Scoleris Ki Chhaon Mein
(0)
Author:
Purushottam AgarwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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पुरुषोत्त्म अग्रवाल इस समय हिन्दी में सोचने-लिखने वाले और विचार को तार्किक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ानेवाले चिन्तकों में अग्रणी हैं। देश की राजनीति से लेकर समाज, संस्कृति और साहित्य की दशा-दिशा पर पिछले दशकों में उन्होंने लगातार हस्तक्षेपकारी लेखन किया है।</p> <p>‘स्कोलेरिस की छाँव में’ पुस्तक में उनका 2005 से 2007 तक का लेखन संकलित है जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों के सामने आया और विचार-विमर्श का विषय बना। देश में मानवाधिकारों का हालात का प्रश्न हो या पूरी मानवता के लिए भविष्य की वैकल्पिक व्यवस्था का, उपनिवेश और आधुनिकता का सवाल हो या इधर बढ़ रहे बात-बात पर आहत होकर हत्या पर उतारू हो जानेवाले क़िस्म-क़िस्म के समूहों का, यहाँ भी पुरुषोत्तम जी इन तमाम मुद़्दों पर मुखर हैं।</p> <p>पुस्तक के दो खंड हैं। पहले में उनके अमेरिका यात्रा और वहाँ हुए व्याख्यानादि के दौरान उपजे विचारों और प्रतिक्रियाओं का संकलन है, और दूसरे में समकाल को खँगालती अन्य टिप्पणियाँ और आलेख हैं।</p> <p>शैतानों और विद्वानों का पेड़ कहे जानेवाले एल्स्टोनिया स्कोलेरिस के बहाने, जो लेखक को इंडिया इंटरनेशनल लाइब्रेरी के सामने खड़ा मिला, उन्होंने ललित चिन्तन का एक अद्भुत नमूना रचा है, जो इस किताब का शीर्षक भी बना।
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पुरुषोत्त्म अग्रवाल इस समय हिन्दी में सोचने-लिखने वाले और विचार को तार्किक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ानेवाले चिन्तकों में अग्रणी हैं। देश की राजनीति से लेकर समाज, संस्कृति और साहित्य की दशा-दिशा पर पिछले दशकों में उन्होंने लगातार हस्तक्षेपकारी लेखन किया है।</p>
<p>‘स्कोलेरिस की छाँव में’ पुस्तक में उनका 2005 से 2007 तक का लेखन संकलित है जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों के सामने आया और विचार-विमर्श का विषय बना। देश में मानवाधिकारों का हालात का प्रश्न हो या पूरी मानवता के लिए भविष्य की वैकल्पिक व्यवस्था का, उपनिवेश और आधुनिकता का सवाल हो या इधर बढ़ रहे बात-बात पर आहत होकर हत्या पर उतारू हो जानेवाले क़िस्म-क़िस्म के समूहों का, यहाँ भी पुरुषोत्तम जी इन तमाम मुद़्दों पर मुखर हैं।</p>
<p>पुस्तक के दो खंड हैं। पहले में उनके अमेरिका यात्रा और वहाँ हुए व्याख्यानादि के दौरान उपजे विचारों और प्रतिक्रियाओं का संकलन है, और दूसरे में समकाल को खँगालती अन्य टिप्पणियाँ और आलेख हैं।</p>
<p>शैतानों और विद्वानों का पेड़ कहे जानेवाले एल्स्टोनिया स्कोलेरिस के बहाने, जो लेखक को इंडिया इंटरनेशनल लाइब्रेरी के सामने खड़ा मिला, उन्होंने ललित चिन्तन का एक अद्भुत नमूना रचा है, जो इस किताब का शीर्षक भी बना।
Book Details
-
ISBN9788126728671
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: प्रस्तुत संग्रह ‘कदम की फूली डाल’ में शतकिञ्जल्कित कुसुम को अक्षय सौन्दर्य तथा सौभाग्य की पूर्णता दर्शाई गई है जिसमें इसकी आराधना तीन सोपानों में संकलित है। पहला है भ्रमण, जिसके अन्तर्गत विन्ध्यभूमि के सौन्दर्य-दर्शन से आकलित अनुभव संगृहीत हैं, दूसरा है चिन्तन, जिसमें साहित्य के कुछ तात्कालिक प्रश्नों की जिज्ञासा है और अपनी मान्यताओं के समर्थन में कुछ विशिष्ट कवियों या काव्यों का पर्यालोचन है और तीसरा है स्वप्न, जिसमें बौद्धिक धरातल से ऊपर उठकर अन्तःकरण अपनी आराध्य भावभूमि में पहुँचकर आश्वस्त हो गया है। अन्तिम खंड सबसे छोटा है, क्योंकि ऐसी आश्वस्तता के क्षण इधर बहुत वायरल रहे हैं।
Anuvad : Avadharna evam vimarsh
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

