, फ़िराक़ गोरखपुरी में ब्रज और अवधी कविता के रूपकों और रसों को चिन्हित करना हो, अमीर ख़ुसरो और बारहमासा को एक दूसरे के तनाज़ुर में पहचानना हो, ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब के ज़रिए जामिया के तालीमी कारनामों को उजागर करना हो, या भक्ति और सूफ़ी परम्पराओं पर अज़–सरे नौ रौशनी डालनी हो, इस किताब में मुजीब रिज़वी उर्दू-हिंदी साहित्य को नए पैमानों और नए कीर्तिमानों से स्थापित और विश्लेषित करते नज़र आते हैं। एक साथ हिंदी और उर्दू के आधुनिक और मध्ययुगीन विचारों, संस्कृत और फ़ारसी सिद्धांतों, सूफ़ी और भक्ति भावनाओं को सम्मिश्रित करने वाले वे शायद आख़िरी ऐसे विद्वान थे। इसीलिए वे जायसी में रूमी को और कबीर में क़ुरान और हाफ़िज़ को खोज निकालते हैं। तुलसी में फ़ारसी सूफ़ी अल्फ़ाज़ को ढूँढ़ते हैं और हिंदी/उर्दू की संरचना में फ़ारसियत की भूमिका को इंगित कर सकते हैं। हिंदुस्तान पर मुसलमानों के असर और मुसलमानों पर हिंदुस्तान जन्नतनिशान के प्रभावों को शायद इसके पहले इतने बृहद परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य में नहीं देखा समझा गया। यह किताब भारतीय साहित्य और हिंद-इस्लामी संस्कृति को एक नए तर्ज़ और नए अंदाज़ से हमारे सामने रखते हुए हिंदुस्तानियत की एक नई और विलक्षण परिभाषा से हमें रूबरू कराती है।
Soordas 'Brajeshwar Varma'
- Author Name:
Brajeshwar Verma
- Book Type:

- Description: प्रो. वर्मा द्वारा प्रणीत ‘सूरदास’ का यह संस्करण मध्ययुग के स्वर्णकाल के अन्यतम नायक सूरदास का प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन है। विगत कई वर्षों से यह ग्रन्थ सूर के अध्येताओं, विद्वानों और विद्यार्थियों के लिए प्रकाश स्तम्भ रहा है। इस ग्रन्थ से प्रेरणा लेकर सूर सम्बन्धी अनेक शोध और आलोचना ग्रन्थ लिखे गए हैं। सूरदास के जीवन और कृतित्व सम्बन्धी जो स्थापनाएँ प्रो. वर्मा ने इस ग्रन्थ में प्रतिपादित की हैं, उनकी प्रामाणिकता आज भी अक्षुण्ण हैं। प्रो. वर्मा की इस कृति की ख्याति देश और विदेश में समान रूप से है।
Bilhana: Makers of Indian Literature
- Author Name:
P N Kawthekar
- Book Type:

- Description: A monograph in English by P.N. Kawthekar on the 11th century Kashmiri poet.
Sundar Ke Swapn
- Author Name:
Dalpat Singh Rajpurohit
- Book Type:

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Description:
सुन्दरदास आरम्भिक आधुनिक हिन्दी के ऐसे कवि थे जिन्होंने संस्कृत के सुभाषितों, वेदान्त की दार्शनिक उक्तियों, ब्रह्म-वाक्यों और उत्तर भारत में प्रचलित विभिन्न बोलियों की कहावतों और मुहावरों का व्यापक प्रयोग अपनी कविता में किया। संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा के साथ-साथ उनकी पकड़ ब्रजभाषा की रीति-कविता पर भी साफ़ दिखाई देती है लेकिन उसका प्रयोग उन्होंने अलग ढंग से किया।
उनके लिए आत्मानुभव किसी भी दर्शन से अधिक महत्त्वपूर्ण था। उनकी कविता विश्वव्यापी ब्रह्म-सत्य की खोज की कविता है, और उनकी भक्ति एक सतत यात्रा।
उनकी कविता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उसमें मारवाड़ क्षेत्र की वणिक संस्कृति के अत्यन्त सजीव बिम्ब हमें मिलते हैं। अकसर अकाल की ज़द में रहने वाले और बंजर मरुस्थली क्षेत्र को उन्होंने आध्यात्मिक आधार पर एक नवीन और विशिष्ट अर्थ दिया। प्रमाण उपलब्ध हैं कि उनकी कविता की पहुँच संत समुदाय से बाहर व्यापारी और दरबारी वर्ग तक थी। जयपुर के सिटी पैलेस म्यूज़ियम में संरक्षित उनकी एक पांडुलिपि पर मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मुहर भी मिलती है।
यह पुस्तक दादूपंथ के इतिहास और उसके सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ सुन्दरदास के व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तृत और विचारोत्तेजक विवेचन करती है। उनके शिल्प, काव्य-दृष्टि और आध्यात्मिक विशिष्टताओं के विश्लेषण के अलावा इसमें भक्ति के लोकवृत्त और हिन्दी की आरम्भिक तथा अपनी आधुनिकता के तत्त्वों को भी रेखांकित किया गया है।
Aaj Ki Kavita
- Author Name:
Vinay Vishwas
- Book Type:

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'आज की कविता’ आलोचना के नए दर खोलती है और समकालीन कविता के तज़ुर्बों को मुख़्तलिफ़ ढंग से विश्लेषित करती है। समकालीन कविता के लिए, जिस विनम्र और बाशऊर नज़रिए की ज़रूरत थी, वो यहाँ मौजूद है। पूरी किताब विनम्र लेकिन सचेत नज़रिए का प्रतिफल है। ...इस आलोचना-पुस्तक में कविता का होना, जीवन के होने जैसा है। विनय विश्वास इतने शालीन और एकाग्र ढंग से हिन्दी-उर्दू कविता को ज़िन्दगी के तत्त्वों से जोड़ते चलते हैं कि आलोचना-पुस्तक सिर्फ़ विनय की नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी के तमाम कवियों और उर्दू के शायरों की हो जाती है। ...आलोचना में जो उखाड़-पछाड़ (और गुटबाज़ी) चल रही है, यह आलोचना उससे कोसों दूर है। यहाँ मक़सद, बड़ी दयानतदारी के साथ समकालीन कविता को परखना है। उसकी सामाजिकता को पहचानना है। सच मायने में 'आज की कविता’ महज़ आलोचना का नहीं, बल्कि मौजूदा कविता का पर्यावरण रचती है। यही इस आलोचना की विशेषता है और मौलिकता भी। ...इस आलोचना में लोकतांत्रिक छवियाँ हैं। कमज़र्फ़ आग्रह, फ़रेब और छल का नकार है। ...विनय विश्वास ने कविताओं को अपनी आलोचना-पुस्तक में 'भर’ नहीं दिया, उन्हें माकूल और मुस्तकिल स्थान दिया है। संवेदनशील आलोचक यही करते हैं। ...विनय विश्वास के सरोकार स्पष्ट हैं। वो आज की कविता में जीवन की लय तलाश करते हैं। यहाँ एक सादगी है। यही आलोचकीय शक्ति भी है। वो इसी शक्ति के सहारे, समकालीन कविता के जिस्म तक नहीं बल्कि उसकी आत्मा तक पहुँचते हैं।
—ज्ञान प्रकाश विवेक, ‘वागर्थ’, अक्तूबर, 2009
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