Kedarnath Singh Ki Kavita
(0)
Author:
A. ArvindakshanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
495
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जीवनानुभव का विस्तार केदार जी की कविताओं की खासियत है। उनकी कविता हमारे भीतर उत्खनन का काम करती है और अपनी एक दुनिया भी सृजित करती है। उस दुनिया में हमारा प्रवेश तो आसानी से हो जाता है क्योंकि वह हमारी चिरपरिचित दुनिया है। प्रवेश के बाद की स्थिति सरल नहीं है। उनकी कविता के भीतर कई प्रतिध्वनियाँ होती हैं; ध्वनियों और प्रतिध्वनियों का वह एक जटिल संकुल है। उनमें एक समय नहीं बल्कि समय की बहुलता है।</p> <p>साधारण अर्थ में यह सही है कि उनकी कविताएँ राजनीति के रंग-रूपों के अनुसरण में नहीं लिखी गई हैं। सम्भवतः यह उनका मकसद भी नहीं था। मनुष्य का जीवन, हमारा समय, समय की जटिलताएँ, हमारा स्वत्व, हमारा लोकजीवन, आदि-आदि उनकी कविता में विषय के रूप में आते हैं जिनमें प्रकटतः राजनीति का प्रवेश नहीं है। लेकिन इन्हीं प्रसंगों के अपने राजनीतिक आशय भी हैं। इस अर्थ में केदार जी की कविताएँ सूक्ष्मतम स्तर पर राजनीतिक हैं।</p> <p>उनकी कविताओं का संस्कृति-पाठ ही दरअसल अनिवार्य रूप से होना है। समय-समय पर उनकी कविताएँ अपसंस्कृति के रूपकों को अवतरित करती रही हैं। अपसंस्कृति के रूपकों का यह अवतरण अपने-आप में कविता में प्रतिरोध का एक सुदृढ़ अन्तस्थल सृजित करता है। उनके यहाँ प्रतिरोध की मुखरता मुख्य नहीं है बल्कि प्रतिरोध की अन्तर्धाराएँ मुख्य हैं। यह पुस्तक उनकी कविताओं के ऐसे ही सूक्ष्म तन्तुओं को पकड़ने के प्रयास का फल है।
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जीवनानुभव का विस्तार केदार जी की कविताओं की खासियत है। उनकी कविता हमारे भीतर उत्खनन का काम करती है और अपनी एक दुनिया भी सृजित करती है। उस दुनिया में हमारा प्रवेश तो आसानी से हो जाता है क्योंकि वह हमारी चिरपरिचित दुनिया है। प्रवेश के बाद की स्थिति सरल नहीं है। उनकी कविता के भीतर कई प्रतिध्वनियाँ होती हैं; ध्वनियों और प्रतिध्वनियों का वह एक जटिल संकुल है। उनमें एक समय नहीं बल्कि समय की बहुलता है।</p>
<p>साधारण अर्थ में यह सही है कि उनकी कविताएँ राजनीति के रंग-रूपों के अनुसरण में नहीं लिखी गई हैं। सम्भवतः यह उनका मकसद भी नहीं था। मनुष्य का जीवन, हमारा समय, समय की जटिलताएँ, हमारा स्वत्व, हमारा लोकजीवन, आदि-आदि उनकी कविता में विषय के रूप में आते हैं जिनमें प्रकटतः राजनीति का प्रवेश नहीं है। लेकिन इन्हीं प्रसंगों के अपने राजनीतिक आशय भी हैं। इस अर्थ में केदार जी की कविताएँ सूक्ष्मतम स्तर पर राजनीतिक हैं।</p>
<p>उनकी कविताओं का संस्कृति-पाठ ही दरअसल अनिवार्य रूप से होना है। समय-समय पर उनकी कविताएँ अपसंस्कृति के रूपकों को अवतरित करती रही हैं। अपसंस्कृति के रूपकों का यह अवतरण अपने-आप में कविता में प्रतिरोध का एक सुदृढ़ अन्तस्थल सृजित करता है। उनके यहाँ प्रतिरोध की मुखरता मुख्य नहीं है बल्कि प्रतिरोध की अन्तर्धाराएँ मुख्य हैं। यह पुस्तक उनकी कविताओं के ऐसे ही सूक्ष्म तन्तुओं को पकड़ने के प्रयास का फल है।
Book Details
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ISBN9788119133604
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>प्रस्तुत पुस्तक में प्रसिद्ध कवि-आलोचक डॉ. विश्वनाथप्रसाद तिवारी ने आधुनिक हिन्दी कविता के तेरह प्रमुख कवियों—मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, हरिवंशराय बच्चन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, नरेन्द्र शर्मा और स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की कविताओं का विश्लेषण-मूल्यांकन किया है। उपर्युक्त कवियों के काव्य का यह अध्ययन अपने संक्षिप्त रूप में विराट विस्तार को समेटने वाला है। बूँद में समुद्र की तरह। यह उन कवियों की मुख्य काव्य-विशेषताओं को उद्घाटित करता है, साथ ही एक लम्बी कालावधि की काव्य प्रवृत्तियों को भी। पुस्तक में किसी प्रकार का पूर्वग्रह नहीं है, न उखाड़-पछाड़ वाली दृष्टि। लेखक ने पूरी तरह सन्तुलित-तटस्थ दृष्टि से सहृदयता के साथ कवियों के काव्यानुभव और उनकी काव्यभाषा की समीक्षा की है। अवश्य ही यह पुस्तक पाठकों का ध्यान सही निष्कर्षों की ओर आकृष्ट करेगी।