Kuvempu Sahitya : Vividh Aayam
Author:
Ram PrakashPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Unavailable
भारतेन्दु का भाषा–प्रेम, मैथिलीशरण गुप्त की सांस्कृतिकता, जयशंकर प्रसाद की दार्शनिकता, पंत का प्रकृति–प्रेम, महादेवी वर्मा की रहस्यात्मकता, निराला की क्रान्तिकारिता, हजारीप्रसाद द्विवेदी की परम्परा–निष्ठा, प्रेमचन्द की सामाजिक–प्रतिबद्धता, रेणु की आंचलिकता, नागार्जुन की फक्कड़ता, केदारनाथ अग्रवाल का ग्रामीण–प्रेम, हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मकता और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की वैज्ञानिकता को अपने साहित्य में समेटनेवाले रचनात्मक व्यक्तित्व का नाम है—‘कुवेम्पु’। कन्नड़ भाषा के प्रथम ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित ‘कन्नड़ कविरत्न’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विविध पक्षों पर विद्वत्तापूर्ण व्यापक अध्ययन को प्रस्तुत करनेवाले आलेखों का संग्रह है—‘कुवेम्पु साहित्य : विविध आयाम’।
ISBN: 9788183612142
Pages: 211
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्रस्तुत पुस्तक में कृष्ण-भक्ति के इतिहास तथा सिद्धान्तों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। सम्यक् ज्ञान के बिना जिज्ञासु विषय अपूर्ण और अस्पष्ट ही रह जाता है। साम्प्रदायिक कृष्ण-भक्ति से अनुप्राणित होकर लिखे गए हिन्दी साहित्य का अनुशीलन उनके सिद्धान्तों को पृष्ठभूमि में करने से अनेक भ्रमों का निराकरण हो जाता है। इस निबन्ध में साहित्य पर उनके प्रभाव का विवेचन व्यष्टि नहीं, अपितु समष्टि रूप से किया गया है।
कृष्ण-भक्ति का प्रारम्भ सहस्राब्दियों पूर्व हुआ था। समयानुसार अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक कारणों से उसका क्रमिक विकास होता गया। आन्दोलन के फलस्वरूप उसके प्रचलित रूप को देखकर अनेक विद्वान् उस पर विदेशी प्रभाव सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। जिन अनेक भारतीय साधनाओं के उपकरणों ने उसे पल्लवित किया है, उनका क्रमिक इतिहास इस प्रकरण का प्रमुख विषय है। अध्ययन की सामग्री यत्र-तत्र विकीर्ण मिलती है। उसका कहीं भी एकत्र उपयोग नहीं प्राप्त होता। यहाँ न केवल उसे शृंखलाबद्ध किया गया है, अपितु उसमें अनेक अस्पष्ट गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास भी है।
वल्लभ और गौडीय सम्प्रदायों के अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों का विस्तृत विवरण भी साहित्य के अध्येताओं के समक्ष रखा गया है। निम्बार्क सम्प्रदाय का विचार इस निबन्ध की सीमा से परे है, क्योंकि हिन्दी साहित्य के सृजन में उसका कोई प्रत्यक्ष योग नहीं रहा है। ब्रजभाषा साहित्य के निर्माण का प्रारम्भ वस्तुत: वल्लभाचार्य की प्रेरणा से हुआ है। इस प्रकरण का महत्त्व अनेक स्थलों पर नवीन सामग्रियों के समावेश से बढ़ गया है। कृष्ण-भक्ति के प्रमुख कवियों का इसमें नाम निर्देश मात्र है। साहित्यिक कृतियों की समीक्षा भी नहीं है। ग्रन्थ के लघु कलेवर में उसकी अपेक्षा भी नहीं है। इस ग्रन्थ को हम एक परिचयात्मक ग्रन्थ ही कह सकते हैं। हिन्दी साहित्य में ब्रजभाषा के योगदान का उल्लेख भी किया गया है। ‘ब्रज के वैष्णव सम्प्रदाय और हिन्दी साहित्य’ के अनुशीलन से जो ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित होती है, निश्चित ही पाठक उससे लाभान्वित होंगे।
Rameshraaj Ke Kundaliya Chand
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में मैंने कुण्डलिया छंद के तीन प्रकारों में कविताएँ लिखी हैं, जो निम्नलिखित रूप में हैं- 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 16-16 मात्राओं के 6 चरणों में बाँधा है, जिसके हर चरण में 8 मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के 6 चरणों में 96 मात्राओं का समावेश किया गया है | 'सर्प कुंडली 'राज' छंद' भी छंदशास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 13, 13 मात्राओं के दो चरणों से 26 मात्राओं की एक पंक्ति के रूप में बाँधा है, जिसके हर चरण में 13 मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | कुंडलिया दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के 6 चरण होते हैं तथा प्रत्येकचरण में 24 मात्राएँ होती है। कुंडलिया के पहले दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं। दोहा के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।रोला का प्रथम चरण11मात्राओं तथा दूसरा चरण 13 मात्राओं का होता है।
