Aalochana Ka Stree Paksha : Paddhati, Parampara Aur Paath
Author:
SujataPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 319.2
₹
399
Available
हिन्दी कविता और आलोचना की दुनिया लम्बे अरसे से ‘मुख्यधारा’ के इकहरे आख्यान से संचालित होती रही है, वह भी सवर्ण पुरुष-दृष्टि से। शिक्षा और संसाधनों पर उसका वर्चस्व साहित्य और कला को भी अपने ढंग से अनुकूलित करता रहा है। स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूहों की अभिव्यक्तियाँ इसी आधार पर या तो विस्मृत कर दी गईं या हाशिये पर डाल दी गईं।</p>
<p><em>आलोचना का स्त्री पक्ष</em> सुजाता को अस्मिता-विमर्श की संश्लिष्ट धारा की प्रतिनिधि के रूप में सामने लाती है। वह गहन शोध द्वारा इतिहास के विस्मृत पन्नों से दमित अभिव्यक्तियों की निशानदेही करती हैं और समकालीन सृजन की बारीक परख भी। वह सबसे पहले हिन्दी कविता की मुख्यधारा की जड़ता को उजागर करती हैं, फिर लोक और परम्परा में स्त्री-कविता के निशान ढूँढ़ते हुए उसे नाकाफ़ी पारम्परिक कैननों में रखे जाने पर सवाल उठाती हैं और उसे परखने की स्त्रीवादी आलोचना-दृष्टि प्रस्तावित करती हैं। यह किताब एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह है जो हिन्दी आलोचना में एक ज़रूरी कैनन–स्त्रीवाद–को जोड़ती हुई उसे विमर्श के केन्द्र में ले आती है।</p>
<p>जहाँ वैश्विक स्तर पर हेलेन सिक्सू, लूस इरिगिरे, जूलिया क्रिस्टेवा जैसी आलोचकों ने स्त्री-भाषा को लेकर महत्त्वपूर्ण काम किए हैं, वहीं हिन्दी में अभी इस पर कुछेक अकादमिक काम के अलावा कोई ठोस बहस दिखाई नहीं देती। ऐसे में यह किताब ख़ासकर हिन्दी कविता और आम तौर पर भारतीय साहित्य में स्त्री-भाषा की समझ विकसित करने के लिए एक आवश्यक सैद्धान्तिक उपकरण उपलब्ध कराती है। साथ ही ‘आस्वाद की लैंगिक निर्मिति’ की सैद्धान्तिकी भी प्रस्तावित करती है।</p>
<p>पुस्तक का विशेष खंड वह है जिसमें सुजाता कुछ प्रमुख स्त्री कवियों के लेखन का विश्लेषण करते हुए स्त्रीवादी आलोचना की पद्धति भी प्रस्तावित करती हैं।</p>
<p>यह पुस्तक आलोचना की कथित मुख्यधारा को चुनौती भी है और वैकल्पिक, सर्वसमावेशी पद्धति का प्रस्ताव भी।
ISBN: 9789390971299
Pages: 350
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: तर नेहरू-युग में जैसे-जैसे भारतीय लोकतंत्र जनहितों से निरपेक्ष होता गया है, वैसे-वैसे साहित्य मुखर रूप से लोकतंत्र के भीतर काम कर रही जन-विरोधी शक्तियों के कठोर आलोचक के रूप में सामने आया है। इसी क्रम में मुक्तिबोध की रचनाएँ और विचार हिन्दी में केन्द्रीय होते गए हैं। पारम्परिक रसवादी और रोमैंटिक आग्रहों के सामानान्तर आधुनिक साहित्य ने विचार और बौद्धिकता को केन्द्रीय महत्त्व दिया है। इस संघर्ष में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक प्रयासों की महती भूमिका है। प्रो. सेवाराम त्रिपाठी की पुस्तक ‘मुक्तिबोध : सर्जक और विचारक', मुक्तिबोध का विवेचन-मूल्यांकन समग्रता से करती है। मुक्तिबोध की रचनात्मकता कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना और पत्रकारिता तक फैली हुई है। इस पुस्तक का महत्त्व यह है कि वह मुक्तिबोध का अध्ययन करने के लिए सभी विधाओं को समेटती है। स्वाभाविक ही है कि ऐसे में लेखक ने मुक्तिबोध के सभी पक्षों पर विस्तृत विचार किया है। सेवाराम त्रिपाठी ने प्रस्तुत पुस्तक में मुक्तिबोध की सर्जना में विचारधारा की भूमिका की पड़ताल की है। मुक्तिबोध हिन्दी रचनाशीलता में एक मुकम्मल और सुसंगत मार्क्सवादी थे। इसका गहरा प्रभाव विशेष रूप से कविता और आलोचना जैसी विधाओं पर पड़ा है। यह प्रभाव सामान्य न होकर जटिल है। लेखक ने पुस्तक में मुक्तिबोध में उपस्थित रचना और विचारधारा की अन्तःक्रिया पर गहन और सूक्ष्म विवेचन किया है। प्रस्तुत संस्करण पुस्तक का दूसरा संस्करण है। इसमें ‘मुक्तिबोध : पुनश्च' शीर्षक से चार नए आलेख जोड़ दिए गए हैं। इन आलेखों में मूल अध्यायों में छूट गई कुछ महत्त्वपूर्ण बातें स्थान पा सकी हैं। पुस्तक न सिर्फ़ गम्भीर अध्येताओं की ज़रूरतों को पूरा करती है, बल्कि सामान्य विद्यार्थियों के लिए भी उपादेय ह
Akhil Bharatiya Prashasnik Kosh
- Author Name:
Bhola Nath Tiwari +2
- Book Type:

