Chetna Ki Shikha
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
“श्री अरविन्द के व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक, तीनों का समन्वय था और वे सब-के-सब एक ही लक्ष्य की ओर गतिशील थे।...उनके दर्शन और काव्य की जो वास्तविक शक्ति है, उनके भीतर जो प्रामाणिकता है, वह श्री अरविन्द की योगसाधना से आई है। योग के बल से ही उन्होंने सत्य को देखा और योग के बल से ही उन्हें यह शक्ति मिली कि सत्य को वे भाषा में अभिव्यक्त कर सकें।’’ राष्ट्रकवि दिनकर के इस उद्धरण से स्पष्ट पता चलता है कि श्री अरविन्द की साधना अथाह थी। उनका व्यक्तित्व गहन और विशाल था और उनका साहित्य दुर्गम समुद्र के समान था। प्रस्तुत कृति में दिनकर ने योगिराज अरविन्द के विकासवाद, अतिमानव की उनकी अपनी अवधारणा और साहित्यिक मान्यताओं का सरल, सुबोध तरीक़े से परिचय दिया है। यही नहीं, इस पुस्तक में संकलित हैं दिनकर द्वारा अपनी विशिष्ट भाषा-शैली में अनूदित श्री अरविन्द की चौदह महत्त्वपूर्ण कविताएँ भी।</p>
<p>'चेतना की शिखा' योगिराज अरविन्द का ही नहीं, युग-चारण नाम से विख्यात <strong>रामधारी सिंह </strong><strong>‘</strong><strong>दिनकर</strong><strong>’</strong> की विराट मानसिकता का भी परिचय देनेवाली एक विचार-प्रधान बहुमूल्य कृति है।
ISBN: 9789389243833
Pages: 176
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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मध्यकालीन साहित्य के विश्रुत विद्वान डॉ. भगीरथ मिश्र ने इस छोटी-सी पुस्तक में हिन्दी-काव्य की एक अत्यन्त वेगवती धारा का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस काव्यधारा की पृष्ठभूमि के रूप में उन्होंने लोक-भाषा की परम्परा, रीति-साहित्य के विकास के कारणों और तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों पर विस्तार से विचार किया है। सामान्यतः इस काव्यधारा पर जो दोष लगाए जाते हैं, उन पर क्रमबद्ध रूप से विचार करते हुए निष्कर्ष रूप में कहा है कि ‘उस समय रीति साहित्य का बँधी-बँधाई परिपाटी पर विकास, रूढ़िवादिता नहीं वरन् अतिशय राजप्रशंसा से मुक्ति पाने और शुद्ध काव्य लिखने के उद्देश्य को पूरा करनेवाला है।’ और ‘हिन्दी-रीति साहित्य का जिन परिस्थितियों में विकास हुआ उनका पूरा प्रभाव आत्मसात् करके भी इस साहित्य की अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक देन है।’
लेखक का मानना है कि हमें ‘रीति-साहित्य’ को संकीर्णता से नहीं बल्कि साहित्यिक उदारता से देखना चाहिए जिससे केवल आम और अमरूद की उपयोगिता से प्रभावित लोगों के लिए बिहारी को फिर यह न कहना पड़े कि :
‘फूल्यो अनफूल्यो रह्यो गँवई गाँव गुलाब।’
पृष्ठभूमि के उपरान्त डॉ. मिश्र ने ‘रीति’ के तात्पर्य, रीतिशास्त्र की परम्परा और उसके आधार को स्पष्ट करते हुए अलंकार सम्प्रदाय, रस सम्प्रदाय और ध्वनि सम्प्रदाय के इतिहास और सिद्धान्त पर भी विस्तार से विचार किया है। साथ ही, इन सम्प्रदायों के विभिन्न आचार्यों और उनके योगदान का समुचित मूल्यांकन किया है।
पुस्तक के अन्त में रीति-काव्य धारा के नौ प्रमुख कवियों का काव्य-चयन है। उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन के सन्दर्भ में इस काव्य को पढ़ना पाठकों के लिए रुचिकर अनुभव होगा। इस प्रकार सिद्धान्त और व्यवहार की समवेत प्रस्तुति के रूप में यह पुस्तक हिन्दी रीति-साहित्य का सांगोपांग इतिहास ही है, जो साहित्य के विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, सन्दर्भ-ग्रन्थों के विस्तृत उल्लेख से विद्वानों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो गई है।
