Muslim Navjagran Aur Akbar Allahabadi Ka 'Gandhinama'
(0)
Author:
Virendra Kumar BaranwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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हिन्दी में सम्भवत: यह पहली किताब है जिसमें अकबर इलाहाबादी के ‘गांधीनामा’ की पृष्ठभूमि में मुस्लिम नवजागरण, उसके विविध पक्षों तथा उसमें योगदान देनेवाले प्रमुख उन्नायकों के अवदान के बारे में इतनी बारीक चर्चा की गई है। इसमें शाह वली उल्लाह से लेकर मौलाना आज़ाद तक जैसे विख्यात युगपुरुषों के अवदान पर विचार तो किया ही गया है, इसके अलावा दो ऐसे विचारकों के योगदान पर भी विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है जिनके सम्बन्ध में बहुत कम लोग जानते हैं। मिर्ज़ा अबू तालिब और मौलवी मुमताज़ अली दो ऐसे ही नाम हैं। मिर्ज़ा अबू तालिब को मुस्लिम जगत में आधुनिकता की पहली आहट निरूपित किया गया है और मौलवी मुमताज़ अली को पहले मुस्लिम नारीवादी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।</p> <p>हिन्दू नवजागरण के प्रवर्तक राजा राममोहन राय और मुस्लिम नवजागरण के उन्नायक सर सैयद अहमद ख़ाँ के नेतृत्व वाली अलग-अलग ये दोनों धाराएँ बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में महात्मा गांधी पर आकर एक बार एक हो जाती हैं। अकबर इलाहाबादी का ‘गांधीनामा’ दोनों पुनर्जागरणों के मिलन-बिन्दु का काव्य है। अकबर को व्यंग्य और विनोद के कवि के रूप में ही प्राय: सीमित कर दिया जाता है, उनकी कविता का प्रबल उपनिवेश विरोधी स्वर अकसर रेखांकित नहीं हो पाता। दरअसल गांधी जी की तरह वह भी पश्चिमी सभ्यता के अन्धाधुन्ध नक़ल और मशीनों के ख़िलाफ़ थे। इस तरह गांधी और अकबर के विचारों में अद्भुत समानता है। ‘गांधीनामा’ में यह स्वर बहुत अच्छी तरह से मुखर है।
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हिन्दी में सम्भवत: यह पहली किताब है जिसमें अकबर इलाहाबादी के ‘गांधीनामा’ की पृष्ठभूमि में मुस्लिम नवजागरण, उसके विविध पक्षों तथा उसमें योगदान देनेवाले प्रमुख उन्नायकों के अवदान के बारे में इतनी बारीक चर्चा की गई है। इसमें शाह वली उल्लाह से लेकर मौलाना आज़ाद तक जैसे विख्यात युगपुरुषों के अवदान पर विचार तो किया ही गया है, इसके अलावा दो ऐसे विचारकों के योगदान पर भी विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है जिनके सम्बन्ध में बहुत कम लोग जानते हैं। मिर्ज़ा अबू तालिब और मौलवी मुमताज़ अली दो ऐसे ही नाम हैं। मिर्ज़ा अबू तालिब को मुस्लिम जगत में आधुनिकता की पहली आहट निरूपित किया गया है और मौलवी मुमताज़ अली को पहले मुस्लिम नारीवादी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।</p>
<p>हिन्दू नवजागरण के प्रवर्तक राजा राममोहन राय और मुस्लिम नवजागरण के उन्नायक सर सैयद अहमद ख़ाँ के नेतृत्व वाली अलग-अलग ये दोनों धाराएँ बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में महात्मा गांधी पर आकर एक बार एक हो जाती हैं। अकबर इलाहाबादी का ‘गांधीनामा’ दोनों पुनर्जागरणों के मिलन-बिन्दु का काव्य है। अकबर को व्यंग्य और विनोद के कवि के रूप में ही प्राय: सीमित कर दिया जाता है, उनकी कविता का प्रबल उपनिवेश विरोधी स्वर अकसर रेखांकित नहीं हो पाता। दरअसल गांधी जी की तरह वह भी पश्चिमी सभ्यता के अन्धाधुन्ध नक़ल और मशीनों के ख़िलाफ़ थे। इस तरह गांधी और अकबर के विचारों में अद्भुत समानता है। ‘गांधीनामा’ में यह स्वर बहुत अच्छी तरह से मुखर है।
Book Details
-
ISBN9789388183529
-
Pages312
