Kyonki Samay Ek Shabd Hai
Author:
Ramesh Kuntal MeghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 560
₹
700
Unavailable
इस पुस्तक में लेखक का यह प्रयास रहा है कि ज्ञान के साहित्यशास्त्र में ज्ञान का समाजशास्त्र भी सार्थक ढंग से जुड़े। इसके लिए साहित्य के साथ समय और समाज के घटक भी संश्लिष्ट होते चले गए हैं।</p>
<p>इस पुस्तक में एक अनवरत आत्मविकास और सामाजिक प्रबोध का सचेतन संयोग स्वतः होता गया है। इसीलिए इसमें प्रश्नों के हाशिए और सन्दर्भ, दोनों ही बदले हैं और परिवर्द्धित हुए हैं। आधुनिकताबोध से चर्चा की शुरुआत हुई है और कलासूत्रों के समाजशास्त्र तथा इनसान की विमुक्ति के प्रश्नों से जोड़ा भी गया है। यदि अत्याधुनिक कहानी की जटिलता को समझा गया है तो उसमें अनिवार्यताबोध की धारणा का उन्मेष प्राप्त हो गया है; यदि ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘मृगनयनी’ जैसे उपन्यासों के ऐतिहासिक कलारूपों का निर्धारण किया गया है तो उन्हें इतिहासदर्शन तथा गाथा-रोमांसों के अत्याधुनिक फलकों पर रखकर नए प्रासंगिक पारिभाषिक अर्थ हासिल किए गए हैं; ‘झूठा-सच', ‘बलचनमा’ या ‘धरती धन न अपना’ जैसे उपन्यासों की भी पुराने चौखटों से बाहर निकलकर समकालीन जीवन के स्वरूपों तथा समाज के सुपरिगठन के सन्दर्भों से तुलना की गई है। इस तरह साहित्य को सामूहिक समकालीन जीवन में हस्तक्षेप करनेवाले अभिकर्ता की असली भूमिका देकर उसे परखा गया है। इस परख और पहचान में शास्त्रीय शब्दावली झटके से विलुप्त होती चली गई है; मानो बहुत-सी लीकें पुँछ गई हैं।</p>
<p>कविता के खंड में जहाँ प्रसाद के जीवन-दर्शन की झाँकी पाने का प्रयास किया गया है, वहीं निराला के वेदान्ती तथा दार्शनिक शब्द-संसार के जीवनीमूलक तात्पर्य तथा आधुनिक अर्थ ढूँढ़े गए हैं।</p>
<p>इस ईमानदार खोज और पहचान का अनिवार्य नतीजा यही निकला है कि कई महाप्रश्न उठ आए हैं जो साहित्य, सर्जना और आलोचना के त्रिकोण से बाँधे नहीं जा सके। उनके आयत्तीकरण के लिए एक संश्लिष्ट समाज-दर्शन और एक समग्र सांस्कृतिक रूप पेश किए गए हैं। इस तरह इस पुस्तक की एक खुली हुई सार्वजनीन सृजन-प्रक्रिया है जो उन कई सही और सच्चे सवालों को उठाती है जिनके उत्तर पाने के लिए पंडिताऊ तथा प्रोफ़ेसरी आलोचना-रूढ़ियों का क्षय हो जाता है।</p>
<p>साहित्य का शब्द-संसार, कृती का अनुभवसंसार तथा समाज का घटना-संसार—ये तीनों समन्वित होकर इस पुस्तक में सही आलोचना का समाहार करते हैं, यह कहना ज़्यादा समीचीन होगा।</p>
<p>विद्वान आलोचक और साहित्य-मर्मज्ञ रमेश कुन्तल मेघ की यह कृति निश्चय ही हिन्दी आलोचना की एक उपलब्धि है।
ISBN: 9788180311710
Pages: 632
Avg Reading Time: 21 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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सुयोग्य लेखक ने इस ग्रन्थ की तैयारी में कितना परिश्रम किया है, यह पुस्तक के अध्ययन से ही समझ में आ सकता है। रामकथा से सम्बन्ध रखनेवाली किसी भी सामग्री को आपने छोड़ा नहीं है। ग्रन्थ चार भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में ‘प्राचीन रामकथा साहित्य’ का विवेचन है। इसके अन्तर्गत पाँच अध्यायों में वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकिकृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्ध रामकथा तथा जैन