Prabhat Practical Hindi -English Dictionary
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Author:
Badrinath KapoorPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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प्रस्तुत हिंदी- अंग्रेज़ी शब्दकोश में हिंदी के लगभग सभी शब्दों को वर्णक्रम से रखा गया है । हिंदी शब्द के अंग्रेज़ी में कई-कई अर्थ उनके वाक्यों में प्रयोग बताकर दिए गए हैं । इससे पाठकों को शब्दों के विभिन्न अर्थ समझने में बड़ी आसानी होगी । शब्दों का उच्चारण सुगमतापूर्वक एवं व्यवस्थित ढंग से किया जा सके, इसलिए शब्दों को अक्षरों में विभाजित कर योजिका- के माध्यम से अलग- अलग करके दिखाया गया है और शब्द के जिस अक्षर पर बलाघात है उस पर चिह्न भी लगाया गया है ।
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प्रस्तुत हिंदी- अंग्रेज़ी शब्दकोश में हिंदी के लगभग सभी शब्दों को वर्णक्रम से रखा गया है । हिंदी शब्द के अंग्रेज़ी में कई-कई अर्थ उनके वाक्यों में प्रयोग बताकर दिए गए हैं । इससे पाठकों को शब्दों के विभिन्न अर्थ समझने में बड़ी आसानी होगी । शब्दों का उच्चारण सुगमतापूर्वक एवं व्यवस्थित ढंग से किया जा सके, इसलिए शब्दों को अक्षरों में विभाजित कर योजिका- के माध्यम से अलग- अलग करके दिखाया गया है और शब्द के जिस अक्षर पर बलाघात है उस पर चिह्न भी लगाया गया है ।
Book Details
-
ISBN9789386300867
-
Pages796
-
Avg Reading Time27 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विद्यार्थियों के लिए कोश बनाना अधिक कठिन कार्य है । पहले तो प्रविष्टियों के रूप में उन्हीं शब्दों को ग्रहण किया जाना चाहिए जो उनकी पाठ्य-पुस्तकों में प्रयुक्त हों और दूसरे, उनके वही या उतने ही अर्थ लिये जाने चाहिए जिनका उनसे प्रयोजन हो । तीसरे, अर्थ-विवेचन में ऐसे सरल शब्दों का प्रयोग हो जिनका ज्ञान सामान्यत: विद्यार्थियों को रहता है । प्रस्तुत कोश का निर्माण करते समय इन बातों का ध्यान रखा गया है । भाषिक- सामर्थ्य सफल जीवन-निर्वाह का मूल्य उपकरण है । इस उपकरण की प्राप्ति शब्दों के उपयुक्त अर्थों और प्रयोगों की सिद्धि से ही संभव है । विश्वास है, प्रस्तुत कोश विद्यार्थियों के लिए बहूपयोगी होने के साथ ही उनके शब्द--ज्ञान में वृद्धि करते हुए उसे समृद्ध करने में सहायक सिद्ध होगा ।
Sahitya Siddhant
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Rene Wellek +2
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प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचकों ‘रेने वेलेक और आस्टिन वारेन’ की यह कृति अपने विषयगत वैज्ञानिक विवेचन एवं शैलीगत सहजता के कारण अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है। विद्वान् लेखकों ने एक ओर तो काव्यशास्त्र और अलंकारशास्त्र (जिसकी परम्परा अरस्तू से शुरू होकर ब्लेयर, कैम्पबेल और केम्स तक आई हुई है) के विभिन्न पक्षों का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत किया है और दूसरी ओर ललित साहित्य की विधाओं और शैलीशास्त्र तथा साहित्यालोचन के प्रमुख सिद्धान्तों से भी पाठकों को परिचित कराया है। इसके साथ ही अनुसन्धान, साहित्य का इतिहास, साहित्य का मूल्यांकन, कॉलेजों में साहित्य का अध्ययन जैसी ज्वलन्त समस्याओं का समाधान भी सुझाने का सफल प्रयास किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में ‘काव्यशास्त्र’ (या साहित्य-सिद्धान्त) और ‘आलोचना (साहित्य का मूल्यांकन) को पांडित्य (अनुसन्धान) और साहित्यिक इतिहास (सिद्धान्त और आलोचना के रूढ़पथ के विपरीत, साहित्य के गतिशील पक्ष) से भी जोड़ना चाहा है। शब्दावली, टोन और बल में निःसन्देह दोनों लेखकों में थोड़ी-बहुत असंगतियाँ रह गई हैं। परन्तु वे यह भी सोचते हैं कि इस कमी की पूर्ति इस रूप में हो जाती है कि दो व्यक्ति मूलत: एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।
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