Hindi Upanyas Ek Antaryatra
Author:
Ramdarash MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Available
हिन्दी उपन्यास अभी अपनी यात्रा के सौ वर्ष भी पूर्ण नहीं कर सका है, किन्तु इतने ही दिनों में वह जीवन यथार्थ के इतने मोड़ों और विषम धरातलों से गुजरा है कि उसे ‘आधुनिक जीवन का आईना’ कहा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक उपन्यास-यात्रा की एक अन्तर्यात्रा है। यह बहुत-सी छोटी-मोटी पुस्तकों की तरह धरातल पर दिखाई पड़ने वाली घटनाओं, श्रेणीबद्ध चरित्र-चित्रणों, संस्थागत विचारों और रूढ़ शिल्प-चर्चाओं के ब्योरे में नहीं भटकी है, यह तो यात्रा की भीतरी चेतनाओं, सामाजिक और मानसिक सत्यों के सन्दर्भों में उभरते विविध मोड़ों और गतियों को पकड़ने के प्रयत्न में रही है। इसीलिए इसमें उपन्यास की गतियों, मोड़ों और चेतनाओं तथा उन्हें निर्मित या प्रभावित करनेवाली परिस्थितियों का निरीक्षण तो किया ही गया है, साथ-ही-साथ विशिष्ट कृतियों की निजी सौन्दर्य-चेतना को भी संश्लिष्ट रूप में रखने का प्रयास है। निजी सौन्दर्य-चेतना के अभाव में कृतियाँ कृतियाँ न रहकर सामाजिक या मनोवैज्ञानिक सत्यों का दस्तावेज बन जाती हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इसलिए बहुत से ऐसे चर्चित मोटे-मोटे उपन्यास नहीं लिए गए हैं जो सौन्दर्य-चेतना के अभाव में विशिष्ट सृजन नहीं बन सके हैं। सीमित आकार के नाते भी प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे अनेक उपन्यासों को छोड़ना पड़ा है जिनकी चर्चा की जा सकती तो अच्छा रहता, किन्तु किसी धारा में प्रमुख योगदान न दे सकने या निजी तौर पर विशिष्टतर उपलब्धि न प्राप्त कर सकने के कारण जिनका अचर्चित रह जाना विशेष महत्त्व नहीं रखता। लेखक की अन्तर्दृष्टि हिन्दी उपन्यास के संश्लिष्ट व्यक्तित्व और उसकी चेतना-यात्रा को पहचानने में सफल हुई है। यह पुस्तक अपने सीमित आकार में भी समग्र और प्रभावशाली है।
ISBN: 9788126714957
Pages: 279
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: साहित्य और भारतीय एकता’ (निट् इंडिया थ्रू लिटरेचर) एक वृहत् आयोजन है। यह पुस्तक इस आयोजन का प्रथम खंड है, जिसे तमिल और अंग्रेज़ी के बाद अब हिन्दी में अनूदित किया गया है। ‘साहित्य और भारतीय एकता’ के माध्यम से लेखिका शिवशंकरी भारतीय संस्कृति तथा साहित्य के आधार पर देशवासियों को आपस में जोड़ना चाहती हैं। इस महान उद्यम की सफलता के लिए उन्होंने देश के अनेक प्रान्तों का भ्रमण किया, अनेक कलात्मक और सांस्कृतिक रूपों का अध्ययन किया, सम्बद्ध भारतीय भाषाओं के समृद्ध साहित्य का गहन अनुसंधान भी किया; साथ ही प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध अनेक प्रमुख लेखक-लेखिकाओं के साथ साक्षात्कार भी किए, हर भाषा की उत्कृष्ट प्रतिनिधि साहित्यिक रचनाओं का चयन किया और इनका अति उत्तम भाषान्तर भी करवाया। लेखिका के यात्रा-संस्मरणों, साक्षात्कारों और प्रत्येक भाषा से सम्बद्ध साहित्यिक विचारों के इस समायोजन से प्रकट होती है एक अखंड एकता, साथ ही हमारे लेखकों और कवियों के द्वारा अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किए जानेवाले वह विचार भी इसमें शामिल हैं जो हमारे देश के सामने स्थित उग्र समस्याओं को रेखांकित करते हैं, जैसे—ग़रीबी, अज्ञान, वर्ग, वर्ण एवं स्त्री-पुरुष का भेदभाव, आधुनिकता की चुनौतियाँ, धार्मिक पुनरुत्थान, कट्टरवाद, अन्धविश्वास तथा असहिष्णुता, नैतिकता के प्रति अनादर, हिंसा एवं गांधी जी के मूल्यों का क्षरण। लेखिका का विश्वास है कि इस आयोजन के द्वारा लेखक अपनी रचनाओं के साथ बृहत् पाठक-समुदाय तक पहुँचकर इन समस्याओं के उन्मूलन में अपना योगदान कर पाएँगे। इस खंड में शिवशंकरी ने दक्षिण भारत पर ध्यान केन्द्रित करते हुए केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों एवं उनके साहित्य का अवलोकन किया है। इस खंड में समाहित 27 साक्षात्कार, लेखकों की साहित्यिक कृतियों के 25 उत्कृष्ट उद्धरण और उनमें व्यक्त विचार दक्षिण भारत में सृजनरत मनीषा का एक विश्वसनीय ब्योरा हिन्दी पाठकों के सम्मुख उपलब्ध कराएँगे।
Siddh Sahitya
- Author Name:
Dharmveer Bharti
- Book Type:

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Description:
बौद्ध-सिद्धों और पत्रों की सामाजिक स्थिति में भी एक बहुत बडा अन्तर आ चुका था। 8वीं शताब्दी में तांत्रिक आन्दोलनों के अध्ययन से प्रतीत होता था कि सारे देश में संकीर्ण जाति-व्यवस्था और शुद्धतावादी अमीर-पद्धति के विरुद्ध एक व्यापक विद्रोह जाग उठा था और निम्न वर्ग की जातियाँ उस समय सशक्त और जागरूक थीं।
अत: एक ओर ये सन्त एक पराजित और सामाजिक अन्य से पीड़ित वर्ग के प्रतीक थे, दूसरी ओर ये तांत्रिक विद्रोह के खोखलेपन से भी परिचित थे और तीसरी ओर यवनों की मज़हबी कट्टरता का भी स्वागत नहीं कर पाते थे और चौथी ओर वैष्णव भज-साधना के प्रति आकर्षित होते हुए भी उनके अवतारवाद को ये तर्कसम्मत नहीं मानते थे। सिद्ध-साहित्य का यह अध्ययन एक ओर उन कई जटिलताओं का समाधान करता है जो अभी तक पत्रों और नाथयोगियों के अध्ययन में बाधक सिद्ध होती रही है, दूसरी ओर वह अनादिकाल और मध्यकाल के सर्वथा नए मूल्यांकन के लिए एक भूमिका भी प्रस्तुत करता है।
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