Kathin Ka Akharhebaaz Aur Anya Nibandh
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Author:
Vyomesh ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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ता पढ़नेवाले अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन अपार हैं। उन्हें गिनती में सीमित नहीं किया जा सकता। वे कविता से रिश्ता न रखनेवाले बहुसंख्यकों से कम ज़रूर हैं, लेकिन परिमेय नहीं हैं। कविता से ख़ुद को और ख़ुद से कविता को बदलनेवाले वे लोग लगातार हैं, लेकिन भूमिगत और चुप्पा हैं। वे इस तरह छिपे हुए, बिखरे हुए, गुमशुदा और सतह के नीचे हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। दरअसल, इस आत्मलिप्त और सतही संसार में कविता की सक्रियताएँ एक ख़ास तरह की अंडरग्राउंड एक्टिविटी हैं। मेरी बात का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि हम वृहत्तर समाज में कविता के लिए कोई स्पेस या रियायत माँग रहे हैं। हम ऐसी स्थिति से क्षुब्ध ज़रूर हैं, लेकिन मुख्यधारा का हीनतर अनुषंग बन जाने के लिए कभी कोई कोहराम नहीं मचा रहे हैं। हम उस समाज के अधुनातन स्पन्दनों की, उसके उत्थान और पतन की, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की मीमांसा करनेवाला गद्य लिखना चाहते हैं, जिसका हम ख़ुद बहुत छोटा हिस्सा हैं। —इसी पुस्तक
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ता पढ़नेवाले अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन अपार हैं। उन्हें गिनती में सीमित नहीं किया जा सकता। वे कविता से रिश्ता न रखनेवाले बहुसंख्यकों से कम ज़रूर हैं, लेकिन परिमेय नहीं हैं। कविता से ख़ुद को और ख़ुद से कविता को बदलनेवाले वे लोग लगातार हैं, लेकिन भूमिगत और चुप्पा हैं। वे इस तरह छिपे हुए, बिखरे हुए, गुमशुदा और सतह के नीचे हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। दरअसल, इस आत्मलिप्त और सतही संसार में कविता की सक्रियताएँ एक ख़ास तरह की अंडरग्राउंड एक्टिविटी हैं।
मेरी बात का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि हम वृहत्तर समाज में कविता के लिए कोई स्पेस या रियायत माँग रहे हैं। हम ऐसी स्थिति से क्षुब्ध ज़रूर हैं, लेकिन मुख्यधारा का हीनतर अनुषंग बन जाने के लिए कभी कोई कोहराम नहीं मचा रहे हैं। हम उस समाज के अधुनातन स्पन्दनों की, उसके उत्थान और पतन की, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की मीमांसा करनेवाला गद्य लिखना चाहते हैं, जिसका हम ख़ुद बहुत छोटा हिस्सा हैं।
—इसी पुस्तक
Book Details
-
ISBN9789389577693
-
Pages215
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Madhuresh
- Book Type:

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Description:
मधुरेश की प्रस्तुत पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना का विकास’ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ही आलोचना की मुख्य प्रवृत्तियों और आलोचकों के मूल्यांकन का प्रयास करती है। हिन्दी आलोचना में लोगों के अपने कुछ प्रिय आलोचक और युग रहे हैं।
मधुरेश वस्तुनिष्ठ और विश्वसनीय रूप में समूची हिन्दी आलोचना और आलोचकों का मूल्यांकन करते हैं। न उनका कोई प्रिय युग है, न ही आलोचक। वे सदैव सामाजिक विकास के सन्दर्भ में आलोचना को देखते-परखते हैं और कैसी भी चयनवादी दृष्टि से बचते हैं। हिन्दी में मार्क्सवादी और समकालीन आलोचना पर कदाचित् पहली बार यहाँ इतने सम्पूर्ण रूप में विचार हुआ है।
प्रस्तुत पुस्तक हिन्दी आलोचना और आलोचकों के लिए अनिवार्य और उपयोगी है।
Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Nirala
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