</p> <p>इस पुस्तक से हिन्दी कविता के कुछ अत्यन्त विशिष्ट कवियों के माध्यम से कविता के एक महत्वपूर्ण युग की उपलब्धियों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलेगी। इसमें सन्देह नहीं कि आकार में यह लघु पुस्तक साहित्य के अध्येताओं के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।</p>
Yashpal Ke Nibandh : Vol. 1-2
- Author Name:
Yashpal
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Description:
भारत की स्वाधीनता के लिए प्राणों को हथेली पर रखकर चलनेवाले, चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह के साथी, क्रान्तिकारी यशपाल जी का शोषण-मुक्त समाज और निजी स्वामित्व के ख़ात्मे पर आजीवन अटल विश्वास रहा है। इस खंड में संकलित ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’, ‘रामराज्य की कथा’, ‘मार्क्सवाद’, ‘देखा सोचा समझा’ और ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में उनके इन विचारों की सतर्क और सजग झलक ही नहीं भारतीय समाज के भिन्न वर्गों और जातियों की गहरी समझ तथा दुनिया में हो रहे सामाजिक-आर्थिक और वैचारिक परिवर्तनों की ध्वनि-प्रतिध्वनि निरन्तर सुनाई देती है।
‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ में शोषण में निरीहता, अहिंसा और दरिद्र नारायण की सेवा आदि सिद्धान्तों का मूल्यांकन करते हुए कहा गया है कि ‘गांधीवाद जनता की मुक्ति, सामन्तकालीन घरेलू उद्योग-धन्धों और स्वामी-सेवक के सम्बन्ध की पुन: स्थापना में समझता है जो इतिहास की क़ब्र में दफ़न हो चुकी हैं। मुर्दा व्यवस्थाएँ और आदर्श समाज को विकास की ओर ले जाने का काम नहीं कर सकते। उनका उपयोग, उन्हें समाप्त कर देनेवाले कारणों को समझने के लिए या उनकी शव-परीक्षा के लिए ही हो सकता है।’ ‘रामराज्य की कथा’ में गांधी जी की ‘रामराज्य’ की कल्पना और उसके व्यावहारिक रूप के अध्ययन के साथ ही साथ रामराज्य के समता, न्याय और अहिंसा जैसे मूल्यों के माध्यम से जनता के शोषण की व्याख्या की गई है। ‘मार्क्सवाद’ में सेंट साइमन, ओवेन आदि सन्त साम्यवादियों के विचारों के साथ मार्क्स के विचारों और सिद्धान्तों की व्याख्या की गई है तथा अन्य राजनैतिक सिद्धान्तों से उसके अन्तर को स्पष्ट किया गया है। ‘देखा सोचा समझा’ में नैनीताल, कुल्लूमनाली आदि यात्रा-वर्णनों के साथ-साथ समकालीन साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का विश्लेषण भी है। ‘बीबी जी कहती हैं, मेरा चेहरा रोबीला है’ में व्यंगात्मक निबन्धों के माध्यम से भी हिंसा-अहिंसा आदि के साथ अपने समय को परिभाषित करने का प्रयत्न मार्क्सवाद की दृष्टि से किया गया है।
यशपाल के इन निबन्धों में उनके युग के राजनैतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकारों से सम्बद्ध तेज़ बहसों और विवादों की झलक मिलती है। ये निबन्ध एक सर्जक की गहरी निष्ठा और व्यावहारिक समझ से विकसित हैं। दलित, शोषित और पीड़ित के प्रति गहरे लगाव के कारण वे गांधीवाद, मार्क्सवाद आदि सब कुछ को उन कारणों के परिवर्तन की दृष्टि से आँकते हैं जो ग़रीबी और शोषण के कारण हैं। इन निबन्धों में ऐतिहासिकता के साथ-साथ समकालीनता भी है। इन निबन्धों से यशपाल और उनके समय को समझने में मदद मिलती है। जो लोग इन्हें गांधीवाद और मार्क्सवाद की दृष्टि से पढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी आज के सन्दर्भ के कारण इनकी ताक़तों और कमज़ोरियों का पता चलेगा, क्योंकि इनमें प्रस्तुतीकरण ही नहीं, विश्लेषण है। इन सब में कसौटी शोषित वर्ग की भौतिक स्थितियों और उनके कारणों का बना रहना या बदलना ही है।
Mopala Kand Arthat Mujhe Usse Kya?