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य’ में रुस्तम राय ने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया, काव्य में लोकमंगल की अवधारणा और उसका संधान, सौन्दर्यानुभूति की पहचान, भक्तिकाव्य की सामाजिक भूमिका, काव्यानुभूति की विशुद्धता और भक्तिकाव्य की प्रगतिशीलता पर विस्तार-पूर्वक विचार किया है। उन्होंने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया के साथ-साथ हिन्दी आलोचकों के भक्तिकाव्य विषयक मूल्यांकन को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करते हुए अपने मौलिक विचार भी प्रकट किए हैं। एक प्रकार से हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य, दोनों पर इस किताब में पुनर्विचार का प्रयत्न है और भक्तिकाव्य से हिन्दी आलोचना के अंतरंग सम्बन्ध की नई व्याख्या भी। लेखक ने सगुण-निर्गुण और उसके सामाजिक आधारों पर विचार करते हुए न केवल भक्त कवियों के आन्तरिक द्वन्द्व को बल्कि आलोचकों के मतों के अन्तर्विरोध को भी उजागर किया है।
कबीर और तुलसी के प्रसंग में उठनेवाले विवादों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है। इन दोनों कवियों की विश्व-दृष्टियों के अन्तर को रेखांकित करते हुए उनके आध्यात्मिक विचारों के बदले सामाजिक विचारों को प्राथमिकता दी गई है। इस पुस्तक में एक तरह से भक्तिकाव्य की आलोचना के माध्यम से हिन्दी आलोचना का इतिहास भी प्रस्तुत किया गया है।
समग्रतः इस पुस्तक में लेखक ने न केवल परिश्रम, सूझबूझ और आलोचकीय विवेक का परिचय दिया है, बल्कि मूल्यों की टकराहट और मूल्यांकनों के द्वन्द्व में उसने अपना स्वतंत्र विवेक नहीं खोया है। इसीलिए लेखक के निष्कर्षों से उसके निर्णय की क्षमता भी प्रकट होती है। निश्चय ही पुस्तक की प्रस्तुति स्तरीय, भाषा विषयानुकूल, प्रवाहपूर्ण और परिमार्जित है।
—डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
Nirala Ka Gadya Sahitya Aur Swadhinta Ki Chetna
- Author Name:
Nandita Singh
- Book Type:

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प्रस्तुत कृति ‘निराला का गद्य साहित्य और स्वाधीनता की चेतना' उनके मुक्त सर्जक व्यक्तित्व के विश्लेषण का एक मौलिक प्रयास है। मौलिक इस अर्थ में कि अभी तक आलोचक निराला के मुक्तिकामी काव्य व्यक्तित्व का ही विश्लेषण करते हुए उनकी हिन्दी सर्जन विचार के श्रेष्ठतम रचनाकारों की निर्मिति के प्रति ही सजग रहे हैं। निराला का सर्जक व्यक्तित्व एवं उनकी गद्य रचना की विधाएँ अभी तक अधूरी तथा अविश्लेषित पड़ी थीं। इस कृति का मूल मन्तव्य यही रहा है कि निराला के गद्य की विविध विधाओं, यथा—उपन्यास, कथा-साहित्य, निबन्ध आदि से सम्बद्ध कृतियों में उनकी अपनी मौलिकताएँ क्या रही हैं उसे रेखांकित किया जाए? निराला का सर्जक व्यक्तित्व प्रकृत्या तथा संस्कारत: मुक्तिकामी रहा है। उनके गद्य साहित्य में संस्कारत: पूरी तरह से व्याप्त उनकी मुक्तिकामिता का विश्लेषण कैसे किया जाए, इस कृति के लेखन का मुख्य प्रयोजन
है।निष्कर्ष रूप से हम कह सकते हैं कि यह शोध-कृति मुक्तिकामी निराला के व्यक्तित्व की पूरी तरह से पहचान कराते हुए उनके गद्य सर्जक व्यक्तित्व के विविध आयामों के विश्लेषणों की पहचान से सम्बद्ध है।
Muktibodh : Gyan Aur Samvedana
- Author Name:
Nandkishore Nandan
- Book Type:

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सुधी समीक्षक नंदकिशोर नवल की मुक्तिबोध पर लिखी गई यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है। पहले खंड में मुख्यतः उनके ‘ज्ञान’ का विश्लेषण है और दूसरे खंड में मुख्यतः उनकी ‘संवेदना’ का। लेकिन यह विभाजन केवल सुविधा की दृष्टि से है, नवल जी ने मुक्तिबोध को यथासम्भव अविभाज्य रूप में देखने और दिखाने की कोशिश की है। अध्ययन कविता पर केन्द्रित है, लेकिन प्रसंगवश इसमें उनके आलोचना-साहित्य, कथा-साहित्य और उनकी राजनीतिक टिप्पणियों की भी छानबीन की गई है।
