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Kavita Ka Prati Sansar

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रचना, आलोचना का अनिवार्य संदर्भ भी होती हैं और उसके लिए चुनौती भी । दोनो के बीच सम्बन्ध स्थित्यात्मक न होकर गत्यात्मक होता है । पूर्ववर्ती और सहवर्ती साहित्य प्रतिमानों के निर्धारण के लिए आलोचना को आमंत्रित करता है और अनुवर्ती साहित्य अक्सर पूर्वनिर्मित प्रतिमानों की अपर्याप्तता का बोध जगाता है । हर महत्वपूर्ण रचना मूल्यांकन के प्रतिमानों की उपलब्ध व्यवस्था के बीच से अपने लिए प्रासंगिक प्रतिमानों की तलाश ही नहीं कर लेती, बल्कि नए प्रतिमानों के लिए आधार भी प्रस्ता- वित करती है । प्रतिमानों के सस र में शाश्वत कुछ नहीं होता । इस वास्तविकता का अहसास आलो- चना को परमुखापेक्षी होने से बचाता है । 'कविता का प्रति संसार' रचनात्मक साहित्य वो संदर्भ की अनिवार्यता के अहसास से प्रेरित ऐसे ही आलोचनात्मक लेखों का सग्रह है । 'समय-समय' पर लिखे गए इन लेखों में निर्मला जैन ने गहरे सरो- कार के साथ प्रखर शैली में प्रतिमानों का प्रश्न भी उठाया हए और रचनाओं का विश्लेषण भी किया हैं । इन लेखों में वे मुद्दे उठाए गए हैं जो प्रतिमानों कं संदर्भ में अक्सर सामने आते हैं । साथ ही आधु- निक हिंदी कविता की विशिष्ट उपलब्धियों को सर्वथा मौलिक दृष्टि से देखा-परखा गया है । इस संकलन का प्रमुख आकर्षण विषय का विस्तार और प्रतिमानों की विविधता है । यह पुस्तक रचना और आलोचना की सही पहचान कराती है ।

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रचना, आलोचना का अनिवार्य संदर्भ भी होती हैं और उसके लिए चुनौती भी । दोनो के बीच सम्बन्ध स्थित्यात्मक न होकर गत्यात्मक होता है । पूर्ववर्ती और सहवर्ती साहित्य प्रतिमानों के निर्धारण के लिए आलोचना को आमंत्रित करता है और अनुवर्ती साहित्य अक्सर पूर्वनिर्मित प्रतिमानों की अपर्याप्तता का बोध जगाता है । हर महत्वपूर्ण रचना मूल्यांकन के प्रतिमानों की उपलब्ध व्यवस्था के बीच से अपने लिए प्रासंगिक प्रतिमानों की तलाश ही नहीं कर लेती, बल्कि नए प्रतिमानों के लिए आधार भी प्रस्ता- वित करती है । प्रतिमानों के सस र में शाश्वत कुछ नहीं होता । इस वास्तविकता का अहसास आलो- चना को परमुखापेक्षी होने से बचाता है ।

'कविता का प्रति संसार' रचनात्मक साहित्य वो संदर्भ की अनिवार्यता के अहसास से प्रेरित ऐसे ही आलोचनात्मक लेखों का सग्रह है । 'समय-समय' पर लिखे गए इन लेखों में निर्मला जैन ने गहरे सरो- कार के साथ प्रखर शैली में प्रतिमानों का प्रश्न भी उठाया हए और रचनाओं का विश्लेषण भी किया हैं । इन लेखों में वे मुद्दे उठाए गए हैं जो प्रतिमानों कं संदर्भ में अक्सर सामने आते हैं । साथ ही आधु- निक हिंदी कविता की विशिष्ट उपलब्धियों को सर्वथा मौलिक दृष्टि से देखा-परखा गया है । इस संकलन का प्रमुख आकर्षण विषय का विस्तार और प्रतिमानों की विविधता है । यह पुस्तक रचना और आलोचना की सही पहचान कराती है ।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
1994
Weight
262 grams
ISBN-13
9788171191802
Pages
123
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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