Samkalin Hindi Upanyas : Samay Se Sakshatkar
Author:
Dr. Alangvam VijayalaxmiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Available
हिन्दी उपन्यास और साठोत्तरी भारतीय जीवन–सन्दर्भ विशिष्ट संवाद–सूत्रों के सहारे आपस में जुड़े हुए हैं। इस जुड़ाव का विस्तार जिन कृतियों में ख़ास तौर पर विद्यमान हैं, उनमें ‘राग दरबारी’, ‘महाभोज’ और ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ की पहचान सबसे अलग है। साठोत्तरी भारत का कड़वा और नंगा सच इन रचनाओं की विषयवस्तु का जनक है। अपने देश और समाज के साथ–साथ अपने समय की परख करने के लिए इन उपन्यासों तथा इनके जैसी आँच रखनेवाले कुछेक अन्य उपन्यासों का अध्ययन विश्लेषण अनिवार्य है। <br>डॉ. ई. विजयलक्ष्मी ने अपनी इस समीक्षा–पुस्तक में मुख्यत: दस साठोत्तरी उपन्यासों को अध्ययन का आधार बनाया है और उनके सहारे अपने समय से साक्षात्कार का प्रयास किया है। उनके द्वारा चुने गए सभी उपन्यास महत्त्वपूर्ण लेखकों के हैं तथा लम्बे समय से चर्चा में रहे हैं। लेखिका ने उनके विश्लेषण व मूल्यांकन में उपलब्ध सामग्री का सदुपयोग किया है और अपने निजी अध्ययन से प्राप्त नवीन निष्कर्ष पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है। डॉ. विजयलक्ष्मी का यह समीक्षा–ग्रन्थ अध्ययन की स्वस्थ एवं तटस्थ परम्परा की पहचान कराने वाला है।
ISBN: 9788183610636
Pages: 246
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘साहित्य और समाज’ समर्थ साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता और प्रखर चिन्तक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के साहित्य की विभिन्न विधाओं और समस्याओं को समर्पित चिन्तनपूर्ण अठारह निबन्धों का संकलन है।
यह पुस्तक यहाँ एक तरफ़—‘परम्परा और भारतीय साहित्य’, ‘साहित्य पर विज्ञान का प्रभाव’, ‘साहित्य में आधुनिकता’, ‘समाजवाद के अन्दर साहित्य’, ‘साहित्य का नूतन ध्येय’, ‘कलाकार की सफलता’, ‘भविष्य के लिए लिखने की बात’, ‘लेखकों का कार्य-शिविर’, ‘हिन्दी साहित्य पर गांधी जी का प्रभाव’, ‘पाकिस्तान के पीछे साहित्य की प्रेरणा’, ‘श्री अरविन्द की साहित्यिक मान्यताएँ’, ‘जार्ज रसल का साहित्य-चिन्तन’ आदि निबन्धों द्वारा समाज और साहित्य पर प्रकाश डालती है तो दूसरी तरफ़ ‘अर्धनारीश्वर’, ‘कला’, ‘धर्म और विज्ञान’, ‘आउट-साइडर’, ‘रवीन्द्रनाथ की राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता’, ‘क्या रवीन्द्रनाथ अभारतीय हैं?’, ‘महात्मा टॉलस्टॉय’ जैसे विषयों पर दिनकर जी के गम्भीर चिन्तन को भी हमारे सम्मुख लाती है।
पठनीय और मननीय निबन्धों से सुसज्जित यह पुस्तक राष्ट्रकवि दिनकर के चिन्तक स्वरूप को उद्घाटित करनेवाली एक श्रेष्ठ बौद्धिक कृति है।
Aalok Parv
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ियाँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।
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