मुक्तिबोध की कविता पर विचार करते हुए नवल जी ने उनकी मार्क्सवादी विश्वदृष्टि एवं राजनीतिक चेतना, उनके आत्मसंघर्ष, उनकी ओजपूर्ण भावना, विराट कल्पना और विश्लेषणात्मक बुद्धि की गहरी छानबीन की है और इस सन्दर्भ में अन्य विद्वान आलोचकों के मतों को भी जाँचा-परखा है। मुक्तिबोध की प्रगीतात्मकता, फैंटेसी और भाषा पर भी विस्तार से विचार किया गया है और परिशिष्ट में मुक्तिबोध की सर्वाधिक चर्चित एवं महत्त्वपूर्ण कविता ‘अँधेरे में’ का विश्लेषण किया गया है। दूसरे शब्दों में मुक्तिबोध पर यह पहली मुकम्मल किताब है।
Nirala Aur Muktibodh : Chaar Lambi Kavitayen
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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हिन्दी में लम्बी कविता का इतिहास नया नहीं है, भले उसे पारिभाषिक अभिधा मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं से प्राप्त हुई हो। पुराने कवियों को छोड़ दें, तो लम्बी कविता द्विवेदी-युग के कवियों से लेकर समवर्ती युग के कवियों तक ने लिखी है। हिन्दी के महत्त्वपूर्ण युवा आलोचक नंदकिशोर नवल ने अध्ययन के लिए चार लम्बी कविताएँ चुनी हैं। उनमें से दो निरालाकृत हैं और दो मुक्तिबोधकृत। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये चारों कविताएँ हिन्दी की चर्चित और विवादास्पद ही नहीं, महान कविताएँ भी हैं, जिनके सोपानों पर चरण रखते हुए हिन्दी कविता ने ऊँचाई प्राप्त की है।
लम्बी कविता का सम्बन्ध निश्चय ही केवल आकार से न होकर प्रकार से भी है। इसे संयोग ही कहेंगे कि लेखक द्वारा चुनी गई चारों कविताएँ चार तरह की हैं। ‘सरोज-स्मृति’ के चित्रों को यदि स्मृति का सूत्र गुम्फित करता है, तो 'राम की शक्ति-पूजा' कथा के सहारे आगे बढ़ती है। ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अँधेरे में’ दोनों ही फ़ैंटास्टिक कविताएँ हैं, लेकिन एक की फ़ैंटेसी जहाँ एक अखंड रूपक के रूप में है, वहीं दूसरे की फ़ैंटेसी एक पूरी चित्रशाला है। नवल ने बड़ी सूक्ष्मता से चारों लम्बी कविताओं के शिल्पगत वैशिष्ट्य को उद्घाटित करते हुए उनकी उस अन्तर्वस्तु पर प्रकाश डाला है, जो कि उससे अभिन्न है।
समकालीन हिन्दी आलोचना में रचना से साक्षात्कार की बहुत बात की जाती है, लेकिन उसका सामना होने पर प्राय: आलोचक बग़ल से निकल जाते हैं। नवल ने रचना के अन्तर्लोक में प्रवेश करते हुए उसके उस बृहत्तर सन्दर्भ को हमेशा याद रखा है, जिसमें ही कोई रचना अपनी सार्थकता अथवा प्रासंगिकता प्राप्त करती है। ‘निराला और मुक्तिबोध : चार लम्बी कविताएँ’ नामक उनकी यह आलोचना-पुस्तक हिन्दी कविता के मर्मग्राहियों के लिए निश्चय ही उपयोगी बनी रहेगी।
Carabiaee Deshon Mein Hindi-Shiksha Aur Suriname Hindi Parishad Ka Itihas
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

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Description:
विश्व के समुद्रतटीय देशों और द्वीपों में विदेशी सत्ताधारियों के द्वारा गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में ले जाए गए भारतीय पुरखों ने जीविका और जीवन का संघर्ष करते हुए भारतीयता और भारत की संस्कृति बनाए रखी। इसी के ज़रिए उन्होंने विदेश में स्वदेश रचाए रखा। भारतवंशियों के घरों के आँगन और अहातों में गड़ी हुई झंडियाँ, मन्दिरों में फहराती हुई पताकाएँ और अन्य जाति, धर्म के समुदायों के साथ आनन्ददायी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध सूरीनामी आप्रवासी भारतवंशियों की आत्मीयता की गाथा का गान करते हैं। संस्कृति भाषा से जन्म लेती है और भाषा संस्कृति से अपनी पहचान बनाती है। विश्व के आप्रवासी भारतवंशियों की मातृभाषा आज भी किसी-न-किसी रूप में हिन्दी है, जिनके रक्त में संस्कृति की शक्ति है, वे अपनी भावी पीढ़ियों को येन-केन-प्रकारेण हिन्दी सिखाना चाहते हैं।
विश्व के दक्षिणी-पश्चिमी गोलार्द्ध के कैरेबियाई देशों के भारतवंशियों की बोली-बानी सरनामी हिन्दी है जिसे सूरीनाम गयानी देशों के आप्रवासी भारतीयों ने तुलसी, कबीर और लोकगीतों के साहित्य के सहारे हिन्दुस्तानी अवधी हिन्दी के आधार पर रचा।
