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Yashpal Ke Nibandh : Vol. 1-2

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भारत की स्वाधीनता के लिए प्राणों को हथेली पर रखकर चलनेवाले, चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह के साथी, क्रान्तिकारी यशपाल जी का शोषण-मुक्त समाज और निजी स्वामित्व के ख़ात्‍मे पर आजीवन अटल विश्वास रहा है। इस खंड में संकलित ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’, ‘रामराज्य की कथा’, ‘मार्क्सवाद’, ‘देखा सोचा समझा’ और ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में उनके इन विचारों की सतर्क और सजग झलक ही नहीं भारतीय समाज के भिन्न वर्गों और जातियों की गहरी समझ तथा दुनिया में हो रहे सामाजिक-आर्थिक और वैचारिक परिवर्तनों की ध्वनि-प्रतिध्वनि निरन्तर सुनाई देती है। ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ में शोषण में निरीहता, अहिंसा और दरिद्र नारायण की सेवा आदि सिद्धान्तों का मूल्यांकन करते हुए कहा गया है कि ‘गांधीवाद जनता की मुक्ति, सामन्तकालीन घरेलू उद्योग-धन्धों और स्वामी-सेवक के सम्बन्ध की पुन: स्थापना में समझता है जो इतिहास की क़ब्र में दफ़न हो चुकी हैं। मुर्दा व्यवस्थाएँ और आदर्श समाज को विकास की ओर ले जाने का काम नहीं कर सकते। उनका उपयोग, उन्हें समाप्त कर देनेवाले कारणों को समझने के लिए या उनकी शव-परीक्षा के लिए ही हो सकता है।’ ‘रामराज्य की कथा’ में गांधी जी की ‘रामराज्य’ की कल्पना और उसके व्यावहारिक रूप के अध्ययन के साथ ही साथ रामराज्य के समता, न्याय और अहिंसा जैसे मूल्यों के माध्यम से जनता के शोषण की व्याख्या की गई है। ‘मार्क्सवाद’ में सेंट साइमन, ओवेन आदि सन्त साम्यवादियों के विचारों के साथ मार्क्स के विचारों और सिद्धान्तों की व्याख्या की गई है तथा अन्य राजनैतिक सिद्धान्तों से उसके अन्तर को स्पष्ट किया गया है। ‘देखा सोचा समझा’ में नैनीताल, कुल्लूमनाली आदि यात्रा-वर्णनों के साथ-साथ समकालीन साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का विश्लेषण भी है। ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में व्यंगात्मक निबन्धों के माध्यम से भी हिंसा-अहिंसा आदि के साथ अपने समय को परिभाषित करने का प्रयत्न मार्क्सवाद की दृष्टि से किया गया है। यशपाल के इन निबन्धों में उनके युग के राजनैतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकारों से सम्बद्ध तेज़ बहसों और विवादों की झलक मिलती है। ये निबन्ध एक सर्जक की गहरी निष्ठा और व्यावहारिक समझ से विकसित हैं। दलित, शोषित और पीड़ित के प्रति गहरे लगाव के कारण वे गांधीवाद, मार्क्सवाद आदि सब कुछ को उन कारणों के परिवर्तन की दृष्टि से आँकते हैं जो ग़रीबी और शोषण के कारण हैं। इन निबन्धों में ऐतिहासिकता के साथ-साथ समकालीनता भी है। इन निबन्धों से यशपाल और उनके समय को समझने में मदद मिलती है। जो लोग इन्हें गांधीवाद और मार्क्सवाद की दृष्टि से पढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी आज के सन्दर्भ के कारण इनकी ताक़तों और कमज़ोरियों का पता चलेगा, क्योंकि इनमें प्रस्तुतीकरण ही नहीं, विश्लेषण है। इन सब में कसौटी शोषित वर्ग की भौतिक स्थितियों और उनके कारणों का बना रहना या बदलना ही है।