Dakshin Sahitya Ka Aalochantmak Itihas
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Iqbal Ahmed
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Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Muktibodh
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Gajanan Madhav Muktibodh
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Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
मुक्तिबोध ऐसे प्रगतिशील कवि, विचारक हैं जिनके लिखे हुए की प्रासंगिकता दिन पर दिन बढ़ती ही गई है। उनके निबन्धों ने हिन्दी साहित्य और आलोचना पर गहरा असर छोड़ा है। उन्होंने अपने निबन्धों में मध्यवर्ग के सघन और रचनात्मक आत्मसंघर्षों को स्वर देते हुए कला-चिन्तन सम्बन्धी नया सौन्दर्यशास्त्र विकसित किया जिसका असर ऐसा व्यापक रहा कि उनके बाद आलोचना और साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र की शब्दावली हमेशा के लिए बदल गई। परवर्ती रचनाकारों के लिए वे सतत रोशनी देनेवाली एक मशाल की तरह रहे। हमें उम्मीद है कि उनके प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब हर उस भारतीय को अपनी अनिवार्य जरूरत की तरह लगेगी जो साहित्य, संस्कृति और कला से जुड़े हुए सवालों से टकराते हुए अपनी समृद्ध और सुदीर्घ परम्परा की तरफ देखता है।
Videshon Ke Mahakavya
- Author Name:
Gopikrishna Gopesh
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इस पुस्तक में अंग्रेज़ी लेखिका एच.ए. गुएरकर की ‘द बुक ऑ़फ एपिक’ से चुनकर विभिन्न भाषाओं के महाकाव्यों में से आठ कथाओं का हिन्दी अनुवाद संकलित है।
किसी भी भाषा की रचनात्मक समृद्धि का पता सिर्फ़ इतने से नहीं चलता कि उसमें मौलिक रचनाएँ कितनी हुर्इं। देश-विदेश की अन्यान्य भाषाओं की कृतियों के अनुवाद से भी भाषा-विशेष समृद्ध होती है। अनुवाद से हमारी भाषा की ग्रहणशीलता का प्रमाण भी मिलता है और उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की व्यापकता का भी।
इस दृष्टि से हिन्दी के सामर्थ्य को उजागर करने में अनुवादक के रूप में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका गोपीकृष्ण गोपेश ने निभाई, वह अविस्मरणीय है। उन्होंने कई भाषाओं की क्लासिक कृतियों का हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दी के प्रबुद्ध पाठकों और साहित्यानुरागियों को यह अवसर उपलब्ध कराया कि जिन भाषाओं में उनकी गति नहीं है, उन भाषाओं की भी कालजयी कृतियों का आस्वादन वे कर सके।
Agyeya Ka Kavya
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- Description: अज्ञेय को बहुधा व्यक्तिवादी या अस्तित्ववादी कहा जाता है। यह तय है कि अज्ञेय व्यक्तित्व को मूलगामी मानते थे, न कि सामाजिक सम्बन्धों का उत्पाद; व्यक्तित्व को अनन्यता, अद्वितीयता, मौलिकता वगैरह को उन्होंने भारी महत्त्व दिया। अस्तित्वाद की भी इसमें एक भूमिका थी। महत्त्व की बात लेकिन यह है कि उनका व्यक्तित्ववाद भी प्रबुद्ध बुर्जुआ व्यक्तिवाद ही था जिसमें लोकतंत्र, आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता निहित थी। सांस्कृतिक व्यक्तित्व होने के नाते ही व्यक्तिगत सम्बन्धों में भारत के बड़े पूँजी घरानों से जुड़ने के बावजूद वे एक अकेलापन भी भोगते हैं। यह अकेलापन दुतरफ़ा है। समाज के जिस तबके में उनका जीवन बसर होता है, उसके सम्बन्ध कृत्रिम हैं। दूसरी ओर उनकी दृष्टि में व्यापक जनसमाज की ‘भीड़’ और कोलाहल में व्यक्ति की निजता का कोई मोल नहीं।
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