Hindi Upanyas Ek Antaryatra
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Author:
Ramdarash MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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हिन्दी उपन्यास अभी अपनी यात्रा के सौ वर्ष भी पूर्ण नहीं कर सका है, किन्तु इतने ही दिनों में वह जीवन यथार्थ के इतने मोड़ों और विषम धरातलों से गुजरा है कि उसे ‘आधुनिक जीवन का आईना’ कहा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक उपन्यास-यात्रा की एक अन्तर्यात्रा है। यह बहुत-सी छोटी-मोटी पुस्तकों की तरह धरातल पर दिखाई पड़ने वाली घटनाओं, श्रेणीबद्ध चरित्र-चित्रणों, संस्थागत विचारों और रूढ़ शिल्प-चर्चाओं के ब्योरे में नहीं भटकी है, यह तो यात्रा की भीतरी चेतनाओं, सामाजिक और मानसिक सत्यों के सन्दर्भों में उभरते विविध मोड़ों और गतियों को पकड़ने के प्रयत्न में रही है। इसीलिए इसमें उपन्यास की गतियों, मोड़ों और चेतनाओं तथा उन्हें निर्मित या प्रभावित करनेवाली परिस्थितियों का निरीक्षण तो किया ही गया है, साथ-ही-साथ विशिष्ट कृतियों की निजी सौन्दर्य-चेतना को भी संश्लिष्ट रूप में रखने का प्रयास है। निजी सौन्दर्य-चेतना के अभाव में कृतियाँ कृतियाँ न रहकर सामाजिक या मनोवैज्ञानिक सत्यों का दस्तावेज बन जाती हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इसलिए बहुत से ऐसे चर्चित मोटे-मोटे उपन्यास नहीं लिए गए हैं जो सौन्दर्य-चेतना के अभाव में विशिष्ट सृजन नहीं बन सके हैं। सीमित आकार के नाते भी प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे अनेक उपन्यासों को छोड़ना पड़ा है जिनकी चर्चा की जा सकती तो अच्छा रहता, किन्तु किसी धारा में प्रमुख योगदान न दे सकने या निजी तौर पर विशिष्टतर उपलब्धि न प्राप्त कर सकने के कारण जिनका अचर्चित रह जाना विशेष महत्त्व नहीं रखता। लेखक की अन्तर्दृष्टि हिन्दी उपन्यास के संश्लिष्ट व्यक्तित्व और उसकी चेतना-यात्रा को पहचानने में सफल हुई है। यह पुस्तक अपने सीमित आकार में भी समग्र और प्रभावशाली है।
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हिन्दी उपन्यास अभी अपनी यात्रा के सौ वर्ष भी पूर्ण नहीं कर सका है, किन्तु इतने ही दिनों में वह जीवन यथार्थ के इतने मोड़ों और विषम धरातलों से गुजरा है कि उसे ‘आधुनिक जीवन का आईना’ कहा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक उपन्यास-यात्रा की एक अन्तर्यात्रा है। यह बहुत-सी छोटी-मोटी पुस्तकों की तरह धरातल पर दिखाई पड़ने वाली घटनाओं, श्रेणीबद्ध चरित्र-चित्रणों, संस्थागत विचारों और रूढ़ शिल्प-चर्चाओं के ब्योरे में नहीं भटकी है, यह तो यात्रा की भीतरी चेतनाओं, सामाजिक और मानसिक सत्यों के सन्दर्भों में उभरते विविध मोड़ों और गतियों को पकड़ने के प्रयत्न में रही है। इसीलिए इसमें उपन्यास की गतियों, मोड़ों और चेतनाओं तथा उन्हें निर्मित या प्रभावित करनेवाली परिस्थितियों का निरीक्षण तो किया ही गया है, साथ-ही-साथ विशिष्ट कृतियों की निजी सौन्दर्य-चेतना को भी संश्लिष्ट रूप में रखने का प्रयास है। निजी सौन्दर्य-चेतना के अभाव में कृतियाँ कृतियाँ न रहकर सामाजिक या मनोवैज्ञानिक सत्यों का दस्तावेज बन जाती हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इसलिए बहुत से ऐसे चर्चित मोटे-मोटे उपन्यास नहीं लिए गए हैं जो सौन्दर्य-चेतना के अभाव में विशिष्ट सृजन