Vivah Ki Museebaten
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
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Description:
यह पुस्तक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चिन्तनपूर्ण, लोकोपयोगी निबन्धों का श्रेष्ठ संकलन है। दिनकर जी के चिन्तन-स्वरूप का विस्मयकारी साक्षात्कार करानेवाले ये निबन्ध पाठक के ज्ञान-क्षितिज का विस्तार भी करते हैं। इन निबन्धों में जहाँ एक ओर विवाह, प्रेम, काम, नैतिकता और शिक्षा जैसे विषयों पर विद्वान कृतिकार का सन्तुलित दृष्टिकोण उद्घाटित होता है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र, धर्म और विज्ञान तथा मूल्य-ह्रास जैसे ज्वलन्त प्रश्नों पर उनकी प्रगतिशील दृष्टि मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।
भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति-पद पर कार्य करते हुए दिनकर जी ने जो अनुभव किया, उसका लेखा-जोखा प्रस्तुत है ‘शिक्षा : तब और अब’ निबन्ध में इस चेतावनी के साथ कि ‘शिक्षा का स्तर अभी भी बहुत नीचा है। अगर वह और भी नीचे लाया गया तो बेकारों की फ़ौज बढ़ेगी और उनकी फ़ौज भी, जिन्हें कोई भी काम नहीं सौंपा जा सकता।’
इसी तरह ‘पुरानी और नई नैतिकता’, ‘लोकतंत्र : कुछ विचार’, ‘धर्म और विज्ञान’, ‘मूल्य-ह्रास के पच्चीस वर्ष’ निबन्धों में सारगर्भित विचार-सूक्तियाँ ही नहीं, एक प्रबुद्ध विचारक की सामयिक चेतावनी भी है।
ये निबन्ध राष्ट्रकवि दिनकर के व्यक्तित्व को भी समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।
समाज में अनन्त काल से प्रेम के प्रति सन्तों, चिन्तकों और शास्त्रकारों का व्यवहार पुलिस का-सा रहा है। और उन्हीं के भय से मनुष्य ने अपने चेहरे पर पवित्रता का नक़ाब लगाना मंज़ूर कर लिया, यद्यपि इस नक़ाब का उसे अभ्यास नहीं था। अथवा यों कहें कि यह नक़ाब जितने अच्छे सूत का है, उतने बारीक और महीन सूत आदमी की भीतरी ज़िन्दगी में नहीं काते जाते।
Premchand : Kahani Ka Rahanuma
- Author Name:
Zafar Raza
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Description:
प्रेमचन्द की रचनाएँ आधुनिक भारत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, क्योंकि उन्हीं के समय से भारतीय पुनर्जागरण का प्रारम्भ होता है, जिसके पैरों की आहट उनकी रचनाओं में महसूस होती है। राष्ट्रीय जीवन की परिवर्तनशीलता, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रगति एवं प्रतिक्रियावादिता, धर्म तथा मानवता की परछाइयाँ प्रेमचन्द की रचनाओं में झलकती हैं। प्रेमचन्द की अनुभूति नदी के किनारे खड़े किसी दर्शक के समान नहीं है वरन् उन्होंने राष्ट्रीय जीवन के गहरे पानी में उतरकर समस्याओं से बोझिल नैया को किनारे जाने में अपने सहयोगियों का हाथ बँटाया
था।...प्रेमचन्द के विषय में विभिन्न प्रकार के विचार व्यक्त किए गए हैं। किसी विचार में प्रेमचन्द प्राचीन भारत का गौरवगान करते हैं। कोई उन्हें किसानों तथा मज़दूरों का साथी बताता है, किसी के विचार में प्रेमचन्द गांधीवादी हैं, कोई उन्हें साम्यवादी कहता है। आधुनिक वैज्ञानिक तथा भौतिक स्रोतों को जीवन का आधार माननेवालों को प्रेमचन्द में पाश्चात्य चिन्तन दीख पड़ता है। कोई उनकी चर्चा आधुनिक भारतीय संवेदना की आधारभूमि मानता है। इस रंगारंगी में यह पुस्तक प्रेमचन्द के अध्ययन एवं अध्यापन को अधिक व्यापक करने के विचार से अपने मन्तव्य प्रस्तुत करती है।
Ramvilas Sharma Ka Mahattva
- Author Name:
Ravibhushan
- Book Type:

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Description:
रामविलास शर्मा उन भारतीय लेखकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों और मार्क्सवादी चिन्तकों में अग्रणी हैं जिन्होंने अपने समय में लेखन के ज़रिए निरन्तर और सार्थक हस्तक्षेप किया है। अपने समय और समाज की समस्याओं पर विचार किया है और उनके निदान भी सुझाए हैं।