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
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- Description: Awating description for this book
Ek Kavi Ki Note Book
- Author Name:
Rajesh Joshi
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Description:
कला या लिखने की सारी तरकीबें कलाकार या रचनाकार की सृजनात्मक क्षमताओं
और कौशल से ही हमेशा पैदा नहीं होतीं, कई रचनाकार ऐसे होते हैं जो हमेशा लिखने से बचने की
कोशिश करते रहते हैं। रचना जब भी उनकी खोपड़ी पर सवार हो जाती है या लिखने की बाध्यता
उनके सामने आ खड़ी होती है, वे इससे बचने के लिए बहाने खोजने लगते हैं। यह एक त्रासदायक
स्थिति है। इसमें बचने और लिखने का एक विकट द्वन्द्व चलता रहता है। गद्य लिखना मेहनत का
काम है। व्यवस्थित गद्य लिखना तो और भी ज़्यादा। उसके लिए जैसा व्यवस्थित अध्ययन और
जमकर बैठने की तैयारी एक लेखक की होनी चाहिए, वह मेरी कभी नहीं रही। मैं हमेशा ही एक बैक
बेंचर छात्र रहा हर जगह, जो क्लासरूम में बैठने के बजाय कैंटीन में बैठकर गप्पों में अपना समय
बिताना पसन्द करता रहा। इसलिए जो भी और जब भी लिखा टुकड़ों-टुकड़ों में लिखा। उन्हें डायरियाँ
भी कहना मुनासिब नहीं। डायरियों में एक व्यवस्था होती है। सुविधा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा इन्हें
नोट्स कहा जा सकता है। कुछ भी पढ़ते या सोचते हुए छोटी-छोटी पर्चियों पर या कॉपी के सफ़ों पर
बनी, वह भी उसे छोटे-छोटे नोट्स की शक्ल में ही लिखा। इस किताब में कवियों या कविता पर
केन्द्रित जो टिप्पणियाँ हैं या कविता की किताबों पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ, सब कुल मिलाकर
नोट्स ही हैं। यह एक ऐसी तरकीब है जिसे निबन्ध न लिख पाने की अपनी अक्षमता के चलते मैंने
अपनी काहिली और सुविधा के लिए ईजाद किया। इसलिए इसे आलोचना या समीक्षा जैसा काम तो
क़तई नहीं कहा जा सकता।
नोट्स में एक बेतरतीबी है। एक अव्यवस्था है। मुझे लगता है कि रचना के भीतर अर्जित की गई
स्वतंत्रता के अधिक क़रीब पहुँचने में यह कोशिश ज़्यादा कारगर है। हिन्दी कविता के लिए मुझे
अक्सर एक रूपक गढ़ने की इच्छा होती है कि इसकी काया मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ
अग्रवाल और त्रिलोचन के पाँच तत्त्वों से बनी है और इसके प्राणतत्त्व निराला हैं। हर रूपक की तरह
लेकिन यह रूपक भी अपर्याप्त है पर इससे हिन्दी कविता के नाक-नक्श कुछ हद तक तो पहचाने ही
जा सकते हैं। आठवें दशक की कविता को सामने रखकर अपने से पहले की कविता को टटोलने की
कोशिश में नोट्स का यह पुलिन्दा तैयार हो गया है।
यह एक कवि की नोटबुक है। इसलिए इसमें व्यवस्था कम, बहक ज़्यादा है।
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