Vichar Prawah
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Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
695
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<strong>‘</strong>विचार प्रवाह’ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्धों का महत्त्वपूर्ण संग्रह है। अपने निबन्धों के माध्यम से द्विवेदी जी मनुष्य जाति के प्रत्येक अनुभव, उसकी सांस्कृतिक उपलब्धि और प्रकृति के हर विवर्तन का रेखांकन करते हैं। मनुष्य के विकासमान परम्परा-बोध और देश-कालगत परिस्थितियों में उसके मूल्यांकन की आवश्यकता पर उनका बराबर आग्रह रहा है। लोक-विमुख धर्म, दर्शन, साहित्य और कला-संस्कृति उनके लिए मूल्यहीन हैं। जड़ शास्त्रीयता से उनका गहरा विरोध है। यही कारण है कि द्विवेदी जी के कितने ही शोधपरक निबन्ध हमारे चेतन-अवचेतन के वैचारिक कुहासे को छाँटने का कार्य करते हैं।</p> <p>अपने ललित निबन्धों में द्विवेदी जी आद्यन्त कवि हैं। प्रकृति जैसे उनकी सहचरी बनकर आती है। अकुंठ भावोद्रेक और अप्रस्तुतों के भावोचित व्यंजक प्रयोग, सजीव बिम्बात्मकता और अपनी सहजता में बेजोड़ भाषा-शैली उनके इन निबन्धों को विश्वसाहित्य की अनमोल सम्पदा बना देती है। इनमें अवगाहन करता पाठक एक ओर आचार्य जी की कल्पनाशील भावप्रवणता से अभिभूत हो उठता है, तो दूसरी ओर ऐसे ज्ञान-कोश से परिचित होता है, जिसमें उदात्त जीवन-मूल्यों के राशि-राशि रत्न सुरक्षित हैं।
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<strong>‘</strong>विचार प्रवाह’ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्धों का महत्त्वपूर्ण संग्रह है। अपने निबन्धों के माध्यम से द्विवेदी जी मनुष्य जाति के प्रत्येक अनुभव, उसकी सांस्कृतिक उपलब्धि और प्रकृति के हर विवर्तन का रेखांकन करते हैं। मनुष्य के विकासमान परम्परा-बोध और देश-कालगत परिस्थितियों में उसके मूल्यांकन की आवश्यकता पर उनका बराबर आग्रह रहा है। लोक-विमुख धर्म, दर्शन, साहित्य और कला-संस्कृति उनके लिए मूल्यहीन हैं। जड़ शास्त्रीयता से उनका गहरा विरोध है। यही कारण है कि द्विवेदी जी के कितने ही शोधपरक निबन्ध हमारे चेतन-अवचेतन के वैचारिक कुहासे को छाँटने का कार्य करते हैं।</p>
<p>अपने ललित निबन्धों में द्विवेदी जी आद्यन्त कवि हैं। प्रकृति जैसे उनकी सहचरी बनकर आती है। अकुंठ भावोद्रेक और अप्रस्तुतों के भावोचित व्यंजक प्रयोग, सजीव बिम्बात्मकता और अपनी सहजता में बेजोड़ भाषा-शैली उनके इन निबन्धों को विश्वसाहित्य की अनमोल सम्पदा बना देती है। इनमें अवगाहन करता पाठक एक ओर आचार्य जी की कल्पनाशील भावप्रवणता से अभिभूत हो उठता है, तो दूसरी ओर ऐसे ज्ञान-कोश से परिचित होता है, जिसमें उदात्त जीवन-मूल्यों के राशि-राशि रत्न सुरक्षित हैं।
Book Details
-
ISBN9788126705818
-
Pages288
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण घनीभूत जीवन-विवेक सम्पन्न रचनाकार हैं। इस विवेक की आँख से वे कृतियों, व्यक्तियों, प्रवृत्तियों व निष्पत्तियों में कुछ ऐसा देख लेते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है। समय-समय पर उनके द्वारा लिखे गए लेख आदि इसका प्रमाण हैं। ‘रुख़’ कुँवर नारायण के गद्य की छठी पुस्तक है। पुस्तक के सम्पादक अनुराग वत्स के शब्दों में ‘पहला हिस्सा स्वभाव में समीक्षात्मक, दूसरा संस्मरणात्मक और वक़्त-वक़्त पर लिखी गई टिप्पणियों का है।’
कुँवर जी विभिन्न कृतियों को पढ़ते हुए समीक्षात्मक अभिव्यक्तियों के बहाने अपने तर्कों की जाँच करते हैं। उन पद्धतियों पर भी प्रकाश डालते हैं जिन पर चलकर किसी कविता, उपन्यास या आलोचना के अन्त:पाठ तक पहुँचा जा सकता है। अपने समकालीनों या सहयात्रियों पर कुँवर जी संकोच मिश्रित आत्मीयता के साथ लिखते हैं। संक्षिप्त किन्तु महत्त्वपूर्ण। यह भी कि संस्मरणशीलता के बीच में कई बार अनेक ज़रूरी सूत्र रेखांकित हो गए हैं। नामवर सिंह पर लिखते हुए वे कहते हैं, ‘साहित्य मुख्यत: राजनीतिक समाज नहीं है—कला और संस्कृति की दुनिया है। यह दुनिया बहुत बड़ी भी हो सकती है और बहुत संकुचित भी।