अपने पहले लेख ‘निराला जी की कविता’ में उन्होंने लिखा था, ‘निराला जी की कविता नए युग की आँखों से यौवन को देखती हैं।’ उन्होंने सदैव नए युग की आँखों को महत्त्व दिया। आज जब बहुत सारे युवाओं ने हथियार डाल दिए हैं, और लेखक-आलोचक उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद जैसी बहसों में लिप्त हैं, हमें रामविलास जी की अडिगता, अविचलता और मार्क्सवादी दर्शन में अटूट आस्था तथा जन-संघर्षों में विश्वास को याद करने की ज़रूरत है।
रामविलास शर्मा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और निराला की अगली कड़ी हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि तुलसीदास को जो राम के नाम पर होता था, वही अच्छा लगता था। देश और जनता के हित में जो होता है, वह मुझे अच्छा लगता है। उनके लेखन की मुख्य चिन्ता हिन्दी और भारत रहे।
सम्भवत: बीसवीं सदी में विश्व की किसी और भाषा में कोई ऐसा दूसरा आलोचक नहीं है जिसने अपने जातीय समाज, जातीय भाषा और साहित्य के सम्बन्ध में एक साथ क्रान्तिकारी स्थापनाएँ दी हों। वे साहित्य समीक्षक, सभ्यता समीक्षक और संस्कृति समीक्षक एक साथ रहे हैं। यह पुस्तक आज के भारत के सन्दर्भ में उनका पुनर्पाठ करने का प्रयास है—अपने लम्बे लेखन-काल में उन्होंने जिन-जिन विषयों को व्यापक ढंग से छुआ, उनके सम्बन्ध में उनके विचारों को दुबारा पढ़ने का भी और वर्तमान घटाटोप में कोई रास्ता निकालने का भी।
Meera Ka Jeevan
- Author Name:
Arvind Singh Tejawat
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Description:
मीराँ के जीवन में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए यह पुस्तक न केवल मीराँ की एक प्रामाणिक जीवनी है वरन् यह जीवनी इतिहास-दृष्टि से परिपूर्ण एवं महत्त्वपूर्ण शोध निष्कर्षों का समन्वित परिणाम है।
यह पुस्तक बताती है कि मीराँ के लिए कृष्ण भक्ति एक साधन थी न कि साध्य। कृष्ण भक्ति का सहारा लेकर मीराँ ने मध्यकालीन सामन्ती समाज में व्याप्त सती-प्रथा जैसी तमाम सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया एवं स्त्री-स्वतंत्रता के पक्ष में विद्रोह का स्वर बुलन्द किया।
यह पुस्तक ब्राह्मण कथाकारों एवं परवर्ती आलोचकों द्वारा निर्मित मीराँ की उस पारम्परिक छवि को तोड़ती है जो उसे केवल प्रेम-दीवानी कवयित्री की परिधि में सीमित कर देना चाहते थे। निश्चय ही, मीराँ को समग्र रूप से समझने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी।
Nai Kahani Aur Amarkant
- Author Name:
Nirmal Singhal
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Description:
प्रेमचंद की कहानी-परंपरा के वाहक के रूप में ख्यात अमरकांत नई कहानी के भी प्रमुख रचनाकार हैं। उनकी कहानियों के निम्न मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय पात्र ‘क़फ़न’ के घीसू-माधव के वंशज प्रतीत होते हैं। साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत के मोहभंग और निराशा को भी उन्होंने अपनी कहानियों में समेटा है। बल्कि कहना चाहिए कि धीरे-धीरे यही तत्व उनकी कहानियों में केंद्रीय होते चले गए हैं। साथ ही आया व्यंग्य और एक तीखा कटाक्ष जो स्वतंत्रता-बाद के सफेद-पोश भारतीय समाज की निर्ममतापूर्वक पोल खोलता है। इसी व्यंग्य के सहारे उन्होंने हमारे भीतर स्थायी भाव की तरह जड़ जमाते संत्रास, ऊब, घुटन, अकेलेपन और भीतरी-बाहरी हिंसा को भी बड़ी कुशलता के साथ रेखांकित किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में अमरकांत के लगभग संपूर्ण कथा-जगत पर एक गहन दृष्टि के साथ-साथ नई कहानी-आंदोलन में उनकी अवस्थिति को तलाशने की भी कोशिश की गई है। इस प्रयास में एक तरफ जहाँ अमरकांत की रचनात्मकता के विभिन्न पहलुओं और उनकी कहानियों में आए पात्रों और अनेक शिल्प व कथ्यगत तत्वों का खुलासा हुआ है, वहीं नई कहानी आंदोलन के विशिष्ट पक्षों और अन्य समकालीन रचनाकारों के योगदान पर भी व्यापक प्रकाश पड़ा है।
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