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भारत की स्वाधीनता के लिए प्राणों को हथेली पर रखकर चलनेवाले, चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह के साथी, क्रान्तिकारी यशपाल जी का शोषण-मुक्त समाज और निजी स्वामित्व के ख़ात्‍मे पर आजीवन अटल विश्वास रहा है। इस खंड में संकलित ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’, ‘रामराज्य की कथा’, ‘मार्क्सवाद’, ‘देखा सोचा समझा’ और ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में उनके इन विचारों की सतर्क और सजग झलक ही नहीं भारतीय समाज के भिन्न वर्गों और जातियों की गहरी समझ तथा दुनिया में हो रहे सामाजिक-आर्थिक और वैचारिक परिवर्तनों की ध्वनि-प्रतिध्वनि निरन्तर सुनाई देती है।

‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ में शोषण में निरीहता, अहिंसा और दरिद्र नारायण की सेवा आदि सिद्धान्तों का मूल्यांकन करते हुए कहा गया है कि ‘गांधीवाद जनता की मुक्ति, सामन्तकालीन घरेलू उद्योग-धन्धों और स्वामी-सेवक के सम्बन्ध की पुन: स्थापना में समझता है जो इतिहास की क़ब्र में दफ़न हो चुकी हैं। मुर्दा व्यवस्थाएँ और आदर्श समाज को विकास की ओर ले जाने का काम नहीं कर सकते। उनका उपयोग, उन्हें समाप्त कर देनेवाले कारणों को समझने के लिए या उनकी शव-परीक्षा के लिए ही हो सकता है।’ ‘रामराज्य की कथा’ में गांधी जी की ‘रामराज्य’ की कल्पना और उसके व्यावहारिक रूप के अध्ययन के साथ ही साथ रामराज्य के समता, न्याय और अहिंसा जैसे मूल्यों के माध्यम से जनता के शोषण की व्याख्या की गई है। ‘मार्क्सवाद’ में सेंट साइमन, ओवेन आदि सन्त साम्यवादियों के विचारों के साथ मार्क्स के विचारों और सिद्धान्तों की व्याख्या की गई है तथा अन्य राजनैतिक सिद्धान्तों से उसके अन्तर को स्पष्ट किया गया है। ‘देखा सोचा समझा’ में नैनीताल, कुल्लूमनाली आदि यात्रा-वर्णनों के साथ-साथ समकालीन साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का विश्लेषण भी है। ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में व्यंगात्मक निबन्धों के माध्यम से भी हिंसा-अहिंसा आदि के साथ अपने समय को परिभाषित करने का प्रयत्न मार्क्सवाद की दृष्टि से किया गया है।

यशपाल के इन निबन्धों में उनके युग के राजनैतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकारों से सम्बद्ध तेज़ बहसों और विवादों की झलक मिलती है। ये निबन्ध एक सर्जक की गहरी निष्ठा और व्यावहारिक समझ से विकसित हैं। दलित, शोषित और पीड़ित के प्रति गहरे लगाव के कारण वे गांधीवाद, मार्क्सवाद आदि सब कुछ को उन कारणों के परिवर्तन की दृष्टि से आँकते हैं जो ग़रीबी और शोषण के कारण हैं। इन निबन्धों में ऐतिहासिकता के साथ-साथ समकालीनता भी है। इन निबन्धों से यशपाल और उनके समय को समझने में मदद मिलती है। जो लोग इन्हें गांधीवाद और मार्क्सवाद की दृष्टि से पढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी आज के सन्दर्भ के कारण इनकी ताक़तों और कमज़ोरियों का पता चलेगा, क्योंकि इनमें प्रस्तुतीकरण ही नहीं, विश्लेषण है। इन सब में कसौटी शोषित वर्ग की भौतिक स्थितियों और उनके कारणों का बना रहना या बदलना ही है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Publication year
2009
Weight
1260 grams
ISBN-13
9789389742190
Pages
1128
Reading time
~38 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13.5 × 21.5 cm
Language
Hindi

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