नहीं बन सके हैं। सीमित आकार के नाते भी प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे अनेक उपन्यासों को छोड़ना पड़ा है जिनकी चर्चा की जा सकती तो अच्छा रहता, किन्तु किसी धारा में प्रमुख योगदान न दे सकने या निजी तौर पर विशिष्टतर उपलब्धि न प्राप्त कर सकने के कारण जिनका अचर्चित रह जाना विशेष महत्त्व नहीं रखता। लेखक की अन्तर्दृष्टि हिन्दी उपन्यास के संश्लिष्ट व्यक्तित्व और उसकी चेतना-यात्रा को पहचानने में सफल हुई है। यह पुस्तक अपने सीमित आकार में भी समग्र और प्रभावशाली है।
Book Details
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ISBN9788126714957
-
Pages279
-
Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जब मैं बैंक में काम करता था, एक भिखारी था जो थोड़े अन्तराल से बैंक आता और रोकड़िया के काउंटर पर जाकर बहुत सारी चिल्लर अपनी थैली से उलट देता, फिर अपनी अंटी से, कभी अपनी आस्तीन से तुड़े-मुड़े नोट निकालकर एक छोटी-सी ढेरी लगा देता। कहता, इसे जमा कर लीजिए। उसके आने से मज़ा आता, आश्चर्य भी होता और एक क़िस्म की खीज भी होती—उन नोटों और गन्दी-सी चिल्लर को गिनने में। उस रोकड़िया जैसी ही स्थिति मेरी भी होती है जब समय-समय पर लिखी गई, छोटी-बड़ी टिप्पणियों को जमा कर उनकी किताब बनाने लगता हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में लेकिन भिखारी भी मैं ही हूँ और रोकड़िया भी। सारी चिल्लर और नोट गिन लिए जाते तब पता लगता कि राशि कम नहीं हैं—कुल जमा काफ़ी अच्छा-ख़ासा है। ऐसा आश्चर्य कभी-कभी मुझे भी होता है। पृष्ठ गिनने लगता हूँ तो लगता है कि बहुत कुछ जमा हो गया है। सब कुछ चोखा नहीं है, कुछ खोटे सिक्के और फटे हुए नोट भी हैं।
इस दूसरी नोटबुक में इतना ही फ़र्क़ है कि इसमें गद्य की कुछ किताबों पर गाहे-बगाहे लिखी गई टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है। पहली नोटबुक के फ़्लैप पर मैंने कहा था कि लिखने के सारे कौशल सिर्फ़ रचनाकार की क्षमताओं से ही पैदा नहीं होते हैं, कई बार वह अक्षमताओं से भी जन्म लेते हैं। ये नोट्स और टिप्पणियाँ मेरी क्षमताओं के बनिस्बत मेरी अक्षमताओं से ज़्यादा पैदा हुई हैं।
मुझे लगता था कि बाज़ार हिन्दी की कविता का कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि न तो इस क्षेत्र में अधिक पैसा है, न ही कीर्ति के कोई बहुत बड़े अवसर ही हैं। पर मैं ग़लत था। बाज़ार एक प्रवृत्ति है। इसका ताल्लुक़ अवसर, पैसे या कीर्ति से नहीं है। हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य जिस तरह के घमासान और निरर्थक विवादों से भरा नज़र आ रहा है, वह बाज़ार के ही प्रभाव का परिणाम है। विगत तीन दशकों की कविता का जैसा मूल्यांकन होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। ‘आलोचना’ से यह उम्मीद तब तक निरर्थक ही होगी जब तक कि कवि स्वयं इस दृश्य के मूल्यांकन की कोशिश नहीं करेंगे। यही हालत गद्य की भी है, विशेष रूप से कहानी और उपन्यास की। उसमें हल्ला अधिक है, सार्थक विमर्श और साफ़ बोलनेवाली आलोचना कम। आलोचना का एक बड़ा हिस्सा या तो उजड्डता और अहंकार से भरा है या ‘अहो रूपम् अहो ध्वनि’ के शोर से। एक कवि और कथाकार ही इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उसी की ज़रूरत है।
—राजेश जोशी
Bhasha Aur Samaj
- Author Name:
Ramvilas Sharma
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Description:
