Samvaad Anayas
(0)
Author:
Govind Mishra, Ballabh SidharthPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
60
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इस पुस्तक के रचनाक्रम के बारे में सुपरिचित कथाकार गोविन्द मिश्र के इन शब्दों को उद्धृत किया जाना चाहिए—'ऐसा शायद हमेशा रहा होगा जब एक समय में लिख रहे दो साहित्यकार पारस्परिक संवाद में लम्बे समय के लिए रहे हों—उनकी हर रचना में पारस्परिक साझेदारी रही हो। मुंशी अजमेरी और मैथिलीशरण गुप्त, गुलेरी जी और रामचन्द्र शुक्ल आदि में ऐसा कुछ सुना जाता है। ये वे दिन थे जब चीज़ें अपेक्षाकृत साफ़ थीं, आस्थाएँ भी सुनिश्चित थीं। आज जैसा आस्था का संकट तब नहीं था। इसलिए तब रचनाशीलता में साझेदारी फ़ॉर्म, भाषा, छन्द...इन तक सीमित रहती होगी। जो हमारा समय है, उसमें संवाद, साझेदारी रचना के पहले की...ये ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं...कि हम एक-दूसरे को भटकने से बचाए रख सकें, जो साहित्य में संघर्ष का रास्ता है, उसी पर चलने की अपनी ज़िद बनाए रख सकें। जो तकलीफ़ें, विषाद, संत्रास उपजे, उन्हें आपस में बाँटते हुए चल सकें—चलने की गरिमा महसूस करते हुए। बल्लभ और मेरा संवाद जो इधर अनायास हुआ, वह इसी कशिश को लेकर हुआ है।’</p> <p>एक समय और एक ही विधा में लिख रहे दो संवेदनशील साहित्यकारों—गोविन्द मिश्र और बल्लभ सिद्धार्थ—के इस संवाद में प्रेरणा एक-दूसरे को तर्क से काटने की नहीं, बल्कि दूसरे की बात को कुरेदने और विस्तार करने की है। यह संवाद उन सभी सवालों से जूझता है, जिनसे आज का कोई भी रचनाकार किनारा नहीं कर सकता—दुःख, संत्रास, जीवन, संसार, आज का समय, लेखकीय कर्म, अध्यात्म और धर्म, समाज या व्यवस्था और लेखक का विरोध, उस विरोध का स्वरूप, साहित्य और कला की पहचान, कलाकार की मृत्यु...और, और भी जाने कितने सवाल। इन बड़े सवालों की तह में हमें दो लेखकों की कशमकश की झलक भी मिलती है। अगर लेखक की कार्यशाला जैसी कोई चीज़ हो सकती है तो यहाँ वह भी है।</p> <p>संक्षेप में कहा जाए तो हिन्दी में अपनी तरह की यह पहली और दुर्लभ पुस्तक है।</p> <p>
Read moreAbout the Book
इस पुस्तक के रचनाक्रम के बारे में सुपरिचित कथाकार गोविन्द मिश्र के इन शब्दों को उद्धृत किया जाना चाहिए—'ऐसा शायद हमेशा रहा होगा जब एक समय में लिख रहे दो साहित्यकार पारस्परिक संवाद में लम्बे समय के लिए रहे हों—उनकी हर रचना में पारस्परिक साझेदारी रही हो। मुंशी अजमेरी और मैथिलीशरण गुप्त, गुलेरी जी और रामचन्द्र शुक्ल आदि में ऐसा कुछ सुना जाता है। ये वे दिन थे जब चीज़ें अपेक्षाकृत साफ़ थीं, आस्थाएँ भी सुनिश्चित थीं। आज जैसा आस्था का संकट तब नहीं था। इसलिए तब रचनाशीलता में साझेदारी फ़ॉर्म, भाषा, छन्द...इन तक सीमित रहती होगी। जो हमारा समय है, उसमें संवाद, साझेदारी रचना के पहले की...ये ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं...कि हम एक-दूसरे को भटकने से बचाए रख सकें, जो साहित्य में संघर्ष का रास्ता है, उसी पर चलने की अपनी ज़िद बनाए रख सकें। जो तकलीफ़ें, विषाद, संत्रास उपजे, उन्हें आपस में बाँटते हुए चल सकें—चलने की गरिमा महसूस करते हुए। बल्लभ और मेरा संवाद जो इधर अनायास हुआ, वह इसी कशिश को लेकर हुआ है।’</p>
<p>एक समय और एक ही विधा में लिख रहे दो संवेदनशील साहित्यकारों—गोविन्द मिश्र और बल्लभ सिद्धार्थ—के इस संवाद में प्रेरणा एक-दूसरे को तर्क से काटने की नहीं, बल्कि दूसरे की बात को कुरेदने और विस्तार करने की है। यह संवाद उन सभी सवालों से जूझता है, जिनसे आज का कोई भी रचनाकार किनारा नहीं कर सकता—दुःख, संत्रास, जीवन, संसार, आज का समय, लेखकीय कर्म, अध्यात्म और धर्म, समाज या व्यवस्था और लेखक का विरोध, उस विरोध का स्वरूप, साहित्य और कला की पहचान, कलाकार की मृत्यु...और, और भी जाने कितने सवाल। इन बड़े सवालों की तह में हमें दो लेखकों की कशमकश की झलक भी मिलती है। अगर लेखक की कार्यशाला जैसी कोई चीज़ हो सकती है तो यहाँ वह भी है।</p>
<p>संक्षेप में कहा जाए तो हिन्दी में अपनी तरह की यह पहली और दुर्लभ पुस्तक है।</p>
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Book Details
-
ISBN9788171191239
-
Pages178