एक ऐसे समय में जब राजनीति की नैतिकता का ख़ुद का चेहरा विकृत हो चुका है, उसके संस्कारों की छाया साहित्य पर पड़ना शुभ लक्षण नहीं दीखता।’
छोटी टिप्पणियाँ आगे कहीं विस्तार से लिखने या बोलने के सूत्र सरीखे हैं। या, किसी को लिखे गए पत्र के हिस्से। ये टिप्पणियाँ कई बार चकित कर देती हैं। मर्म को छूती हुई। कृष्णा सोबती के लेखन पर कुँवर जी की टिप्पणी है, ‘कृष्णा सोबती के अन्दर अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने की जो एक दृढ़ता और मज़बूती है, वह उनकी भाषा के लगभग चुनौती-भरे मुहावरे में प्रतिबिम्बित होती है।’
समग्रत: एक विशिष्ट भाषिक संस्कार में व्यक्त यह पुस्तक सन्दर्भित विषयों के साथ स्वयं कुँवर नारायण के अन्तर्मन को बूझने का अनूठा अवसर है।
Hindi Vyakaran Mimansa
- Author Name:
Kashiram Sharma
- Book Type:

- Description: व्याकरण छह वेदांगों में से एक है। वह वेद का मुख है। अत: भारत में उसके अध्ययन की प्राचीनता उतनी ही है जितनी वेदों की। आज से कम से कम अढ़ाई हज़ार वर्ष पूर्व तो पाणिनि ने उसे पूर्णता तक पहुँचा दिया था। व्याकरण में वर्णों के उच्चारण, शब्दों की रचना और रूप रचना तथा वाक्यों की रूप-रचना पर विचार होता है। वह भाषा का उच्चारण और रूप रचनामूलक अध्ययन करता है। दूसरे शब्दों में, वह शब्द-प्रधान है, अर्थ-प्रधान नहीं। इसीलिए उसे शब्दानुशासन या शब्दशास्त्र भी कहते हैं। पश्चिम के ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं। वे वर्णों के केवल लिपिगत रूप पर विचार करते हैं। शब्दों का वर्गीकरण उनके अर्थ के आधार पर करते हैं : अमुक बोधक, तमुक वाचक आदि। वाक्य में रूप-रचना का भी ध्यान रखते हैं पर प्रधानता विश्लेषण की ही होती है जो प्रकार्य (अर्थ) प्रधान होती है—क्रिया, उसका कर्ता, कर्म, पूरक आदि। सार यह कि ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं, व्याकरण शब्द-प्रधान। हिन्दी आदि सीखने के लिए विदेशियों ने ग्रामर बनाए, दुर्भाग्य से उन्हें ही व्याकरण कहा जाने लगा। बाद में ब्लूमफील्ड आदि ने भाषा के अध्ययन की व्याकरणिक शैली अपनाई पर उसे ग्रामर नहीं कहा, संरचनात्मक भाषिकी आदि कहा। उनकी भाषिकी व्याकरण है। इसीलिए उन्होंने ग्रामर नहीं कहा प्रस्तुत रचना में डॉ. दीमशिन्स, कामता प्रसाद गुरु और किशोरीदास वाजपेयी के व्याकरणों की समीक्षा के व्यपदेश से व्याकरण का विषय क्षेत्र तो स्पष्ट किया ही गया है, सच्चे हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा भी दी गई है; ऐसे व्याकरण बनेंगे तो भाषा अध्ययन की सही दिशा मिलेगी। जो ग्रामरी शैली को ठीक समझें, वे ग्रामर पढ़ें और लिखें भी, पर उन्हें व्याकरण न कहें? व्याकरण की वही परिभाषा रहने दें जो चार-पाँच हज़ार वर्ष से रही है।
Akhil Bharatiya Prashasnik Kosh
- Author Name:
Bhola Nath Tiwari +2
- Book Type:

- Description: आज हिंदी की स्थिति लगभग वही है। स्वतंत्रता के बाद जो शब्दावली बनी है, बन रही है उससे हिंदी की सामर्थ्य स्वयंसिद्ध हो गई है। हिंदी का विस्तृत क्षेत्र जहाँ लोकभाषाओं से हिंदी को शब्दावली प्रदान कर रहा है वहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक तथा प्रशासक भी हिंदी को नई अर्थ-व्यंजनाएँ प्रदान कर रहे है। समय ही इस शब्दावली को मानक रूप प्रदान करेगा जिससे मानक शब्दावली में निश्चितार्थता एवं बोधागम्यता बढ़ती जाएगी। हिंदी भाषा-भाषी राज्यों की राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता मिल चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली-चंडीगढ़ आदि ने अपना सभी सरकारी कामकाज हिंदी में करना प्रारंभ कर दिया है। इसके साथ ही पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात की सरकारों ने भी हिंदी को केंद्र के साथ पत्र-व्यवहार के लिए संपर्क भार्षा के रूप में स्वीकार कर लिया है। सभी हिंदी भाषी राज्यों की जनता द्वारा अपने प्रशासन संबंधी कार्य को हिंदी में ही करने से हिंदी का महत्त्व स्वयं बढ़ता जा रहा है।