हिन्दी कविता के सौन्दर्यशास्त्र को हमेशा के लिए बदल देनेवाले सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ऐसे कवि-दार्शनिक हैं जिन्होंने कविता को न सिर्फ एक नए सौन्दर्य-बोध के साथ सड़क पर उतार दिया अपितु छायावाद को प्रगति की कामना और श्रम के मूल्यों से जोड़ने का भी काम किया। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास हों या निबन्ध हों, उनके लेखन और चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता के बीच एक द्वन्द्वात्मक रिश्ता सदा बना रहा जिसने उनके लेखन में विलक्षण रूप से नए-नए अर्थ सम्भव किए। उनकी “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” जैसी पंक्ति अन्यायी सत्ता और उसके प्रतिरोध में खड़े जन का एक कालजयी रूपक बन गई। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब पाठकों के समक्ष निराला के चिन्तन की एक मुकम्मल तसवीर पेश कर सकेगी।
Sahitya Aur Samiksha
- Author Name:
Rajnath
- Book Type:

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Description:
‘साहित्य और समीक्षा’ में किसी एक लेखक या आलोचक के कृतित्व पर विचार नहीं किया गया है। लेखक ने इस पुस्तक में साहित्य और समालोचना से जुड़ी कुछ ऐसे बिन्दुओं और समस्याओं पर विचार किया है जो किसी भी भाषा के साहित्य को समझने के लिए जरूरी हैं। राजनाथ अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य साहित्य-आलोचना के मर्मज्ञ विद्वान हैं। पाश्चात्य साहित्य-समीक्षा के सन्दर्भ में लिखे गए उनके ये लेख साहित्य के अध्ययन, अध्यापन और विश्लेषण के विभिन्न आयामों पर विचार करते हैं।
पुस्तक में संकलित समीक्षात्मक निबंधों में साहित्य के विश्लेषण और मूल्यांकन पर सर्वाधिक बल दिया गया है। साहित्य, सिद्धान्त और आलोचना के क्षेत्र में काम करने वाले अध्येताओं के अलावा शोधार्थियों, अध्यापकों और छात्रों के लिए भी यह एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी।
Prarambhik Rachanayen
- Author Name:
Namvar Singh
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Description:
नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के स्तम्भ हैं। उनके प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन में बहुत कुछ है जो अब तक लुप्त है। प्रस्तुत पुस्तक में उनके प्रारम्भिक लेखन की कुछ बानगी भर
है।नामवर सिंह ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत काव्य-लेखन से की थी। चौदह वर्ष की उम्र, यानी 1938 से उनका काव्यारम्भ हुआ। सबसे पहले वे ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया लिखते थे। 1941 ई. में वे बनारस अध्ययन करने आए और उनका सम्पर्क त्रिलोचन से हुआ। त्रिलोचन ने उन्हें खड़ी बोली में लिखने को उत्प्रेरित किया। उन्होंने 1941 ई. से अबाध गति से कविता लिखना शुरू किया। छन्दों पर निरन्तर अभ्यास करते गए और कविता-लेखन का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ, वह अविराम गति से 1957 ई. तक चला। फिर वह सदा के लिए बन्द हो गया।
1950 ई. तक उन्होंने विविध प्रकार की गद्य रचनाएँ लिखीं, जिनमें से 17 निबन्धों का एक संग्रह ‘बक़लम खुद’, नाम से 1951 ई. में प्रकाशित हुआ।
नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाओं का अपना एक अलग ही महत्त्व है। इनके द्वारा हम नामवर सिंह के साहित्यिक विकास की जड़ों को भी पहचान सकते हैं और उनके प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन के भाव-बोध एवं विचारों की भी पड़ताल कर सकते हैं।
नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाओं में कच्चापन नहीं मिलता। इसका कारण यह है कि विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने सघन साहित्य-साधना की थी। उनकी स्मरणशक्ति लाजवाब थी। बौद्धिक ओजस्विता से वे भरे हुए थे। इसीलिए बहुत कम उम्र में ही वे एक बौद्धिक ऊँचाई ग्रहण करते हैं। भारत यायावर ने नामवर सिंह की प्रारम्भिक रचनाएँ संकलित कर एक सराहनीय कार्य किया है।
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