- Description: नवोन्मेष तथा सृजनशीलता को अनुवाद का स्वभाव घोषित करनेवाली यह किताब अनुवाद को दो भिन्न समुदायों, राष्ट्रीयताओं और देशों को समझने एवं उनके मत-मतान्तरों को जानने का ज़रूरी औजार मानती है। फलस्वरूप यह अनुवाद को भाषा-संवाद मानने की प्रचलित मान्यता से आगे बढ़कर उसे सभ्यता-संवाद मानने का तर्क रचती है। इसमें अनुवाद को आधारभूत पहलुओं से समझने और विवेचित करने का प्रयास है। इस प्रयास में अनुवाद की अवधारणा को विखंडनवादी विमर्श के धरातल पर भी रखकर जाँचा-परखा गया है। विवेचन में इस बात की ख़ास सावधानी बरती गई है कि अत्याधुनिकता की चकाचौंध में अनुवाद का कला-कौशल धूमिल न हो जाए, बल्कि उसमें सृजन की लौ सर्वत्र जलती रहे। अक्सर अनुवाद को भाषा-कर्म कहा जाता है, मगर यह भाषा-कर्म कोई सामान्य कर्म नहीं है। मनुष्य-समाज की संवेदना, परम्परा, संघर्ष और सम्पूर्ण जीवन-राग भाषा के नियामक तत्त्व होते हैं। स्वाभाविक है कि अनुवाद के चिन्तन और सरोकार भाषा के नियामक तत्त्वों से जुड़कर गहन और व्यापक हो जाते हैं। शायद इसीलिए अनुवाद में मूलवत् होने की आकांक्षा और वास्तविकता के बीच टकराव मिलता है। किन्तु इस तरह के टकराव को यह किताब भाषा, संस्कृति और सभ्यता के विभाजक छोरों के हवाले नहीं करती, किसी क़िस्म की जिरह से उसका महिमामंडन भी नहीं करती; बल्कि अनुवादकर्ता के कौशल और क़ाबिलियत का विमर्श रचती है। अकारण नहीं, यह किताब अनुवाद को सृजन मानती है—किसी भाषा-सृजन का दूसरी भाषा में सृजन—अनुरचना की शक्ल में मूल रचना की परवर्ती रचना। अनुवाद को रचना का अनश्वर उद्यम घोषित करना निस्सन्देह इस किताब का मौलिक और सर्वथा नया विमर्श माना जाएगा।
Nai Kahani Ki Bhumika
- Author Name:
Kamleshwar
- Book Type:

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Description:
'एक शानदार अतीत कुत्ते की मौत मर रहा है, उसी में से फूटता हुआ एक विलक्षण वर्तमान रू-ब-रू खड़ा है—अनाम, अरक्षित, आदिम अवस्था में। और आदिम अवस्था में खड़ा यह मनुष्य अपनी भाषा चाहता है, आस्था चाहता है, कविता और कला चाहता है, मूल्य और संस्कार चाहता है; अपनी मानसिक और भौतिक दुनिया चाहता है...।'
यह है नयी कहानी की भूमिका—इस कहानी को शास्त्र और शास्त्रियों द्वारा परिभाषित करने की जब-जब कोशिश हुई है, कहानी और कहानीकार ने विद्रोह किया है। इस कहानी को केवल जीवन के सन्दर्भों से ही समझा जा सकता है, युग के सम्पूर्ण बोध के साथ ही पाया जा सकता है।
नयी कहानी के प्रमुख प्रवक्ता तथा समान्तर कहानी आन्दोलन के प्रवर्तक कमलेश्वर ने छठे दशक के कालखंड में जीवन के उलझे रेशों और उससे उभरनेवाली कहानी की जटिलताओं को गहरी और साफ़ निगाहों से विश्लेषित किया है। साहित्य का यह विश्लेषण बिना स्वस्थ सामाजिक दृष्टि के सम्भव नहीं है।
कमलेश्वर की यह पुस्तक इसलिए ऐतिहासिक महत्त्व की है कि यह समय और साहित्य को पारस्परिक समग्रता में समझने की दृष्टि देती है। 'नयी कहानी की भूमिका' अपने समय के साहित्य की अत्यन्त विशिष्ट दस्तावेज़ है; पाठकों, लेखकों और अध्येताओं के लिए अपरिहार्य पुस्तक है।
Premchand Aur Unka Yug
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

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Description:
प्रख्यात प्रगतिशील समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘प्रेमचन्द और उनका युग’ का यह नवीन परिवर्धित संस्करण है। इसमें 'प्रेमाश्रम और गोदान : कुछ अन्य समस्याएँ' शीर्षक से लगभग सौ पृष्ठों की नई सामग्री जोड़ी गई है, और इस प्रकार यह पुस्तक अब प्रेमचन्द पर
डॉ. शर्मा के अद्यावधि चिन्तन को प्रस्तुत करती है।प्रेमचन्द भारत की नई राष्ट्रीय और जनवादी चेतना के प्रतिनिधि साहित्यकार थे। अपने युग और समाज का जो यथार्थ चित्रण उन्होंने किया, वह अद्वितीय है। इस पुस्तक में विद्वान लेखक ने प्रेमचन्द की कृतियों का मूल्यांकन ऐतिहासिक सन्दर्भ और सामाजिक परिवेश की पृष्ठभूमि में किया है।
प्रथम अध्याय में उनके जीवन पर तथा अगले अध्यायों में क्रमशः उनके उपन्यासों और कहानियों पर प्रकाश डालते हुए सम्पादक, विचारक और आलोचक के रूप में प्रेमचन्द के कृतित्व का विश्लेषण किया गया है। तदुपरान्त ‘प्रगतिशील साहित्य और भाषा की समस्या’, ‘युग निर्माता प्रेमचन्द’ एवं ‘समस्याएँ’ शीर्षकों के अन्तर्गत प्रेमचन्द के कृतित्व-सम्बन्धी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत किए गए हैं। श्री अमृतराय द्वारा लिखित ‘प्रेमचन्द : क़लम का सिपाही’ तथा श्री मदन गोपाल लिखित ‘क़लम का मज़दूर : प्रेमचन्द' पुस्तकों की तर्कपूर्ण शैली में समीक्षा की गई है।
यह प्रेमचन्द पर एक तथ्यपूर्ण और सम्पूर्ण पुस्तक है।
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