रामकथा सम्बन्धी सामग्री की पूर्ण परीक्षा की गई है। द्वितीय भाग का सम्बन्ध ‘रामकथा की उत्पत्ति’ से है और इसके चार अध्यायों में दशरथ-जातक की समस्या, रामकथा के मूल स्रोत के सम्बन्ध में विद्वानों के मत, प्रचलित वाल्मीकीय रामायण के मुख्य प्रक्षेपों तथा रामकथा के प्रारम्भिक विकास पर विचार किया गया है। ग्रन्थ के तृतीय भाग में ‘अर्वाचीन रामकथा साहित्य का सिंहावलोकन’ है। इसमें भी चार अध्याय हैं। पहले, दूसरे अध्याय में संस्कृत के धार्मिक तथा ललित साहित्य में पाई जानेवाली रामकथा सम्बन्धी सामग्री की परीक्षा है। तीसरे अध्याय में आधुनिक भारतीय भाषाओं के रामकथा सम्बन्धी साहित्य का विवेचन है। इसमें हिन्दी के अतिरिक्त तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, काश्मीरी, सिंहली आदि समस्त भाषाओं के साहित्य की छानबीन की गई है। चौथे अध्याय में विदेश में पाए जानेवाले रामकथा के रूप का सार दिया गया है और इस सम्बन्ध में तिब्बत, खोतान, हिन्देशिया, हिन्दचीन, स्याम, ब्रह्मदेश आदि में उपलब्ध सामग्री का पूर्ण परिचय एक ही स्थान पर मिल जाता है। अन्तिम तथा चतुर्थ भाग में रामकथा सम्बन्धी एक-एक घटना को लेकर उसका पृथक्-पृथक् विकास दिखलाया गया है। घटनाएँ काण्ड-क्रम से ली गई हैं अत: यह भाग सात काण्डों के अनुसार सात अध्यायों में विभक्त है। उपसंहार में रामकथा की व्यापकता, विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता, प्रक्षिप्त सामग्री की सामान्य विशेषताएँ, विविध प्रभाव तथा विकास का सिंहावलोकन है।
—धीरेन्द्र वर्मा
Pant, Prasad Aur Maithilisharan
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक दिनकर की महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियों में से एक है। इसमें हिन्दी के तीन प्रसिद्ध कवियों पर स्वतंत्र रूप से विशद विवेचन किया गया है। इसमें संगृहीत तीन अलग-अलग निबन्धों में पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त का जो अनदेखा-अनछुआ आकलन है, उससे आधुनिक युग के हिन्दी साहित्य में उनके उस योगदान को रेखांकित किया जा सकता है, जो आज भी अपने चिन्तन और काव्य-वैशिष्ट्य में समीचीन है।
पुस्तक में मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं का अध्ययन इस दृष्टि से किया गया है कि उन्नीसवीं सदी में आरम्भ होनेवाले हिन्दू जागरण अथवा भारतीय पुनरुत्थान की अभिव्यक्ति उनमें कैसे और किस गहराई तक हुई है। वहीं दिनकर मानते हैं कि पंत साहित्य में ‘पल्लव’, ‘वीणा’, ‘गुंजन’ और ‘ग्रन्थि’ को जो प्रसिद्धि मिली, वह बाद की पुस्तकों को नहीं मिली। इसलिए उन्होंने इन पुस्तकों को छोड़ दिया है और उनके इस निबन्ध का मुख्य ध्येय इस बात का अनुसन्धान है कि गुंजन के बाद से लेकर अब तक पंत जी क्या कार्य करते रहे हैं। दिनकर रेखांकित करते हैं कि पंत जी का गुंजनोत्तर साहित्य भी काफ़ी सुन्दर, सुगम्भीर और विशाल है। इसलिए अपने इस निबन्ध के ज़रिए उन्होंने गुंजनोत्तर पंत-साहित्य की एक छोटी सी पीठिका तैयार की है, जो बेहद प्रभावशाली है। प्रसाद जी पर जो निबन्ध है, उसमें केवल ‘कामायनी’ का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। दिनकर द्वारा ‘कामायनी’ के इस सुगम्भीर अध्ययन में अध्येता के विचारों को ऊँचे धरातल पर विचरण करने का अवसर प्राप्त होता है, जैसा कि उनका प्रयास भी है कि इस काव्य के अध्ययन-क्षितिज को विस्तृत बनाया जाए।