विदेशों में हिन्दी की बोलियों के रूप में पुरखों की स्मृतियाँ बची और बसी हुई हैं। सूरीनाम में बसे पुरखों की हिन्दीतर पीढ़ियों ने सरनामी हिन्दी द्वारा हिन्दी भाषा को बचाए रखने का संघर्ष किया। गत पच्चीस वर्षों में सूरीनाम हिन्दी परिषद की अहम भूमिका है जिसने नीदरलैंड में बस रहे सूरीनामी भारतवंशियों के भीतर भी हिन्दी भाषा और हिन्दुस्तानी संस्कृति के संस्कार बसाए। भाषा के ऐसे ऐतिहासिक कार्यकर्ताओं का इतिहास प्रस्तुत है, क्योंकि इतिहास बनानेवाले इतिहास नहीं लिखा करते हैं।
Ajneya Ke Samajik-Sanskritik Sarokar
- Author Name:
Dr. Krishna Dutt Paliwal
- Book Type:

- Description: सप्रसिद्ध आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की नई पुस्तक के आलोचनात्मक निबंधों में अज्ञेय के रचनाकर्म को लेकर हिंदी आलोचना में हुई तमाम साहित्यिक, गैर-साहित्यिक बहसों और साहित्य की, राजनीति की चर्चा करते हुए उस पर तर्कसंगत प्रश्न उठाए गए हैं। अज्ञेय के साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान को उद्घाटित करते हुए स्थापित किया गया है कि अज्ञेय के सृजन-चिंतन से किस तरह हिंदी आलोचना में बहसों की शुरुआत हुई तथा समकालीन साहित्य-संवेदना और साहित्यिक परंपरा के अध्ययन-मूल्यांकन की नई आलोचना-संस्कृति का विकास हुआ। अज्ञेय के निबंधों, भूमिकाओं, स्मरण-लेखों, यात्रा-साहित्य तथा उनके द्वारा आयोजित व्याख्यानमालाओं और यात्रा शिविरों में लेखकों, विद्वानों, कला-मर्मज्ञों के व्याख्यानों का अंतर्पाठ करते हुए इस पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार उन्होंने भारतीय समाज, हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को औपनिवेशिक आधुनिकता से मुक्त कराने और भारतीय आधुनिकता को दिशा प्रदान करने का प्रयास किया। अज्ञेय-साहित्य के अध्येताओं के लिए एक पठनीय पुस्तक।
Prarambhik Rachanayen
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के स्तम्भ हैं। उनके प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन में बहुत कुछ है जो अब तक लुप्त है। प्रस्तुत पुस्तक में उनके प्रारम्भिक लेखन की कुछ बानगी भर
है।नामवर सिंह ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत काव्य-लेखन से की थी। चौदह वर्ष की उम्र, यानी 1938 से उनका काव्यारम्भ हुआ। सबसे पहले वे ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया लिखते थे। 1941 ई. में वे बनारस अध्ययन करने आए और उनका सम्पर्क त्रिलोचन से हुआ। त्रिलोचन ने उन्हें खड़ी बोली में लिखने को उत्प्रेरित किया। उन्होंने 1941 ई. से अबाध गति से कविता लिखना शुरू किया। छन्दों पर निरन्तर अभ्यास करते गए और कविता-लेखन का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ, वह अविराम गति से 1957 ई. तक चला। फिर वह सदा के लिए बन्द हो गया।
1950 ई. तक उन्होंने विविध प्रकार की गद्य रचनाएँ लिखीं, जिनमें से 17 निबन्धों का एक संग्रह ‘बक़लम खुद’, नाम से 1951 ई. में प्रकाशित हुआ।
नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाओं का अपना एक अलग ही महत्त्व है। इनके द्वारा हम नामवर सिंह के साहित्यिक विकास की जड़ों को भी पहचान सकते हैं और उनके प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन के भाव-बोध एवं विचारों की भी पड़ताल कर सकते हैं।
नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाओं में कच्चापन नहीं मिलता। इसका कारण यह है कि विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने सघन साहित्य-साधना की थी। उनकी स्मरणशक्ति लाजवाब थी। बौद्धिक ओजस्विता से वे भरे हुए थे। इसीलिए बहुत कम उम्र में ही वे एक बौद्धिक ऊँचाई ग्रहण करते हैं। भारत यायावर ने नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाएँ संकलित कर एक सराहनीय कार्य किया है।
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