भाषा और समाज सरीखे अत्यन्त गहन विषय पर डॉ. रामविलास शर्मा का यह एक महत्त्वपूर्ण मौलिक ग्रन्थ है। इसमें सामाजिक विकास के सन्दर्भ में भाषा के विकास का अध्ययन करते हुए भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र की अनेक मान्यताओं का गहन विद्वत्ता के साथ खंडन-मंडन किया गया है। सैद्धान्तिक विवेचन के अलावा इसमें भाषा-सम्बन्धी अनेक व्यावहारिक समस्याओं का भी विवेचन है। उदाहरण के लिए, भारत की राजभाषा और राष्ट्रभाषा की समस्या, अहिन्दीभाषी प्रदेशों में असन्तोष के कारण, क्या भारत की सभी भाषाएँ राजभाषा बनेंगी? क्या अंग्रेज़ी विश्वभाषा है और उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता?—आदि प्रश्नों पर भी इसमें प्रकाश डाला गया है।
यह पुस्तक न केवल भाषाविज्ञान का शास्त्रीय अध्ययन करनेवालों के लिए, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी है, जो इन समस्याओं में गहरी दिलचस्पी रखते हैं।
Kaalyatri Hai Kavita
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
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- Description: सुपरिचित आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा हिन्दी कविता की यह काल-यात्रा विशेष महत्त्व रखती है। कोई रचना इतिहास के दौर में क्या रूप लेती है और मानवीय संवेदन की अन्तर्धारा उसमें किन माध्यमों से परिचालित होती है, इसकी प्रामाणिक और गहरी समझ डॉ. श्रोत्रिय को थी। अक्सर इतिहास के कालबोध की परवर्ती दृष्टि के दौर में लोग अतीत की परिस्थितियों और कवि-सीमाओं को उपेक्षित कर जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसा आवश्यक लचीलापन है, जिससे यह अतीत को जहाँ आधुनिकता की सार्थकता में देख सकी है, वहीं युग और कवि सीमा को भी संवेदित परकाय-प्रवेश की भाँति अपने मौलिक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर सकी है। इससे कविता इतिवृत्त नहीं रहती, बल्कि वह आगामी काल-प्रवाह में सक्रिय और प्रेरक साझीदार प्रतीत होती है। अपने समय की नवीनतम काव्य-प्रवृत्तियों को भी लेखक ने गहराई से पकड़ा है, तभी वह आदिकाल से लेकर सातवें, आठवें और नवें दशक तक के विभिन्न कविता-दौरों पर समान रूप से विचार कर सका है। यही नहीं, इस संस्करण के लिए पुस्तक को संशोधित करते हुए डॉ. श्रोत्रिय ने दो नए अध्याय भी जोड़े थे। इनमें से एक है ‘भारतीय साहित्य की परम्परा’ और दूसरा, ‘नवाँ दशक : बदलाव की नई पहल’। लम्बी कविता और हिन्दी-नवगीत पर पहले से ही दो अध्याय पुस्तक में हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ. श्रोत्रिय की यह आलोचना-कृति हिन्दी कविता का एक व्यापक और मूल्यवान अध्ययन है और मनुष्यता के चिर उपेक्षित हिस्से की पीड़ाओं को काव्य-साहित्य की प्रमुख मानवीय चिन्ताओं में शामिल करने का आग्रह करती है।
Hindi : Kuchh Nai Chunotiya
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
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Description:
सुप्रसिद्ध कथाकार, ललित निबन्धकार डॉ. विवेकीराय अपनी एक सुप्रसिद्ध पुस्तक में
लिखते हैं कि—“डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय का लेखन गम्भीर विषयों का स्पर्श करता है। आप मूलत: भाषा-
वैज्ञानिक हैं।” ज़ाहिर है, कोई भी भाषा-वैज्ञानिक किसी भी भाषा पर निरपेक्ष दृष्टि से विचार करता है। डॉ.