निश्चित ही यह पुस्तक पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त के काव्य-परिदृश्य को लेकर मूल्य-निर्णय का जो सृजनात्मक पक्ष पेश करती है, वह शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए उपयोगी तो है ही, विरल भी है।
The Life and Times of Subhash Chandra Bose
- Author Name:
Praveen Bhalla
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Premchand Aur Bhartiya Samaj
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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Description:
प्रेमचन्द स्वाधीनता-संग्राम में साधारण भारतीय जनता की जीवंतता, प्रतिरोधी शक्ति और आकांक्षाओं-स्वप्नों के अमर गायक। उपन्यास और कहानी जैसी, हिन्द में प्रायः लड़खड़ाकर चलना सीखती, विधाओं को ‘स्वाधीनता’ के इस महास्वप्न से जोड़कर रचनात्मक ऊँचाइयों के चरम पर ले जानेवाले परिकल्पक। रचनाशीलता को जनता के ठोस नित-प्रति भौतिक जीवन और उसके अवचेतन में मौजूद उसकी साधारण और असाधारण इच्छाओं को संयुक्त कर एक पूर्ण जीवन का आख्यान बनानेवाले युगदर्शी कथाकार। ‘यथार्थ’ की ठोस पहचान और ‘यथास्थिति’ के पीछे कार्य कर रही कारक शक्तियों की प्रायः एक वैज्ञानिक की तरह पहचान करनेवाले भविष्यदर्शी विचारक और बुद्धिजीवी।
सम्भवतः इन्हीं कारणों से आधुनिक रचनाकारों में इकलौते प्रेमचन्द ही हैं जिनमें हिन्दी के शीर्ष स्थानीय मार्क्सवादी आलोचक प्रो. नामवर सिंह की दिलचस्पी निरन्तर बनी रही। प्रेमचन्द पर विभिन्न अवसरों पर दिए गए व्याख्यान एवं उन पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक में एक साथ प्रस्तुत हैं।
यहाँ शामिल निबन्धों एवं व्याख्यानों में प्रेमचन्द के सभी पक्षों पर विस्तार से बातचीत की गई है। प्रेमचन्द की वैचारिकता, जीवन-विवेक और उनकी रचनाओं के सम्बन्ध में प्रगतिशील आलोचना का स्पष्ट नज़रिया यहाँ अभिव्यक्त हुआ है। विशिष्ट सामाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों का विवेचन यहाँ है और भारतीय आख्यान परम्परा के सन्दर्भ में प्रेमचन्द के कथा-शिल्प की विशिष्टता और उसकी भारतीयता पर गम्भीर विचार भी। साम्प्रदायिकता, दलित प्रश्न जैसे विशिष्ट प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की रचनात्मकता और उनके विचारों का मूल्यांकन हो या स्वाधीनता-संग्राम के सन्दर्भ में उनकी ‘पोजीशन’ का विवेचन—इन निबन्धों में नामवर जी अपनी निर्भ्रान्त वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोक-संवेदी तर्क-प्रवणता और स्पष्ट जनपक्षधरता से प्रेमचन्द को उनकी सम्पूर्णता में उपस्थित करते हैं।
Paraspar : Bhasha-Sahitya-Andolan
- Author Name:
Rajeev Ranjan Giri
- Book Type:

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“हिन्दी भाषा का विमर्श और संघर्ष लम्बा है, लेकिन अभाग्यवश हमारा निपट वर्तमान पर आग्रह इतना इकहरा हो गया है कि उसकी परम्परा को भूल जाते हैं। एक युवा चिन्तनशील आलोचक ने विस्तार से इस विमर्श और संघर्ष के कई पहलू उजागर करने की कोशिश की है और कई विवादों का विवरण भी सटीक ढंग से दिया है। हम इस प्रयत्न को बहुत प्रासंगिक मानते हैं और इसलिए इस पुस्तक माला में सहर्ष प्रस्तुत करते हैं।”
—अशोक वाजपेयी
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