Taar Saptak : Siddhant Aur Kavita
Author:
BodhisatwaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
हिन्दी कविता के इतिहास में तार सप्तक का ऐतिहासिक महत्त्व है। काव्य-चेतना के दो युगों के सन्धि-बिन्दु पर मौजूद इस संकलन से गुज़रे बिना छायावाद, प्रगतिवाद और छायावादोत्तर कविताओं के बाद की हिन्दी कविता को नहीं समझा जा सकता। लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक इसका कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो पाया। हिन्दी के सुपरिचित कवि और अध्येता बोधिसत्व का यह शोध-प्रबन्ध इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।</p>
<p>पाँच विस्तृत अध्यायों में सुनियोजित इस पुस्तक में तार सप्तक के इतिहास, उसकी युगीन आवश्यकता, सम्पादन-प्रक्रिया और उससे जुड़े विवादों से आरम्भ करके हिन्दी के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उसका चरणबद्ध विवेचन किया गया है। तार सप्तक में शामिल कवियों के काव्य-चिन्तन का विस्तृत अध्ययन-सर्वेक्षण और उनकी काव्यगत विशेषताओं पर शोधकर्ता ने अपनी कवियोचित अन्तर्दृष्टि का प्रयोग करते हुए कई मूल्यवान निष्कर्ष प्राप्त किए हैं।</p>
<p>सप्तक के पहले और दूसरे संस्करणों में प्रकाशित कवि-वक्तव्यों में आए परिवर्तनों की तरफ़ भी लेखक की जिज्ञासा गई है, और उनके सूक्ष्म अध्ययन से उसने जानने की कोशिश की है कि कवियों के वक्तव्यों में आए ये बदलाव किस प्रवृत्ति के सूचक हैं—अन्विति के, अन्तर्विरोध के या विकास के।</p>
<p>कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी कविता के एक ऐतिहासिक मोड़ पर केन्द्रित यह गम्भीर अध्ययन न सिर्फ़ छात्रों, बल्कि कविता के इतिहास में रुचि रखनेवाले हर पाठक के लिए उपादेय सिद्ध होगा।
ISBN: 9788183618168
Pages: 152
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘भाषा-विज्ञान का रसायन’ अखिल देशीय स्तर के पाठक्रम अर्थात् जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, इलाहाबाद, अलीगढ़, लखनऊ, अवध, कानपुर, आगरा, पूर्वांचल, गोरखपुर, सागर, रीवा, जबलपुर, जयपुर, पूना, मुम्बई, नागपुर, पटना, राँची, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ तथा विश्वभारती, शान्तिनिकेतन आदि विश्वविद्यालयों के बी.ए., (हिन्दी तथा संस्कृत) एम.ए. (हिन्दी तथा संस्कृत) के सम्पूर्ण पाठ्यक्रमों को अपने भीतर मुकम्मल रूप में तो समेटती ही है, हर प्रान्त की हिन्दी माध्यम की पीसीएस, आईएएस तथा यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा सन् 2004 से अखिल भारतीय स्तर पर बदले गए नए पाठ्यक्रमों नेट, स्लेट आदि को भी अपने में समाहित कर भाषा-विज्ञान में अपनी प्रकृति की पुस्तकों में गम्भीर पुस्तक बन गई है।
पुस्तक की भाषा जीवन्त, शैली सजीव और तथ्य प्रामाणिक तथा ज़मीनी हैं। इस कृति की शैली निजी तथा भिन्न है। लेखक तथ्यों को करीने से सिलसिलेवार उठाते हैं, उन्हें पता है कहाँ क्या देना है, उन्हें यह भी पता है कि ज़रा-सी चूक पठनीयता की हत्या कर देगी। इतने जटिल विषय और उसके रोएँ-रेशे को नितान्त सरल भाषा, मोहक शैली, आत्मीय टोन और लय में बिना किसी रूमानी अतिरंजना, उग्रता को प्रस्तुत करनेवाली इतनी सुघर और बढ़िया पुस्तकें कम हैं। कुल मिलाकर अपने ढंग का रचनात्मक स्वाद देनेवाली यह ठोस और सार्थक कृति है।
Adyatan Bhasha Vigyan : Pratham Pramanik Vimarsh
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