KASHMIR : Bharat-Pakistan Sambandhon ke Aaine Mein
- Author Name:
Sisir Gupta
- Book Type:

- Description: अगस्त-सितंबर 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध की मुख्य सीख यह थी कि प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देनेवाली अराजकता की पृष्ठभूमि में आज एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था कार्यरत है, जो मँझली एवं छोटी शक्तियों को बल प्रयोग द्वारा मुद्दों के समाधान की अनुमति प्रदान नहीं करती है। आज की दुनिया में ऐसी अवस्था को दृष्टिगत करना कठिन है, जहाँ शत्रु को सफलतापूर्वक परास्त करने के उपरांत भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी के भी द्वारा शांति की शर्तों का निर्धारण किया जाए। प्रस्तुत पुस्तक में भारत के विभाजन-काल की परिस्थितियों, जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय मामले पर संयुक्त राष्ट्र में चर्चा, द्विपक्षीय वार्त्ताओं और इस मुद्दे पर महाशक्तियों के रुख तथा जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटने के बाद की बदली परिस्थिति, विकास कार्य एवं जम्मू- कश्मीर पुनरुत्थान आदि का विस्तृत और निष्पक्ष विवरण है। संबंधित पक्षों पर नेताओं, विशेषज्ञों की टिप्पणियाँ और प्रेस के उद्धरण पुस्तक को और भी पठनीय बनाते हैं। कश्मीर में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य पाठकों के लिए भी यह पुस्तक रोचक और ज्ञानवर्धक है।
Nayi Kahani : Sandarbh Aur Prakriti
- Author Name:
Devishanker Awasthi
- Book Type:

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Description:
संसार के साहित्य में एक समर्थ विधा के रूप में अपनी पद-प्रतिष्ठा के लिए कहानी को बीसवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। हिन्दी में तो उसका जन्म ही इस सदी में आकर हुआ। यही कारण है कि मनुष्य की नियति, उसके दुःख और उसकी जिजीविषा को अभिव्यक्ति देनेवाली अनेक कहानियों के सामने आने के बाद भी कहानी को लम्बे समय तक हलके-फुल्के मनोरंजन का साधन ही माना जाता रहा। हिन्दी में यह स्थिति और भी बाद तक रही और स्वातंत्र्योत्तर काल तक में वर्षों तक साहित्य-चिन्तन और आलोचना का केन्द्र कविता ही बनी रही। कहानी को लेकर अगर कोई चर्चा होती भी थी तो वह पाठ्यक्रमों के लिए तैयार किए जानेवाले संग्रहों की भूमिकाओं तक ही सीमित थी।
कहानी की गम्भीर चर्चा सन् 1995 के आसपास ‘कहानी’ पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद ही शुरू हुई। उसी समय इस बात को भी गम्भीरता से चिन्हित किया गया कि नई कहानी को समझने-समझानेवाले आलोचकों का प्रायः आभाव है। तब 1959 में ‘कहानी’ पत्रिका ने अपनी पहलक़दमी पर कहानी की तत्कालीन अवस्थिति के उद्घाटन के लिए स्वयं रचनाकारों को प्रोत्साहित किया जिससे नई कहानी के अनेक पहलू स्पष्ट हुए। उसके कुछ सालों बाद कहानी-आलोचना विभिन्न उतार-चढ़ावों से गुज़रती हुई एक ऐसी जगह भी पहुँची जहाँ ‘नई कहानी’ न सिर्फ़ प्रतिष्ठापित हो गई, बल्कि उसने एक प्रतिष्ठान का रूप भी धारण कर लिया। उसके बाद नेत्रृत्व की छीना-झपटी आती है और आते हैं नई कहानी बनाम नई कविता और नई कहानी बनाम सचेतन कहानी जैसे विवाद जिन्हें स्वस्थ आलोचना-विवेक का उदहारण नहीं कहा जा सकता। प्रस्तुत संकलन ‘नई कहानी’ से सम्बन्धित इसी वैचारिक आपाधापी और बेचैनी का जायज़ा लेने का एक प्रयास है। पुस्तक में तत्कालीन विमर्श के तमाम महत्त्वपूर्ण विचार-कोण समाहित किए गए हैं जो आज भी ‘नई कहानी’ की अवधारणा को समझने में मददगार साबित हो सकते हैं।
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