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बुंदेलखंड का जन्म से मरण तक कोई ऐसा पहलू नहीं है जो इस उपन्यास में न आया हो और सो भी ‘फर्स्ट हैंड’। इस उपन्यास के कई गुण हैं मगर सबसे बड़ा गुण है, गोविन्द मिश्र के बयान का अन्दाज जो बातों को शुरू से अन्त तक कहानी बनाए रखता है। यह पुस्तक हमारे उपन्यास साहित्य में एक नक्षत्र की तरह चमकती रहेगी।
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छायावाद की यशस्वी रचनाकार महादेवी वर्मा का लेखन किसी न किसी रूप में पाठकों व आलोचकों को आन्दोलित करता आया है। कभी उनकी रचनाओं में उनके जीवन के बिखरे सूत्र रेखांकित किए जाते हैं तो कभी उनके जीवन में रचनाओं के स्रोत खोजे जाते हैं। महादेवी द्वारा लिखित प्रत्येक शब्द स्वयं को ध्यान से पढ़े जाने का आग्रह करता है। ‘सात भूमिकाएँ’ में ‘रश्मि’, ‘सांध्यगीत’, ‘आधुनिक कवि’, ‘दीपशिखा’, ‘बंग–दर्शन’, ‘सप्तपर्णा’ एवं ‘हिमालय’ कविता–संग्रहों की भूमिकाएँ हैं। महादेवी वर्मा लिखित इन भूमिकाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। ये भूमिकाएँ उनकी तत्कालीन मन:स्थिति को प्रकट करने के साथ उनके समग्र लेखन पर एक ‘अन्त:साक्ष्य’ की भाँति हैं। ‘सात भूमिकाओं’ के सम्पादक दूधनाथ सिंह का सम्पादकीय ‘छायावाद : व्यथा का सवेरा’ अत्यन्त विचारोत्तेजक है। अपनी विशिष्ट ‘तर्कसंगत पद्धति’ से दूधनाथ सिंह ने महादेवी के रचनाकर्म को विवेचित किया है—‘उनके वाक्य स्पष्ट, पारदर्शी व निर्भ्रान्त हैं, ‘महादेवी की आलोचनाएँ शब्द–अलंकृति अधिक हैं, आलोचनाएँ कम। उनका सारा वैचारिक गद्य–लेखन लगभग ऐसा ही है। उनमें तर्क और विश्लेषण का अभाव है। अपनी हर अगली बात के लिए महादेवी तर्क की जगह कोई प्रतीक–बिम्ब ढूँढ़ने लगती हैं।’
दूधनाथ सिंह के सम्पादकीय के प्रकाश में महादेवी की इन सात भूमिकाओं को पढ़ना एक आलोचनात्मक अनुभव है। तब और भी जब महादेवी के चुटीले ‘सुरक्षात्मक वाक्य’ उनकी प्रत्येक भूमिका में हैं। ‘रश्मि’ संग्रह की ‘अपनी बात’ का पहला ही वाक्य, ‘अपने विषय में कुछ कहना प्राय: बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि अपने दोष देखना अपने आपको अप्रिय लगता है और इनको अनदेखा कर जाना औरों को...।’ एक संग्रहणीय पुस्तक।
Kavya Bhasha Par Teen Nibandh
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
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काव्य-भाषा सम्बन्धी चिन्तन समकालीन आलोचना के केन्द्र में आ गया है। हिन्दी में, इस विषय पर मौलिक दृष्टि से लिखी गई पुस्तकें बहुत कम हैं। प्रख्यात आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के आलोचनात्मक चिन्तन का प्रमुख प्रतिमान काव्य-भाषा रही है। इस पुस्तक में उन्हीं के लिखे हुए तीन निबन्ध संकलित हैं जिनकी हिन्दी आलोचना में प्रशंसा होती रही है।
इस विषय पर इन निबन्धों का ऐतिहासिक और वैचारिक महत्त्व है।
Meera Aur Meera
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘मीरा और मीरा’ छायावाद की मूर्तिमान गरिमा महीयसी महादेवी वर्मा के चार व्याख्यानों का संग्रह है। महादेवी जी ने ये व्याख्यान जयपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की राजस्थान शाखा के निमंत्रण पर दिए थे।
इन चार व्याख्यानों के शीर्षक हैं–मीरा का युग, मीरा की साधना, मीरा के गीत और मीरा का विद्रोह। इनमें महादेवी ने मध्यकालीन स्त्री की स्थिति का विशेष सन्दर्भ लेकर भक्ति, मुक्ति, आत्मनिर्णय, विद्रोह और निजपथ-निर्माण आदि को विश्लेषित किया है।
‘मीरा और मीरा’ को प्रकाशित करते हुए हमें इसलिए भी विशेष प्रसन्नता है कि यह समय अस्मिता-विमर्श का है। स्त्री-विमर्श के ‘समय विशेष’ में स्त्री-अस्मिता के दो शिखर व्यक्तित्वों का ‘रचनात्मक संवाद’ महत्त्वपूर्ण है। इन दो दीपशिखाओं के आलोक में परम्परा और आधुनिकता के जाने कितने निहितार्थ स्पष्ट होते हैं। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ की लेखिका ने ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ का गायन करने वाली रचनाकार के मन में प्रवेश किया है। यह दो समयों (मध्यकाल और आधुनिक युग) का संवाद भी है।
यह सोने पर सुहागा ही कहा जाएगा कि प्रस्तुत पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार व विमर्शकार अनामिका ने लिखी है। कहना न होगा कि यह लम्बी भूमिका एक मुकम्मल आलोचनात्मक आलेख है।
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