पाण्डेय ने भी इस पुस्तक में वही किया है। इनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के कारण कुछ समय के
लिए हिन्दी भले ही फलकजद हो जाए, किन्तु तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के बावजूद आज भी यह इस देश
के बहुत बड़े जन समुदाय की लचीली और उदार भाषा है।
विस्तारवादी अंग्रेज़ी की अफ़ीम फाँक उसमें ऊभने-चूभनेवाले भले ही हिन्दी को ख़ालिस देसी और निठल्ली-
पिछड़ी, गँवारू-अवैज्ञानिक भाषा घोषित करने की मुनादी करें, पर यह सच है कि अपनी ताक़त के बल पर
इसने नई बन रही दुनिया में अपनी पुख़्ता और मुकम्मल जगह बना ली है। सच तो यह है कि हिन्दी ही
नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा को आज अमेरिका की भूमंडलीय शक्ति और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी तथा
पूँजीवादी व्यवस्था की पोषक, संवेदना-रहित अंग्रेज़ी से जूझना पड़ रहा है। इस आयातित विदेशी भाषा के
साथ कई तरह के क्रूर और अनैतिक सम्बन्धों के अंधड़ भी इस देश में आ गए हैं। यही समय-समय पर
हिन्दी से ताल ठोंक उसे चुनौती देते रहते हैं। अत: ऐसी स्थिति में आज ज़रूरत है, हमें यह सोचने की, कि
स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर तेज़ आवर्त्त वाली भाषा हिन्दी का
स्वरूप कैसे बचा रह सके?
Rashtrakavi Kuvempu
- Author Name:
Prabhushankara
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- Description: English translation by H S Komalesha of Prabhushankara's Kannada monograph.
'Jhansi Ki Rani' Ka Tulanatmak Anusheelan
- Author Name:
Richa Dwivedi
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Description:
ऐतिहासिक घटनाओं या चरित्रों पर उपन्यास लेखन कल्पना के तत्त्वों के बिना सम्भव नहीं है लेकिन यही वह चीज़ है जो उपन्यासकार की दृष्टि और सामर्थ्य का भी पता देती है। उपन्यास मूलत: एक ललित विधा है जिसे पाठक सूचनाओं और ज्ञान के लिए नहीं मन-रंजन के लिए पढ़ता है और उससे चेतना के स्तर पर समृद्ध होता है। ऐतिहासिक उपन्यास इस स्तर पर अपने पाठक से कुछ भिन्न अपेक्षाएँ रखता है। वह उससे इतिहास को लेकर जागरूकता भी चाहता है।
ऐतिहासिक उपन्यास लिखते समय लेखक सूचनाओं को अपनी कथा में कैसे पिरोता है, यही शैली उस कृति की श्रेष्ठता को तय करती है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को लेकर संयोग से दो बड़े लेखकों द्वारा लिखे गए उपन्यास हमारे पास हैं और दोनों अपनी प्रस्तुति, अपनी शैली और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग की नितान्त भिन्न शैली अपनाते हैं। एक को लिखा है हिन्दी के बहुपठित ऐतिहासिक उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा ने तो दूसरे को बांग्ला में जन-संघर्षों की कथाएँ लिखनेवाली महाश्वेता देवी ने जिसका हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित है।