- Description: आज हिंदी की स्थिति लगभग वही है। स्वतंत्रता के बाद जो शब्दावली बनी है, बन रही है उससे हिंदी की सामर्थ्य स्वयंसिद्ध हो गई है। हिंदी का विस्तृत क्षेत्र जहाँ लोकभाषाओं से हिंदी को शब्दावली प्रदान कर रहा है वहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक तथा प्रशासक भी हिंदी को नई अर्थ-व्यंजनाएँ प्रदान कर रहे है। समय ही इस शब्दावली को मानक रूप प्रदान करेगा जिससे मानक शब्दावली में निश्चितार्थता एवं बोधागम्यता बढ़ती जाएगी। हिंदी भाषा-भाषी राज्यों की राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता मिल चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली-चंडीगढ़ आदि ने अपना सभी सरकारी कामकाज हिंदी में करना प्रारंभ कर दिया है। इसके साथ ही पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात की सरकारों ने भी हिंदी को केंद्र के साथ पत्र-व्यवहार के लिए संपर्क भार्षा के रूप में स्वीकार कर लिया है। सभी हिंदी भाषी राज्यों की जनता द्वारा अपने प्रशासन संबंधी कार्य को हिंदी में ही करने से हिंदी का महत्त्व स्वयं बढ़ता जा रहा है।
Hazariprasad Dwivedi : Samgra Punravlokan
- Author Name:
Chauthiram Yadav
- Book Type:

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Description:
पाँच अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक हजारीप्रसाद द्विवेदी के साहित्य, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना, इतिहास, उनके व्यक्तित्व और चिन्तन के विविध आयामों को समग्रता में पेश करती है। स्वयं लेखक के अनुसार इस कृति के केन्द्र में रचना, आलोचना और मूल्यांकन से जुड़े वे अनिवार्य प्रश्न हैं जिनका अधिक विश्वसनीय हल, द्विवेदी जी के साहित्य से गुज़रकर पाया जा सकता है। लेखक पूरी ज़िम्मेदारी के साथ आचार्य द्विवेदी और आचार्य शुक्ल की स्पष्टत: भिन्न प्राथमिकताओं, दृष्टियों, विश्वासों और उपकरणों की व्याख्या करते हैं। यहाँ लेखक की दृष्टि स्वाभाविक रूप से दोनों आचार्यों की दृष्टिगत समानता के साथ-साथ उनके अन्तर्विरोधों और उनकी सीमाओं पर भी जाती है।
लेखक के सामने दूसरी चुनौती वे प्रगतिशील आलोचक हैं जो अपने दृष्टिरोध के कारण द्विवेदी जी को लेकर लगातार दुविधा और असुविधा में पड़े हुए हैं। यही कारण है कि कहीं-कहीं द्विवेदी जी के निष्कर्ष वस्तुवादी आलोचकों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा ठोस और प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। इन मुद्दों को पूरी सावधानी से देखता हुआ लेखक अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि आचार्य द्विवेदी के चिन्तन का मुख्य आयाम समाजवादी मानवतावाद है।
Nagarjun : dabi doob ka roopak
- Author Name:
Kamlanand Jha
- Book Type:

- Description: आधुनिक हिन्दी कविता में निराला की पीढ़ी के बाद के प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन सर्वाधिक लोकप्रिय रहे। उनकी लोकप्रियता ने हिन्दी के प्रबुद्ध जन में उन्हें परिचित तो बनाया लेकिन उनका अतिपरिचय ही उनकी गम्भीर विवेचना में बाधा बन गया। बहुभाषाविद नागार्जुन बौद्ध दर्शन की सर्वोच्च उपाधि से अलंकृत थे। उनकी रचनात्मकता इतनी प्रबल है कि उनका चिंतक अलग से नजर ही नहीं आता। कवि के बतौर वे प्रबल विद्रोही थे इसलिए अपनी कविता के लायक हिन्दी पाठक का भावबोध निर्मित करने में उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ा। यात्री उनका उपनाम ही नहीं था। देश और समाज के प्रत्यक्ष अनुभव से उनका लेखन विपुल समृद्ध हुआ। कमलानंद झा नागार्जुन की देसी संस्कृति के जानकार हैं। उनके विश्लेषण में इस जानकारी ने अतिरिक्त रोचकता पैदा की है। भाषा के समान ही नागार्जुन के लेखन की विधागत विविधता भी इसमें मुखर हुई है। नागार्जुन के भावबोध को लोकानुरागी प्रतिहिंसा कहकर लेखक ने उनकी विस्फोटक रचनात्मकता का असली स्रोत समझने का प्रयास किया है। नागार्जुन की रचना में अंतर्निहित विचार के साथ उसके सौंदर्य को उद्घाटित करना इस किताब का मुख्य सरोकार है। यथास्थिति की निर्मम और प्रचंड आलोचना साहित्य का अपना धर्म है। इस धर्म का पालन करने में साहित्य कलात्मक मार्ग अपनाता है। नागार्जुन के साहित्य के इस मार्ग की परख का यह गम्भीर प्रयास अत्यंत समयानुकूल है। नागार्जुन की सहजता का अनुगमन भी इस किताब में दिखायी देता है। —गोपाल प्रधान
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