Nyay Ka Sangharsh
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न्याय की धारणा और समाज की व्यवस्था के समान रूखे विषय की विवेचना को भी रंजक बना देना इन लेखों की सार्थकता है। भाषा प्रवाह के ऊपर तैरते हुए विद्रूप की तह में सिद्धान्तों की शिलाएँ मौजूद हैं। मनोरंजन और विद्रूप का अभिप्राय रूखे और गम्भीर विषय को रोचक बना देना ही है। इन लेखों को पढ़कर आपके होंठों पर जो मुस्कराहट आएगी, वह आत्म-विस्मृत और आनन्दोल्लास की न होकर क्षोभ, परिताप और करुणा की होगी।</p> <p>इन लेखों में लेखक ने आत्म-विस्मृत समाज को क़लम की नोक से गुदगुदाकर जगाने की चेष्टा की है और समाज को करवट बदलते न देखकर कई जगह उसने क़लम की नोक समाज के शरीर में गड़ा दी है।</p> <p>—नरेन्द्र देव
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न्याय की धारणा और समाज की व्यवस्था के समान रूखे विषय की विवेचना को भी रंजक बना देना इन लेखों की सार्थकता है। भाषा प्रवाह के ऊपर तैरते हुए विद्रूप की तह में सिद्धान्तों की शिलाएँ मौजूद हैं। मनोरंजन और विद्रूप का अभिप्राय रूखे और गम्भीर विषय को रोचक बना देना ही है। इन लेखों को पढ़कर आपके होंठों पर जो मुस्कराहट आएगी, वह आत्म-विस्मृत और आनन्दोल्लास की न होकर क्षोभ, परिताप और करुणा की होगी।</p>
<p>इन लेखों में लेखक ने आत्म-विस्मृत समाज को क़लम की नोक से गुदगुदाकर जगाने की चेष्टा की है और समाज को करवट बदलते न देखकर कई जगह उसने क़लम की नोक समाज के शरीर में गड़ा दी है।</p>
<p>—नरेन्द्र देव
Book Details
-
ISBN9788119996247
-
Pages91
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! 'अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है।
यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Jhootha Sach : Desh Ka Bhavishya : Vol. 2
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Yashpal
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भारत-पाकिस्तान विभाजन भारतीय राज्य के इतिहास का वह अध्याय है जो एक विराट त्रासदी के रूप में अनेक भारतीयों के मन पर आज भी जस-का-तस अंकित है। अपनी ज़मीनों-घरों से विस्थापित, असंख्य लोग जब नक़्शे में खींच दी गई एक रेखा के इधर और उधर की यात्रा पर निकल पड़े थे, यह न सिर्फ़ मनुष्य के जीवट की बल्कि भारतवर्ष के उन शाश्वत मूल्यों की भी परीक्षा थी जिनके दम पर सदियों से हमारी हस्ती मिटती नहीं थी।
यशपाल का यह कालजयी उपन्यास उसी ऐतिहासिक कालखंड का महाआख्यान है। स्वयं यशपाल के शब्दों में यह इतिहास नहीं है, ‘कथानक में कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ अथवा प्रसंग अवश्य हैं परन्तु सम्पूर्ण कथानक कल्पना के आधार पर उपन्यास है, इतिहास नहीं।’ अर्थात् यह उस ज़िन्दगी का आख्यान है जो अक्सर इतिहास के स्थूल ब्योरों में कहीं खो जाती है।
‘झूठा सच’ के इस दूसरे भाग ‘देश का भविष्य’ के केन्द्र में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की समस्याएँ और उनके सामने उपस्थित नए सांस्कृतिक, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट हैं। नई राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ लोग अपने साहस और जीवटता के बल पर जम जाते हैं, तो कुछ टूट भी जाते हैं।
Divya
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Yashpal
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मार्क्सवादी चिन्तक और वैचारिक प्रतिबद्धता को बुद्धि का सर्वश्रेष्ठ अनुशासन माननेवाले कथाकार यशपाल के सरोकारों में भारतीय सामाजिक संरचना में स्त्री की यातना और व्यक्तित्व का प्रश्न हमेशा प्रमुख रहा है।
‘दिव्या’ (1945) में यशपाल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में स्त्री की पीड़ा के सामाजिक कारणों की तलाश करते हैं। उनका मानना है कि ‘इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है।...अतीत में अपनी रचनात्मक सामर्थ्य और परिस्थितियों के सुलझाव और रचना के लिए निर्देश पाती हैं।’ ‘दिव्या’ में लेखक सागल के गणसमाज को केन्द्र में रखकर पृथुसेन, मारिश और दिव्या के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक अन्तर्विरोधों की गहन पड़ताल करता है। न तो वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित सामन्ती समाज ही स्त्री को सम्मान और सुरक्षा दे सकता है और न बौद्ध धर्म जो स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व को ही शंका की निगाह से देखता है।
अपनी प्रदत्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ‘दिव्या’ सामाजिक संरचना के मूल अन्तर्विरोधों को रेखांकित करते हुए अपनी तेजस्विता से परिवर्तन के लिए निर्णायक संघर्ष भी करती है। अपनी सन्तुलित सोच के साथ वह हमारे समकालीन नारी-विमर्श के लिहाज़ से भी एक विचारणीय प्रस्ताव लेकर आती है।
Dada Kamred
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Yashpal
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‘दादा कामरेड’...यह उपन्यास लेखक की पहली रचना थी जिसने हिन्दी में रोमांस और राजनीति के मिश्रण का आरम्भ किया। यह उपन्यास बांग्ला उपन्यास सम्राट शरत् बाबू के प्रमुख राजनैतिक उपन्यास ‘पथेरदावी’ द्वारा क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के सम्बन्ध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं का निराकरण करने के लिए लिखा गया था, परन्तु इतना ही नहीं यह श्री जैनेन्द्र की आदर्श नारी पुरुष की खिलौना ‘सुनीता’ का भी उत्तर है।
यशपाल के इस उपन्यास से चुटिया कर रूढ़िवाद के अन्ध अनुयायियों ने लेखक को क़त्ल की धमकी दी थी, परन्तु देश की प्रगतिशील जनता की रुचि के कारण ‘दादा कामरेड’ के न केवल हिन्दी में कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं बल्कि गुजराती, मराठी, सिन्धी और मलयालम में भी यह उपन्यास अनुवादित हो चुका है।
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