यह पुस्तक इन दोनों उपन्यासों में इतिहास की प्रस्तुति का तुलनात्मक अध्ययन है। इस शोध का प्रस्थान-बिन्दु यह धारणा है कि एक ही ऐतिहासिक घटना से सम्बन्धित कलात्मक सच समान हो, यह ज़रूरी नहीं। उनमें समरूपता सम्भव है एकरूपता नहीं। यही बात इन दोनों उपन्यासों के अध्ययन से स्पष्ट होती है। वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यास में जहाँ लालित्य प्रधान है, वहीं महाश्वेता जी ने तथ्यात्मकता पर ज़ोर दिया है। वर्मा जी हमें कथा में बहाए लिए जाते हैं और महाश्वेता जी का उपन्यास हमें ऐतिहासिक तथ्यों के साथ लगातार जगाए रहता है। उसमें एक वस्तुनिष्ठता है।
यह पुस्तक इन दोनों कृतियों का सांगोपांग अध्ययन है।
Samajik Vimarsh ke Aaine Mein 'Chaak'
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
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Description:
रेशम विधवा थी—ज़माने के लिए, रीति-रिवाजों के लिए, शास्त्र-पुराणों के चलते घर और गाँव के लिए। विधवा सिर्फ़ विधवा होती है, वह औरत नहीं रहती—फिर यह बात पता नहीं उसे किसी ने समझाई कि नहीं? और रेशम ने, विधवा रेशम ने गर्भ धारण कर लिया। मगर जब सास ने कौड़ी-सी आँखें निकालकर उसे देखा, यह कहते हुए—‘मेरे बेटा की मौत से दगा करनेवाली, हरजाई, बदकार तेरा मुँह देखने से नरक मिलेगा’, तो रेशम ने कहा—‘आज को तुम्हारा बेटा मेरी जगह होता तो पूछती कि तू किसके संग सोया था?...तुम ख़ुश हो रही होतीं कि पूत की उजड़ी ज़िन्दगी बस गई। पर मेरा फजीता करने पर तुली हो।’
उपन्यास के शुरुआती पृष्ठों पर ही सास और गर्भवती विधवा बहू के बीच यह दृश्य खड़ा कर मैत्रेयी ने पहली बार स्त्री की निगाह से देखने की पहल की है। अन्तत: हिन्दी आलोचना का चला आता सामाजिक व्याकरण यहाँ अचकचा उठता है और आलोचकों को अपना परम्परागत सामाजिक ऑनर याद आने लगता है, जिन्होंने घर-परिवार के घिसे-पिटे और सामाजिक जीवन में लाई जानेवाली फ़ॉर्मूलाई तरक़़ीबों और क्रान्तिभ्रष्ट क्रान्तियों के यथार्थ को अपने किसी साफ़-सुथरे और दिखावटी सच की तरह अब तक पाल-पोस रखा था। मैत्रेयी का लेखन नए सिरे से पढ़ने की ज़मीन तैयार करता है। यह भी पूछने का मन बनाता है कि महादेवी, तुम नीर और भरी दु:ख की बदली क्यों हो? क्यों इस विस्तृत नभ का कोई एक कोना भी तुम्हारा अपना नहीं है? क्या किसी आलोचक ने इसके सामाजिक-आर्थिक आशयों और आधारभूत ज़मीनी सच्चाइयों पर बात करना ज़रूरी माना? मैत्रेयी इस अर्थ में एक समर्पणशील विनयी लेखिका नहीं हैं। उनकी बनावट में यह है ही नहीं। किसी भी क़दम पर वे गुड़िया बनने को तैयार नहीं हैं। ‘चाक’ इस सम्बन्ध में उनके लेखन का घोषणा-पत्र भी है और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी। यही इसका अन्तरंग चरित्र और औपन्यासिक शील भी है।
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