- Description: भाषाविज्ञान पर अब तक लिखित सभी पुस्तकों से अलग एवं विशिष्ट। प्रगामी चरण—अद्यतन भाषाविज्ञान—को व्यापकता-गहनता में विवेचित करनेवाली तथा संक्षेप में भाषाविज्ञान के विकास-क्रम को निरूपित करनेवाली प्रथम प्रामाणिक पुस्तक। यह पुस्तक एक ओर सामान्य भाषाविज्ञान से वर्णनात्मक, संरचनात्मक भाषाविज्ञान तक, मनोभाषाविज्ञान से तंत्रिका-भाषाविज्ञान तक, व्यवहारवादी भाषाविज्ञान से विकासात्मक भाषाविज्ञान तक, समाज-भाषाविज्ञान से संभाव्यतापरक भाषाविज्ञान तक, विवेचनात्मक भाषाविज्ञान से पाठात्मक भाषाविज्ञान तक, डेकार्टवादी भाषाविज्ञान से संज्ञानात्मक भाषाविज्ञान तक, अदालती भाषाविज्ञान से गाणितिक और बीज-गाणितिक भाषाविज्ञान तक, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान तक, संगणक भाषा विज्ञान से कॉपर्स भाषाविज्ञान तक बीस प्रकार के भाषाविज्ञान के निरूपण और युक्तियुक्त विवेचन को अपने में समाविष्ट करती है; तो दूसरी ओर इसे नृतत्त्व-विज्ञान, प्राणि-विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, पर्यावरण-विज्ञान, प्रजाति-विज्ञान, शान्ति-अध्ययन, आनुपातिक अध्ययन, सांख्यिकी, धर्म, शिक्षा और दर्शन से जोड़कर स्वरूपित करती है। यह पुस्तक डी. 'शीतांशु' के वर्षों लम्बे भाषाविज्ञान-विषयक गहन अध्ययन-मनन और अध्यापन का सुपरिणाम है। निश्चय ही यह पुस्तक हिन्दी में भाषावैज्ञानिक चिन्तन और लेखन के एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है तथा हिन्दी संसार को अद्यतन भाषाविज्ञान से परिचित कराने का श्रेय प्राप्त करती है। अद्यतन भाषाविज्ञान के विभित्र प्रकारों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हिन्दी में अकेली पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।
Bhatkav ke 67 Varsh
- Author Name:
Satish Chandra Mittal
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत ग्रंथ ‘भटकाव के 67 वर्ष : कुछ मुद्दे’ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् से 2014 ई. तक की कुछ प्रमुख घटनाओं तथा राष्ट्रीय समस्याओं का ऐतिहासिक संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक विवेचन है। इसमें भारतीय नेतृत्व तथा उसके विभिन्न क्रियाकलापों का वर्णन तथा उनकी सोच तथा उनके व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है। ग्रंथ में कुछ प्रमुख मुद्दों की आलोचनात्मक समीक्षा की गई है। इसमें मजहब के आधार पर निर्मित भारत विभाजन से अपनी असीम पीड़ा तथा उससे उत्पन्न अनेक समस्याओं, भारतीय संस्कृति तथा अतीत से कटकर पाश्चात्य मॉडल पर आपा-धापा में बने भारतीय संविधान, भारतीय संविधान सभा में उस पर विशद विवाद तथा चर्चा, पाश्चात्य दृष्टि पर बनी शिक्षा-नीति, देशीय भाषा के स्थान पर अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व तथा पाठ्य पुस्तकों में विकृतियाँ, कश्मीर में की गई असभ्य भूलों के साथ, भारत-पाकिस्तान के चार प्रमुख युद्धों में भारतीय सेनाओं की शानदार विजयों के साथ, चीन के साथ युद्ध में शर्मनाक हार तथा भारतीय राजनीति के प्रमुख सूत्रों में भारतीय मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने की बजाय, चुनाव की वोट की राजनीति से वशीभूत हो, मुसलिम तुष्टीकरण की नीति तथा उसके विभिन्न स्वरूपों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। निश्चय ही यह ग्रंथ गत 67 वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में हुई हलचलों तथा भारत के राजनैतिक नेतृत्व के भटकाव, अलगाव, परस्पर टकराव तथा ठहराव की अनिर्णायक स्थिति की अवस्था, अवलोकन करने में सहायक होगा।
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